भारत में आज- शुरू हुई थी II World War की तस्वीर बदलने वाली कोहिमा की लड़ाई

कोहिमा की लड़ाई (Battle of Kohima) द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों के लिए एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

कोहिमा की लड़ाई (Battle of Kohima) द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों के लिए एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

4 अप्रैल 1944 को भारत (India) में अंग्रेजों और जापानी सिपाहियों के बीच कोहिमा की लड़ाई (Battle of Kohima) शुरू हुई थी जिसने द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) में निर्णायक मोड़ ले लिया था.

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जब भी इतिहास (History) में द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) की बात होती है, तब हिटलर, जर्मनी, यूरोप, अमेरिका जैसे देशों का ही जिक्र होता है. इसके अलावा एशिया की घटनाओं में जापान (Japan) के पर्ल हार्बर, जापान का वर्चस्व आदि की चर्चा होती है. वहीं इस युद्ध और भारत (Indian) के मामले में आजाद हिंद फौज और गांधीजी के नजरिए की बात होती है. लेकिन भारतीय इतिहास में कोहिमा की लड़ाई (Battle of Kohima) इस विश्व युद्ध में ऐसा निर्णायक मोड़ था जिसका जिक्र बहुत ही कम होता है.

क्या था तब माहौल

1944 में एशिया में जापानियों के हौसले बुलंद थे. ढाई साल पहले जापनी सेना ने पर्ल हार्बर पर हमला कर अमेरिकों को बैकफुट कर रखा था, लेकिन प्रशांत महासागर में वह अमेरिकों से मात खा रहा था. वहीं एशिया में जापानी सेना म्यांमार पार कर भारतीय सीमा को छू चुकी थी. अंग्रेजों के पूर्वी एशिया में पैर उखड़ चुके थे. लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों में जंग जोरों पर थी.

भीषण लेकिन निर्णायक मोड़ वाला
4 अप्रैल 1944 को में ब्रिटिश सेना और जापान एवं आजाद हिंद फौज की संयुक्त सेना के बीच कोहिमा की लड़ाई लड़ी गई जो एक बहुत एक भयंकर युद्ध साबित हुआ था. इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यह एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ था. 22 जन 1944  तक हुई इस लड़ाई को इतिहासकार तीन चरणों में बांटते है.

तीन गुना जापानी सैनिकों की मौत

4 अप्रैल 1944 को जापानी सैनिकों ने मौजूदा नागालैंड की राजधानी कोहिमा पर हमला कर दिया.  तीन महीने चले इस युद्ध में 53 हजार जापानी सैनिक मारे गए थे. वहीं ब्रिटिश सेना के 16 हजार सिपाही मारे गए थे. ब्रिटिश सेना में भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के सैनिक भी शामिल थे



शुरुआत से मुश्किल में रही जापानी सेना

इस युद्ध का पहला चरण 2 अप्रैल से 16 अप्रैल तक चला जिसमें जापानियों ने कोहिमा की चोटी पर कब्जा करने का प्रयास किया. इसमें इम्फाल और कोहिमा के बीच की कड़ी को तोड़ना मुख्य उद्देश्य था जिससे ब्रिटिश सेना को इम्फाल में रसद आपूर्ति करने से रोका जा सके. लेकिन इसमें जापानियों को ज्यादा सफलता नहीं मिली.

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जापानियों के इस लड़ाई का मुख्य मकसद कोहिमा इम्फाल (Kohima Imphal) के बीच संपर्क तोड़ना था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


ब्रिटिश सेना का जवाब

18 अप्रैल से लेकर 13 मई के दौरान ब्रिटिश सेना ने काउंटर अटैक किया और जापानियों से उन जगहों को वापस हासिल करने का प्रयास किया जो उनसे छिन गई थी. जापानियों ने एक बार चोटी छोड़ दी थी लेकिन उनहोंने कोहिमा इम्फाल सड़क पर अवरोध कायम रखा. इस दौरान जंग भीषण ही होती जा रही थी.

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कमजोर होते जापानी

16 मई से 22 जून तक ब्रिटिश सेना का पलड़ा भारी होता गया और इस युद्ध का अंत 22 जून 1944 को हुआ जब ब्रिटिश सेनाएं कोहिमा और इम्फाल से मिल गईं थी. जापानी सैनिकों को इस युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. इसका नतीजा यह हुआ कि जापान को बर्मा से ही पीछे हटने का फैसला लेना पड़ा.

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कोहिमा की लड़ाई (Battle of Kohima) जापानी सैनिकों के लिए बहुत ही नुकसान वाली साबित हुई. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


इनसे हुआ ज्यादा नुकसान

बताया जाता है कि जपानी सैनिकों को युद्ध से उतना नुकसान नहीं हुआ जितना कि हैजा, डाइफ़ायड और मलेरिया के कारण मारे गए. रसद खत्म होने के कारण बड़ी संख्या में सैनिकों ने भूख के कारण अपनी जान गंवाई थी.

 जब पूर्वोत्तर में घुसकर आजाद हिंद फौज ने फहराया तिरंगा

हैरानी की बात ये है कि युद्ध में दोनों तरफ से भारतीय सैनिक थे. विश्वयुद्ध के दौरान नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने देश को आजाद करवाने के लिए सही अवसर माना था और जापान सरकार की मदद से अंग्रेजों को हराकर भगाने की योजना बनाई थी. एक तरफ जापानी सेना में नेताजी की आजाद हिंद फौज थी तो दूसरी ओर ब्रिटिश आर्मी में भी बहुत सारे भारतीय थे.
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