World Bicycle Day : वो शख्स जो साइकल पर उड़ता पंक्षी था, 40 साल नापता रहा दुनिया

इयान हाइबेल को साइकल पर उड़ता पंक्षी कहा जाता था. उन्होंने साइक्लिंग को ही जिंदगी बना लिया था.

इयान हाइबेल को साइकल पर उड़ता पंक्षी कहा जाता था. उन्होंने साइक्लिंग को ही जिंदगी बना लिया था.

वर्ल्ड बाइसकिल डे पर हमें उस शख्स को जरूर याद करना चाहिए, जिसने किसी और से ज्यादा साइकिल से प्यार किया. वो 40 सालों तक साइकिल से पूरी दुनिया को नापता रहा और फिर अपने अनुभव पर किताबें लिखता रहा. 74 साल की उम्र में एक कार की टक्कर से उसकी मौत हुई.

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इयान हाइबेल हममे से शायद ही कोई जानता होगा. कम ही लोग उनके बारे में जानते होंगे. वह नये जमाने के जग यात्री थे. जिनकी 74 साल की उम्र में तब मौत हो गई जब वह फिर साइकिल से दुनिया नापने के लिए निकले थे.

इंग्लैंड के इस साइक्लिस्ट का सफर वर्ष 1963 में शुरू हुआ. बंधी-बंधाई और एक ही ढर्रे पर चलने वाली जिंदगी से वह उकता चुके थे. रोज वही घर से ऑफिस की दूरी नापना. फिर रात तक वापस उसी घर में लौट आना.

जब बेचैनी बढ़ी तो साइकिल से निकल पड़े

बेचैनी जब खासी बढ़ गई तो उन्होंने ऑफिस से दो साल की छुट्टी ली. निकल पड़े साइकल से दुनिया को नापने. पूरी दुनिया नापी भी. वो सुदूर अफ्रीकी के खतरनाक जानवरों वाले घने जंगलों से गुजरे, तो रेगिस्तान की रेत पर धंसती हुई साइकिल को किनारे तक पहुंचाया.
कभी भूखे रहे तो कभी लुटेरों का सामना किया

नदी, नाले, पहाड़, दलदल से होकर निकले तो सूनसान इलाकों में डाकू और लुटेरों का भी सामना किया. खूंखार कबीलों से निकली उनकी साइकिल. जेब में फूटी कौड़ी नहीं. लेकिन कल की चिंता भी नहीं. कभी भूखे रहे, कभी रूखा-सूखा मिला तो कभी अंजान अतिथियों ने व्यंजनों के ढेर लगा दिये.

इयान हाइबेल आमतौर पर जब साइकल यात्राओं पर निकलते थे तो उनकी जेब में पैसे नहीं होते थे. उन्हें कभी भूखा सोना पड़ता था तो कभी रुख-सूखा खाना पड़ता था लेकिन कभी व्यंजनों से भी उनका स्वागत होता था.



10 साल बाद घर लौटे और फिर निकल पड़े

पहली बार वह दस साल बाद घर लौटे. फिर निकल पड़े दुनिया की सैर करने. एक दो बार नहीं दस से ज्यादा बार वह ऐसा कर चुके थे. पिछले चालीस साल से वह ऐसा ही कर रहे थे. हर साल उनकी साइकिल करीब छह हजार मील का सफर तय करती.

पंछी बनूं, उड़ के चलूं मस्त गगन में

हमारी जुबान पर चढ़ा हुआ एक गाना है-पंछी बनूं, उड़ के चलूं मस्त गगन में...हाइबेल ऐसे ही पंछी थे. जो अपनी तरह से उड़ते हुए दुनिया का चप्पा-चप्पा नापते रहे लेकिन उनके उत्साह ने कभी कम होने का नाम नहीं लिया. बल्कि उनकी हर यात्रा उन्हें अगली यात्रा के लिए प्रेरित और उत्साहित करती थी.

हर यात्रा बढ़ाती थी अगली यात्रा का रोमांच

हर यात्रा के साथ अगली यात्रा को लेकर उनका रोमांच उतना ही बढ़ता जाता था. ऐसा नहीं कि वो यात्राओं में मुश्किलों और कठिनाइयों का सामना नहीं करते थे- लेकिन इन सब बातों से उनका हौसला कभी नहीं डिगा.। यकीन मानिये कि अगर सडक़ पर तेजी से भागती कार ने 23 अगस्त 2008 को उनके जीवन का अंत नहीं किया होता, तो वो अब भी दुनिया का चक्कर लगा रहे होते.

पहली बार जब वो साइकल से यात्रा पर निकले तो 10 साल बाद घर लौटे और फिर कुछ दिनों बाद फिर अगली यात्रा पर निकल पड़े.

हर काम में चाहिए उत्साह

हाइबेल के बारे में जानने के बाद बेशक ये कहा जा सकता है कि दुनिया में कोई भी काम बिना उत्साह या आनंद के नहीं हो सकता. हाइबेल ने तो जो कुछ किया, उसके लिए तो जबरदस्त जीवट और दृढइच्छाशक्ति की भी जरूरत होती है. लेकिन अगर आप कोई काम रोज करते हैं, बिना किसी उत्साह के. महज ड्यूटी समझकर तो ऐसे काम का क्या मतलब. ये तो आपमें न केवल ऊब पैदा करेगा बल्कि आपको मशीन में तब्दील कर देगा. आखिर मशीन भी तो वही करती है-अपना काम लगातार.

आप वो करिये, जिसमें आप उत्साह महसूस करते हैं, फिर देखिए आपके उसी काम की उत्पादकता क्या होती है. ऐसा करते हुए उस इयान हाइबेल के बारे में भी सोचिए, जो सत्तर साल की उम्र में भी अपने तरीके से दुनिया के अन्वेषण में लगे रहे, ढेरों किताबें लिखीं और दुनिया को बहुत कुछ ऐसा दे गए, जो इससे पहले सोचा तक नहीं गया था.

हाइबेल के बारे में जानने के बाद बेशक ये कहा जा सकता है कि दुनिया में कोई भी काम बिना उत्साह या आनंद के नहीं हो सकता.

कई यूनिवर्सिटी में लेक्चर देते थे

इयान हाइबेल ने साइक्लिंग में कई ऐसे काम किए, जो उनसे पहले कोई नहीं कर सका था. वो इंग्लैंड की सरे काउंटी के एपसम जिले में हुआ. उन्होंने जितनी यात्राएं कीं, उस पर किताबें लिखीं. अलग अलग कल्चर पर बात की. अमेरिका से लेकर ग्रेट ब्रिटेन तक तमाम  यूनिवर्सिटी में अपनी यात्राओं और इससे जुड़े तमाम पक्षों पर लेक्चर दिए.

कैसे शुरू हुआ ये सब

अपनी साइकिल की कुछ चीजें उन्होंने खुद डिजाइन कीं. जैसे साइकिल के अगले हिस्से को किन उपकरणों से लैस किया जा सकता है और बगल में कैसे बैगेज रैक बनाकर सामना रखा जा सकता है.

दरअसल इसकी शुरुआत इस तरह हुई कि जब उनके परिवार को सप्ताहांत पर समुद्र के किनारे जाना होता था तो सारा परिवार एक साथ ट्रेन का खर्च बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं रहता था, तब वो और उनके पिता साइकिल से वहां जाया करते थे. पार्क की बैंच पर सोते थे.

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