World Sparrow Day: गौरैया के लिए लाखों घोंसले बना चुका शख्स, जिसे PM ने कहा स्पैरो-मैन

हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)

हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)

गुजरात के जगत किंखाबवाला (sparrow-lover Jagat Kinkhabwala in Gujarat) गौरैया के लिए लाखों घोंसले तैयार कर चुके हैं. साथ ही स्कूल-कॉलेजों और संस्थाओं में भी लोगों को इसका प्रशिक्षण देते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2021, 9:45 AM IST
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हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस (World Sparrow Day) मनाते हैं. तेजी से कम होती जा रही इस नन्ही चिड़िया को बचाए रखने के लिए नेचर फॉरेवर सोसायटी फॉर इंडिया (NFSI) ने इस दिन को मनाने की शुरुआत की, जो 50 से ज्यादा देशों में मनाया जा रहा है. देश की राजधानी में तो इसे स्टेट बर्ड घोषित किया जा चुका है. वैसे इन सारी कोशिशों के बीच कई निजी कोशिशें भी हैं, जो गौरेया को सहेज रही हैं. जगत किंखाबवाला ऐसा ही एक नाम हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'स्पैरो मैन' कहा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में इस 'स्पैरो मैन' का जिक्र किया था. 65 बरस का ये स्पैरो मैन कहता है- गौरैया को ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, बस खुली खिड़कियां, मिट्टी के सकोरे में पानी और चावल के टूटे दाने. आटे की लोइयां रख दें तो दावत समझिए. वे अपनी कहानी कुछ यूं सुनाते हैं-

हम बाहर जा रहे थे. कार आधा रास्ता तय कर चुकी, तभी मुझे खुटका-सा हुआ. बिटिया से पूछा- 'तुमने खिड़की बंद तो नहीं कर दी!' 'हां'. ये बोलने के साथ ही उसका चेहरा कुम्हला गया था. हम तुरंत वापस लौटे. घर पहुंचे तो देखा- गौरैया का जोड़ा खिड़की के बाहर इंतजार में था. एक चिड़िया रह-रहकर खिड़की के कांच पर चोंच मारती. अंदर पहुंचकर मैंने तमाम खिड़कियां खोल दीं.

जोड़ा सांय से अंदर आया और अपने बच्चों को दाना देने लगा. चहचहाहट से घर भर गया था. उसके बाद खिड़कियां कभी बंद नहीं हुईं.
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गुजरात के जगत किंखाबवाला स्पैरो-मैन कहलाते हैं


गर्मियों में नानी के घर जाते तो रात में आंगन में सोते. खूब अच्छी तरह से लिपा हुआ लंबा-चौड़ा आंगन, जहां कई पेड़ होते. उन्हीं के इर्द-गिर्द चारपाई बिछती. सुबह एक साथ कई आवाजों से नींद खुलती. बड़ों की बातों, मां-मौसियों की हंसी, रसोई की खटर-पटर और गौरैया की आवाज. किसी पंक्षी को सबसे पहले और सबसे करीब से जाना तो वो है गौरैया. दिनभर आंगन में उनकी चहचहाहट गूंजती.

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वक्त बीता. मैं कॉर्पोरेट जगत का हिस्सा बन चुका था. दिन मीटिंग्स में बीतता. रात उनकी तैयारियों में. अहमदाबाद में अपना घर सजाया. घर में खूब पेड़-पौधे भी लगाए, तब भी कोई कमी थी जो खटकती थी. सोचता, फिर बिसर जाता. काम के सिलसिले में एक रोज सफर पर था. सफर में ही एक मैगजीन दिखी. उसके कवर पर एक चिड़िया चहक रही थी. घोंसले में मुंह खोले छोटे-छोटे बच्चे एक-दूसरे से चोंच लड़ा रहे थे. देखते ही मैगजीन मैंने लपककर उठा ली. आर्टिकल पढ़ना शुरू किया. वो गायब होती गौरैया के बारे में था.

सीने पर जैसे किसी ने पूरी ताकत से मुक्का मारा हो. तो ये चीज 'मिसिंग' है- मेरे बगीचे से, मेरे बच्चों के बचपन से और मेरी जिंदगी से.

लौटा तो लैपटॉप, फाइलें अलग रख दीं और गौरैया को घर बुलाने की तैयारी करने लगा. मैंने गत्तों से घोंसला बनाया. उसपर रंग किया. बच्चे देख रहे थे कि पापा ऑफिस का काम छोड़कर गत्ते-रंग लिए बैठे हैं. उन्हें भी मजा आ रहा था. हमने मिशन- गौरैया शुरू किया. मिट्टी के सकोरे लाए गए, उनपर दाना-पानी रखा. हम रोज सुबह आंखें खोलते और सबसे पहले बगीचे का जायजा लेते. बचपन मानो लौट आया था. बस, गौरैया का आना बाकी था. एक रोज तड़के ही उठ गया. देखा तो गौरैया के कई जोड़े बगीचे में थे. मैं बिना कोई खटका किए देखता रहा और लौट आया. जोड़े बढ़ते गए. अब मेरे बगीचे में अलग-अलग मौसमों में लगभग 26 तरह के पंक्षी आते हैं.

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घोंसले में मुंह खोले छोटे-छोटे बच्चे एक-दूसरे से चोंच लड़ा रहे थे -सांकेतिक फोटो (pixabay)


गौरैया गायब हो रही है! क्योंकि उसे घोंसला बनाना नहीं आता. वो बसने के लिए हमेशा किसी संद (कोने) की खोज में रहती है. जैसे घर का वेंटिलेटर या कोई ऐसा कोना, जहां आहटें कम से कम हों.

उसी जगह ये कुछ फूस-तिनके रख देती है और उसे ही अपना घर मान लेती है. अब अपार्टमेंट होते हैं. कोनों की गुंजाइश कम से कम. चौकोर-आयताकार डिब्बों की शक्ल में बने घरों में गौरैया का घर खो गया है. कहीं अगर वो फूस-तिनके रखने की गुस्ताखी कर भी ले तो तुरंत वो 'कचरा' डस्टबिन में चला जाता है. काफी कुछ पढ़ा. कुछ अपने ही बगीचे में आ रहे पंक्षियों को देख-देखकर समझा.

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साल 2008 से स्कूलों में जाकर वर्कशॉप लेने लगा. बच्चों को गत्ते के बेकार डिब्बों को तोड़-मोड़कर घोंसला बनाना सिखाता. सब मिलकर उन्हें रंग-रोगन करते. उन्हें बताता कि गौरैया का होना हमारे लिए कितना जरूरी है. धीरे-धीरे बच्चे और फिर बड़े भी जुड़ने लगे. स्कूल- कॉलेज से होता हुआ ये सिलसिला बढ़ता चला गया. अब तो ऑनलाइन भी घोंसले मंगाए जा सकते हैं. हालांकि मेरा मानना है कि घर पर ही घोंसला तैयार करना सबसे बढ़िया है.

हमारे आसपास कोई भी चीज निकम्मी नहीं है. बच्चों से कहता हूं कि अपनी कल्पना को छुट्टा छोड़ दो और फिर घोंसला सजाओ. साइज और कुछेक बातें भर याद रखनी हैं.

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जगत अबतक लाखों घोंसले बनवा-बंटवा चुके हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


अबतक 1 लाख, 10 हजार से ज्यादा घोंसले बनवा-बंटवा चुके जगत गौरैया के बारे में उतनी ही रवानगी से बात करते हैं जैसे अपने बच्चों की बात हो.

'ये पंक्षी मानव बसाहट के साथ ही जी सकता है. जब हम मच्छर-मक्खी का दखल बर्दाश्त कर पाते हैं तो गौरैया तो निहायत नेक पंक्षी है. आपके स्मार्टफोन पर सबसे बढ़िया अलार्मक्लॉक से कहीं प्यारी है इसकी चहचहाहट.'

बित्तेभर की चिड़िया पर गुस्सा होने वाले लोगों से भी जगत का साबका कई बार पड़ा.

थोड़ी हैरतभरी आवाज में वो एक वाकया बांटते हैं. 'पिछले साल की बात है. मैं एक वर्कशॉप ले रहा था. तभी किसी ने हाथ ऊपर उठाया. वर्कशॉप के दौरान सवाल-जवाब भी होते रहते हैं. मैंने उनतक माइक पहुंचाने का इशारा किया. माइक हाथ में लिए वो शख्स एकदम से फफक पड़ा. थोड़ा संभलने के बाद उसने जो बताया, वो कोई नई बात नहीं थी लेकिन तब भी हैरानी की बात तो थी. उसने बताया कि उसके घर अक्सर गौरैया आती. जल्द ही कुनबा बढ़ने लगा. साथ में कचरा भी. आसपास तिनके, रुई, घास-फूस बिखरे दिखते. ये सब तो फिर भी चल जाता था लेकिन चहचहाहट को कैसे रोकें. लिहाजा वो शख्स चिड़िया-मार हो गया.'

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उसने बताया- मैं पूरी घेरबंदी करता. खिड़की-दरवाजे बंद कर देता और फिर उन्हें मार दिया करता. धीरे-धीरे मेरे घर पर उनका आना एकदम बंद हो गया. अब मुझे उनका न होना अखरने लगा है.

जगत बताते हैं- गौरैया से लगभग नफरत करने वाला वो शख्स वर्कशॉप में ये जानने पहुंचा था कि उन्हें वापस कैसे बुलाए.
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