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जब 22 साल की एक लड़की ने खुफिया रेडियो सेवा शुरू कर अंग्रेजों को दिया था चकमा

News18Hindi
Updated: February 13, 2020, 9:38 AM IST
जब 22 साल की एक लड़की ने खुफिया रेडियो सेवा शुरू कर अंग्रेजों को दिया था चकमा
आजादी की लड़ाई में स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी आवाज जनता तक पहुंचाने के लिए रेडियो का इस्तेमाल किया था

रेडियो (Radio) का इस्तेमाल आजादी के लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा भी किया गया. कांग्रेस (Congress) की एक महिला नेता ने पहली बार खुफिया रेडियो सेवा (Secret Radio Service) की शुरुआत की थी.

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आज वर्ल्ड रेडियो डे (World Radio Day) है. 13 फरवरी को पूरी दुनिया में रेडियो का महत्व बताने और इसको लेकर जागरुकता फैलाने के लिए हर साल रेडियो डे मनाया जाता है. आज के वक्त में जब दुनिया टीवी से निकलकर कंप्यूटर और मोबाइल जैसी हाईफाई टेक्नोलॉजी तक पहुंच चुकी है, रेडियो का महत्व कम नहीं हुआ है.

एक वक्त ऐसा भी आया था, जब टीवी के आने से ऐसा लगा था कि रेडियो के दिन खत्म हो जाएंगे. लेकिन टीवी के बाद भी दुनिया कितनी बदल गई, रेडियो की रौनक अब भी बनी हुई है.

1918 में पहली बार ली द फोरेस्ट ने न्यूयॉर्क के हाईब्रिज इलाके में दुनिया का पहला रेडियो स्टेशन शुरू किया. शुरुआत में इसे पुलिस की पाबंदी झेलनी पड़ी और इसके सिर्फ सरकारी इस्तेमाल को मंजूरी दी गई. बाद में प्राइवेट तौर पर भी रेडियो सेवा शुरू हुई.

जब भारत में पहली बार आया रेडियो

भारत में रेडियो 1924 में आया. इसे लाने वाला था मद्रास प्रेसिडेंट क्लब. 3 साल तक इसमें काम किया गया, फिर 1927 में आर्थिक मुश्किलों के चलते इसे बंद कर दिया गया. इसी साल बॉम्बे के व्यापारियों ने एक बार फिर बॉम्बे और कोलकाता में रेडियो स्टेशन बनवाए. 1930 तक इसमें काम चला फिर 1932 में सरकार ने इसकी कमान अपने हाथों में ले ली. 1936 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रख दिया गया.

रेडियो का इस्तेमाल आजादी के लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा भी किया गया. कांग्रेस की एक महिला नेता ने पहली बार खुफिया रेडियो सेवा की शुरुआत की थी. एक कॉलेज जाने वाली लड़की की कांग्रेस के लिए खुफिया रेडियो सेवा शुरू करने की कहानी दिलचस्प है.

world radio day when a 22 year old girl started congress secret radio service against british rule
उषा मेहता ने खुफिया रेडियो सेवा की शुरुआत की थी
कॉलेज जाने वाली एक लड़की ने शुरू की थी खुफिया रेडियो सेवा
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के नेताओं और जनता तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए उषा मेहता नाम की महिला ने खुफिया रेडियो सेवा की शुरुआत की थी. बाद में वो रेडियो वूमेन के नाम से मशहूर हुईं.

उषा मेहता आजादी हासिल करने के लिए महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते से प्रभावित थीं. उन्होंने बापू के बताए रास्ते पर चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में खुद को झोंक दिया था. 9 अगस्त 1942 को बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान से भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. महात्मा गांधी के साथ कांग्रेस के सारे बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए. उषा मेहता समेत कांग्रेस के कुछ छोटे नेता गिरफ्तार होने से बच गए थे.

ये लोग गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराकर बापू के भारत छोड़ो आंदोलन की आवाज बने रहे. लेकिन बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी में उनकी आवाज कहां तक सुनी जाती? 9 अगस्त 1942 की शाम कांग्रेस के कुछ युवा समर्थकों ने बॉम्बे में बैठक की. इनलोगों का विचार था कि भारत छोड़ो आंदोलन की आग मद्धिम न पड़ने पाए, इसके लिए कुछ कदम उठाने जरूरी थे. इनलोगों का मानना था कि अखबार निकालकर वो अपनी बात लोगों तक नहीं पहुंचा पाएंगे. क्योंकि ब्रिटिश सरकार के दमन के आगे अखबार की पहुंच सीमित होगी.

इस बैठक में रेडियो की समझ रखने वाले उषा मेहता जैसे युवा भी थे. यहीं से संचार के नए साधन रेडियो के इस्तेमाल के जरिए क्रांति की अलख जगाए रखने का आयडिया आया.

खुफिया रेडियो से प्रसारित किए जाते थे बापू समेत कांग्रेसी नेताओं के भाषण
अंग्रेजों के खिलाफ खुफिया रेडियो सर्विस शुरू करने वालों में उषा मेहता के साथ थे बाबूभाई ठक्कर, विट्ठलदास झवेरी और नरीमन अबराबाद प्रिंटर. प्रिंटर इंग्लैंड से रेडियो की टेक्नोलॉजी सीखकर आए थे. उषा मेहता खुफिया रेडियो सर्विस की एनआउंसर बनाई गईं. पुराने ट्रांसमीटर को जोड़ तोड़कर इस्तेमाल में लाए जाने लायक बनाया गया और इस तरह से अंग्रेजों के खिलाफ सीक्रेट रेडियो सर्विस कांग्रेस रेडियो की शुरुआत हुई.

14 अगस्त 1942 को उषा मेहता ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक खुफिया ठिकाने पर कांग्रेस रेडियो की स्थापना की. इस खुफिया रेडियो सर्विस का पहला प्रसारण 27 अगस्त 1942 को हुआ. पहले प्रसारण में उषा मेहता ने धीमी आवाज में रेडियो पर घोषणा की- ये कांग्रेस रेडियो की सेवा है, जो 42.34 मीटर पर भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है.

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उषा मेहता रेडियो वूमेन के नाम से मशहूर हुईं


उस वक्त उषा मेहता के साथ विट्ठलभाई झवेरी, चंद्रकांत झवेरी, बाबूभाई ठक्कर और ननका मोटवानी साथ थे. ननका मोटवानी शिकागो रेडियो के मालिक थे, इन्होंने ही रेडियो ट्रांसमिशन का कामचलाऊ उपकरण और टेक्निशियन उपलब्ध करवाए थे.

आजादी के आंदोलन को आवाज देने के लिए कांग्रेस रेडियो शुरू हो चुका था. कांग्रेस रेडियो के साथ युवा कांग्रेसियों के नेताओं के साथ डॉ राममनोहर लोहिया, अच्यूतराव पटवर्धन और पुरुषोत्तम जैसे सीनियर नेता भी जुड़ चुके थे. कांग्रेस रेडियो के जरिए महात्मा गांधी और कांग्रेस के दूसरे बड़े नेताओं के भाषण प्रसारित किए जाते.

ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई खुफिया रेडियो सेवा
ब्रिटिश हुकूमत की नजरों से बचाने के लिए इस खुफिया रेडियो सेवा के स्टेशन करीब-करीब रोज बदले जाते थे. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद खुफिया कांग्रेस रेडियो सेवा को ज्यादा दिनों तक नहीं चलाया जा सका. 12 नवंबर 1942 को ब्रिटिश हुकूमत ने उषा मेहता समेत इसे चलाने वाले सारे लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

अंग्रेजों के सीआईडी विभाग ने छह महीने तक खुफिया रेडियो सेवा चलाने के मामले की जांच की. उषा मेहता समेत उनके साथी जेल में डाल दिए गए थे. हाईकोर्ट में इस मामले का मुकदमा चला और उषा मेहता को चार साल कैद की सजा सुनाई गई.

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First published: February 13, 2020, 9:38 AM IST
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