वर्ल्ड इम्यूनाइजेशन वीक: भारत के 10 लाख बच्चों की पांच साल से पहले हो जाती है मौत, कैसे बचें

वर्ल्ड इम्यूनाइजेशन वीक: भारत के 10 लाख बच्चों की पांच साल से पहले हो जाती है मौत, कैसे बचें
ऐसा तब जब हम वैक्सीन के बड़े निर्माताओं में से एक, लेकिन दुनिया के नवजातों की आबादी का एक तिहाई हिस्सा हमारे यहां जिन्हें नहीं लगते टीके

ऐसा तब जब हम वैक्सीन के बड़े निर्माताओं में से एक, लेकिन दुनिया के नवजातों की आबादी का एक तिहाई हिस्सा हमारे यहां जिन्हें नहीं लगते टीके

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 30, 2019, 5:30 PM IST
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कहने को तो भारत वैक्सिन के बड़े निर्माताओं और निर्यातकों में से एक है, लेकिन यही वह देश भी है जहां पर दुनिया के नवजातों की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा ऐसा है जो टीकाकरण की इस जरूरी प्रक्रिया से कहीं दूर है. 90 के दशक की बात की जाए तो देशभर के आधे से कुछ कम बच्चों का ही टीकाकरण इस दौरान हो सका था. वहीं 2014 में सरकार ने 400 करोड़ टीके सरकारी योजना के तहत उपलब्‍ध करवाए गए. वहीं नवजात बच्चों को पहले लगने वाले 7 जरूरी टीकों की संख्या को बढ़ा कर 12 कर दिया गया.

इनमें कुछ ऐसे टीके भी जोड़े गए जो जानलेवा निमोनिया और हैजा जैसी बीमारियों से लड़ने में सक्षम थे. इन टीकों की कीमत भी ज्यादा नहीं रखा गई. यह सभी टीके 200 से 250 रुपए के बीच में ही रखे गए थे लेकिन इसके बाद भी 44 प्रतिशत बच्चे ऐसे रह गए जिन्हें यह उपलब्‍ध नहीं हुए. इन सभी का परिणाम घातक रहा. जानकारी के अनुसार टीकाकरण के अभाव में देश के 10 लाख बच्चे ऐसे हैं जो पांच साल से ज्‍यादा नहीं जीते. ऐसा क्यों हैं, इसके लिए कुछ बातें जानना जरूरी है-

इम्यून सिस्टम में सुधार संबंधी योजनाओं को बजट की कमी
सरकार और विश्व की अन्य संस्‍थाओं व एनजीओ से मिलने वाला फंड देश के लिए पूरा नहीं पड़ता है. साथ ही सभी का ध्यान पोलिया उन्मूलन की तरफ रहा है. हालांकि इसके परिणाम अच्छे भी मिले हैं लेकिन बड़े स्तर पर परिणाम अभी भी आने बाकि हैं. स्वास्‍थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2014 में मिशन इंद्रधनुष योजना की शुरुआत की.
इसके तहत सरकार का लक्ष्य था कि वे अप्रैल 2015 से जुलाई 2017 के बीच देश में मौजूद नवजात बच्चों का पूरी तरह से इम्मयूनाइजेशन करें. साथ ही 90 प्रतिशत नवजातों का 2020 तक टीकाकरण हो. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में इसका असर कम देखने को मिला.



इसके लिए योजना को फिर एक बार अक्टूबर 2017 में नए नाम से लाया गया. इस बार इसका नाम रखा गया इंटेंसीफाइड मिशन इंद्रधनुष. इस योजना के सबंध में एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अक्टूबर 2017 से जनवरी 2018 के बीच रोग मुक्त करने के इस मिशन में 69 प्रतिशत की बढ़त देखी गई और वह भी उन 190 जिलों में जहां पर समस्या सबसे ज्यादा थी.

लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे जागरुकता कार्यक्रम
भारत का इम्मयूनाइजेशन प्रोग्राम दुनिया का सबसे बड़ा है. लेकिन इसके बावजूद 2016 में आई एक स्टडी के अनुसार यह बताता है कि देश के 38 प्रतिशत बच्चे अपने पहले साल में जरूरी टीकाकरण भी नहीं करवा पाते हें. इसका मुख्य कारण हैं कि जनसंख्या का बड़ा हिस्सा या तो घुमंतु है या फिर ऐसे इलाकों में रह रहा है जहां तक पहुंच अभी भी मुश्किल है.

टीकाकरण में मानसिकता भी बाधक
टीकाकरण की योजनाओं का तेजी से काम नहीं कर पाने के पीछे एक बड़ा कारण जागरुकता का अभाव भी है. अभी तक बड़ी जनसंख्या इस बात को लेकर जागरुक नहीं है और वे टीकाकरण को लेकर यह गलत धारणा बनाए हुए हैं कि इसके कई दुष्परिणाम हैं. ऐसे में उनकी मानसिकता को बदलने की खासी जरूरत है.

कर्मचारियों कर अभाव
प्रशिक्षत स्टाफ की कमी भी टीकाकरण की योजनाओं के लोगों तक न पहुंचने का एक कारण है. खासकर दूरदराज के इलाकों में. इसके साथ ही नवजातों की सही संख्या का पता लगाना और मांग व पूर्ती के बीच के संतुलन को बनाना काफी जरूरी है.

संसाधनों का पूरा न होना
टीकों का मतलब केवल सूईं, सीरींज और ड्रॉपर की सप्लाई तक ही सीमित नहीं है. इसके पूर्ण असर के लिए इसे रेफ्रिजरेशन की काफी जरूरत होती है. यह प्रक्रिया इसके निर्माण के साथ ही शुरू होती है और किसी को दिए जाने तक चलती है. एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 25 प्रतिशत टीके चिकित्सकों या नवजातों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाते हैं.

ऐसे में जब फंड की कमी हो और इस तरह से टीके खराब हों तो यह योजना को एक बड़ा धक्का पहुंचाते हैं. इस समस्या से भी निपटने के लिए सरकार ने काम किया और मिशन इंद्रधनुष के तहत ही देश भर में 27 हजार से ज्यादा कोल्ड चेन पॉइंट्स बनाए. इन सभी केंद्रों पर फ्रिज और डीपफ्रीजर्स लगाए गए जिससे टीकों को सही तापमान में रखा जा सके.
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