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हमारी तैयारी विनाश की तो है, लेकिन बचाव की नहीं!

Bhavesh Saxena | News18India
Updated: March 18, 2020, 6:22 PM IST
हमारी तैयारी विनाश की तो है, लेकिन बचाव की नहीं!
दुनिया के विनाश से बचने की हमारी तैयारी किस तरह की है

स्पेनिश फ्लू (Spanish flu) रहा हो, एड्स (Aids) या डेंगू (dengue)... कई बार ऐसी स्थिति बनी है कि दुनिया विषाणुओं के हमले के सामने लाचार साबित हुई और सालों के इंतज़ार और कई मौतों के बाद कोई इलाज मुहैया हो सका. क्या कहीं हमारे नज़रिए और विकास की परिकल्पना में कोई लूपहोल है?

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  • Last Updated: March 18, 2020, 6:22 PM IST
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दुनिया में पिछले तीन-चार महीनों और भारत में पिछले करीब तीन हफ्तों से कोरोना वायरस (coronavirus) के कहर की खबरें लगातार बनी हुई हैं. ऐसे में कई तरह के विचार और तथ्य भी सामने आ रहे हैं. ऐसा ही एक प्रश्न यह है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी (science and technology) की मदद से मानव कल्याण की दिशा में हम कितने आगे बढ़े और विनाश की तरफ कितने?

इस सवाल के जवाब में हमें कुछ आंकड़ों का रुख करना चाहिए. युद्ध की​ स्थिति में जीतने या दुश्मनों को कुचलने के लिए किस स्तर पर हथियारों पर खर्च किया जाता है, ये आंकड़े आपको चौंका सकते हैं. दूसरी ओर, ये आंकड़े भी आपको चौंकाएंगे कि दुनिया में स्वास्थ्य को लेकर आशंकित खतरों को भांपने और उनसे लड़ने की हमारी तैयारी कितनी कम है.

पहले हथियारों का उद्योग समझें
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट यानी सिपरी की रिपोर्ट की मानें तो 2018 में विभिन्न देशों की सेनाओं के लिए होने वाले रक्षा सौदों की कुल कीमत 1822 अरब डॉलर यानी 1352 खरब रुपये से भी ज़्यादा रही. सिपरी की ही रिपोर्ट में ज़िक्र किया गया कि 90 के दशक में शीत युद्ध के बाद से दुनिया की सेनाओं में हथियारों की खरीद फरोख्त बेतहाशा बढ़ी है. पिछले कई सालों में यह आंकड़ा दुनिया की जीडीपी के 4 प्रतिशत हिस्से तक का भी रहा है.



कई सालों में यह आंकड़ा दुनिया की जीडीपी के 4 प्रतिशत हिस्से तक का भी रहा है




क्या इतना ही है हथियारों का कारोबार?
सिपरी जैसी संस्थाएं अस्ल में, सिर्फ सेनाओं के कारोबार का डेटा जुटाती और रखती हैं. इसके अलावा भी दुनिया में एक बड़ा अपराध जगत है और हथियारों के गैर कानूनी निर्माण से लेकर गैर कानूनी सौदों का एक बड़ा बाज़ार है. वर्ल्ड पॉलिसी इंस्ट्टियूट के पोर्टल पर एक लेख के मुताबिक हालांकि हथियारों के अवैध कारोबार का अंदाज़ा लगाना टेढ़ी खीर है लेकिन मोटे तौर पर हर साल कम से कम यह कारोबार 60 अरब डॉलर का है.

अब बात सेहत के मोर्चे पर
एक तरफ जंग की तैयारी के आंकड़े हमने देखे जो लगातार बढ़ते जा रहे हैं और दूसरी तरफ स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में रिसर्च पर कितना खर्च किया जाता है, डब्ल्यूएचओ ने अक्टूबर 2018 में इसके आंकड़े जारी किए. हथियारोंं का कारोबार जहां दुनिया के कई देशों की जीडीपी का अच्छा खासा हिस्सा है, वहीं इस मोर्चे पर हर देश को फिसड्डी कहा जा सकता है.

उच्च आय वाले देशों में चिकित्सा विज्ञान संबंधी रिसर्च पर कुल खर्च जीडीपी का 0.19 फीसदी ही है जबकि निम्नतर आय वाले देशों में इस रिसर्च पर जीडीपी का 0.01 फीसदी ही खर्च हो पाता है. यानी हमने रसायन विज्ञान तक का इस्तेमाल अब तक मनुष्य के हित में बहुत कम किया है जबकि हथियार और उद्योगों के विकास में बहुत ज़्यादा.

सेहत के मामले में भी दुनिया विनाश की तरफ जा रही है


विनाश के और भी पहलू हैं
सिर्फ हथियारजनित हिंसा ही नहीं बल्कि पर्यावरण को नुकसान, जीवन शैली का लगातार खराब होना, खाद्य पदा​र्थों की शुद्धता से समझौते और उद्योगजनित विकास के जीवन पर तमाम तरह के दुष्प्रभावों को अगर देखा जाए तो विनाश की दिशा में खर्च का कुल हिसाब लगाने में पसीने छूट सकते हैं. इसके बरक्स मनुष्य को आने वाले खतरों से बचाने और उसके जीवन को स्वास्थ्य के नज़रिए से बेहतर बनाने के लिए हमारी तैयार तमाम तरह के सवालिया निशानों से घिरी हुई है.

कविताओं में उभरती चिंताएं
युवा कवि और हिंदी के प्रोफेसर संजीव जैन अपनी एक समसामयिक कविता में युद्ध और मानवीय दृष्टिकोण के पहलुओं पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखते हैं :
युद्ध जारी है
डर, अनिश्चितता, शंका के खिलाफ
ऐसा नहीं है कि
ऐसा पहली बार हो रहा है
मौतों का होना भी
कोई अनोखी घटना नहीं है
फिर पूरी दुनिया में खौफ क्यों है?

इसी तरह की एक और चिंता जताती कविता में हिंदी के शिक्षक और स्थापित होते कवि ब्रज श्रीवास्तव लिखते हैं :
एक विषाणु
हमारी मुस्कराहट के फूल पर
बैठ गया है
एक विषाणु हमारे
पैरों के तलवे में
कांटा बनकर घुस गया है...

कुल मिलाकर इस वैश्विक आपदा के समय में पूरी दुनिया को एकजुट होकर यह विचार करना ही होगा कि क्यों हम मजबूर हो जाते हैं? स्वास्थ्य संबंधी किसी आपदा के लिए हमारी पास समय से क्यों पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं होते? क्यों ऐसे समय में हम मानवीयता को भी भुला देते हैं और जिन दवाओं या उपकरणों आदि का वितरण हर ज़रूरतमंद तक आसानी से होना चाहिए, वह महंगाई या कालाबाज़ारी की भेंट क्यों चढ़ जाता है...

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First published: March 18, 2020, 6:22 PM IST
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