क्या कोरोना वायरस के मामले में WHO फेल हुआ है ?

क्या कोरोना वायरस के मामले में WHO फेल हुआ है ?
WHO ने कोरोना की संक्रामकता को लेकर लापरवाही दिखाई और देशों को देर से आगाह किया

माना जा रहा है कि World Health Organisation (WHO) ने फरवरी के अंत तक भी कोरोना वायरस (Coronavirus ) के बारे में साफ-साफ बताया होता तो हालात इतने भयावह नहीं होते.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 11, 2020, 3:08 PM IST
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दुनियाभर में कोरोनावायरस (coronavirus) से अब तक 1 लाख 2 हजार मौतें हो चुकी हैं, वहीं 17 लाख से ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव हैं. WHO ने बढ़ते संक्रमण पर चेताते हुए 10 अप्रैल को कहा कि देशों को अपने यहां लॉकडाउन (lockdown) खत्म करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, वरना हालात और बिगड़ सकते हैं. इस बीच खुद WHO की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ रही है. ज्यादातर देशों का मानना है कि WHO ने कोरोना की संक्रामकता को लेकर लापरवाही दिखाई और देर से आगाह किया.

सार्स के दौरान था मुस्तैद
इससे पहले साल 2002-03 में सार्स के दौरान WHO ने तुरंत ही ट्रैवल रेस्ट्रिक्शन और गाइडलाइन जारी की थी और साथ ही चीन को लताड़ा भी था कि उसने बीमारी की जानकारी जल्दी नहीं दी और सार्स फैलने लगा. सार्स से चली 8 महीने की लड़ाई के बाद संगठन ने का भी था कि कोरोना वायरस का कहर दोबारा लौटकर आ सकता है. यहां तक कि उस वक्त WHO के डायरेक्टर जनरल Dr Gro Harlem Brundtland ने आगाह करते हुए कहा था कि चीन के पशु बाजारों से किसी न किसी किस्म का वायरल संक्रमण हो सकता है और इसलिए यहां नजर रखी जानी चाहिए. अब 18 सालों बाद जबकि हेल्थ सुविधाओं के साथ-साथ संपर्क के तरीके भी ज्यादा से ज्यादा आधुनिक हो चुके हैं, तब भी WHO का सही समय पर देशों को न चेता पाना उसकी भूमिका को संदिग्ध बना रहा है. उसपर लगातार आरोप लग रहे हैं कि उसने अपनी भूमिका समय पर नहीं निभाई. यहां तक कि फिलहाल कोरोना का गढ़ बने अमेरिका के साथ-साथ कई यूरोपियन देश भी WHO पर भड़के हुए हैं.

वायरस संक्रमण लगातार बढ़ने के बीच अमेरिका इसका एपिसेंटर बन चुका है

जारी कर रहा था गाइडलाइन


कोविड-19 के हमले की शुरुआत चीन के वुहान से दिसंबर में हुई. हालांकि तब ज्यादा मामले नहीं आए थे. संख्या बढ़ने पर वुहान में कंप्लीट लॉकडाउन कर दिया गया ताकि वायरस चीन के दूसरे प्रदेशों में न फैल सके. इस बीच WHO ने लगातार हेल्थ अपडेट लिए और जारी किए. वो रोज इसे जांचता था कि वायरस कितना संक्रामक है और कितनी तेजी से फैल सकता है. इसे लेकर तमाम देशों की सरकारों को गाइडलाइन भी दी जा रही थी. इस दौरान कई हफ्तों तक WHO इन्कार करता रहा कि ये वायरस एक से दूसरे से फैलते हैं, जबकि चीन के पड़ोसी देश ताइवान ने शुरुआत में ही बता दिया था कि वायरस एक से दूसरे में फैल रहे हैं. ताइवान का आरोप है कि चूंकि वो WHO का सदस्य देश नहीं है इसलिए संगठन ने उसकी बात को गहराई से नहीं लिया और चीन पर ही भरोसा किए बैठा रहा. ताइवान की ये रिपोर्ट फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित हुई है.

जानकारी छिपाने का आरोप
ताइवान के सचेत करने के बाद भी, ये वायरस कितनी तेजी से फैल सकता है, WHO ने इसे सदस्य देशों तक नहीं पहुंचाया. बल्कि 14 जनवरी को एक ट्वीट में लिखा कि कोविड-19 के मामले में साफ नहीं है कि ये इंसानों से इंसानों में फैलता है.



यहां तक कि जब यूएस ने अपने यहां भी कोरोना के मामले बढ़ने पर चीन पर मामला छुपाए रखने का आरोप लगाया, तब भी WHO ने चीन का बचाव किया था. ये महीनेभर बाद की बात है. 17 फरवरी को WHO ने बताया कि वायरस का कहर कम होने लगा है और ज्यादातर मामले चीन के वुहान में ही हैं, लिहाजा घबराने की जरूरत नहीं है. यहां तक कि हफ्तेभर बाद WHO के डायरेक्टर जनरल Tedros Adhanom Ghebreyesus ने कहा कि हमें नहीं लग रहा है कि वायरस दुनिया में फैलेगा या मौतें होंगी. इसके ठीक 3 दिनों के भीतर चीन में मामले बढ़कर 79,000 पार कर चुके थे, जबकि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी संक्रमण फैलने लगा था.

यात्राएं चालू रखने की दी सलाह
यहां तक कि 29 फरवरी को संगठन ने देशों को हवाई यात्राएं न रोकने की सलाह देते हुए कहा कि पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी के ज्यादातर हालातों में भी ट्रैवल रेस्ट्रिक्शन से कोई फर्क नहीं पड़ता है. बल्कि सीमाएं सील करने पर देश उतनी आसानी से एक-दूसरे को मेडिकल मदद नहीं दे पाएंगे. माना जा रहा है कि अपनी सीमाएं न बंद करने की वजह से ही इटली में दुनियाभर के सैलानी पहुंचते रहे और वहां हालात इतने बिगड़ गए. वुहान में हुए लॉकडाउन के पूरे 48 दिन गुजरने के बाद आखिरकार WHO ने कहा कि सभी देशों को इमरजेंसी तरीके आजमाने की जरूरत है, अगर वे खुद को बचाना चाहते हैं. 11 मार्च को आखिरकार जब WHO ने जब इसे महामारी घोषित किया, तब तक वायरस लगभग हर जगह फैल चुका था. WHO के इतने देर से आगाह करने पर उसकी भूमिका पर बहुत से देश शक कर रहे हैं.

आखिरकार जब WHO ने जब इसे महामारी घोषित किया, तब तक वायरस लगभग हर जगह फैल चुका था


यहां तक कि माना जा रहा है अगर WHO फरवरी के आखिर तक भी इतने गोलमोल बयान न देता और ताइवान द्वारा दी गई जानकारी को न छिपाता तो दुनियाभर में, खासकर अमेरिका, यूके, फ्रांस, जर्मनी, स्विटरजरलैंड, नीदरलैंड और स्पेन में हालात काबू में होते. ये वही देश हैं, जहां मार्च की शुरुआत में वायरस का कहर बढ़ना शुरू हुआ था.

संदेह में डायरेक्टर की भूमिका
WHO के डायरेक्टर जनरल Tedros Adhanom Ghebreyesus के कार्यकाल के दौरान भेदभाव और मानवाधिकार हनन के कई मामले आ रहे हैं, जिनमें से एक है इथोपिया की जनगणना के दौरान वहां की एक खास प्रजाति के 20 लाख सदस्यों का नाम न होना. ये भी कयास हैं कि चीन ने क्योंकि इथोपिया में काफी इनवेस्टमेंट किया है इसलिए भी डायरेक्टर जनरल ने दुनिया से कोरोना के बारे में जरूरी सूचनाएं छिपाईं. कोरोना संकट को लेकर नाकामी दिखने के बाद से ये बात भी उठ रही है कि त्रासदी खत्म होने पर WHO की भूमिका पर नए सिरे से सोचा जा सकता है.

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