दुनिया की 4 अरब से ज्यादा आबादी के कोरोना संक्रमित होने पर तैयार होगी हर्ड इम्युनिटी!

दुनिया की 4 अरब से ज्यादा आबादी के कोरोना संक्रमित होने पर तैयार होगी हर्ड इम्युनिटी!
दुनिया में कोरोना संक्रमितों की संख्या 60 लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है.

दुनिया की आबादी इस वक्त करीब साढ़े सात अरब है. अगर हर्ड इम्यूनिटी (Herd Immunity) की थ्योरी पर भरोसा किया जाए तो इसके लिए दुनिया के 400 करोड़ से ज्यादा लोगों को संक्रमित होना होगा. इस थ्योरी की आलोचना WHO भी कर चुका है.

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दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 60 लाख के आंकड़े को पार कर गई है. लेकिन अभी तक इस वायरस की कोई सटीक दवा या फिर वैक्सीन विकसित नहीं हो पाई है. द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट कहती है कि कोरोना वायरस के संक्रमितों की संख्या प्रदर्शित किए आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकती है. दवा या वैक्सीन न मिलने की वजह से माना जा रहा है को कोरोना वायरस अभी बना रहेगा. सेकंड वेव का खतरा कई देशों पर बना हुआ है. लेकिन इसके बावजूद हर्ड इम्यूनिटी से दुनिया अभी बहुत दूर है.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक कोरोना वायरस से लोगों के बीच हर्ड इम्यूनिटी तभी ड़ेवलप होगी जब तकरीबन 60 प्रतिशत जनसंख्या संक्रमित हो चुकी हो. हालांकि इस साठ प्रतिशत के आंकड़े को लेकर भी अभी तक सभी एक्सपर्ट्स में एक राय नहीं है. इस वक्त पूरी दुनिया में सिर्फ एक देश स्वीडन ही है जो हर्ड इम्यूनिटी के एक्सपेरिमेंट पर काम कर रहा है. मार्च में जब कोरोना वायरस फैला था तब ब्रिटेन में भी हर्ड इम्यूनिटी की बात कही गई थी लेकिन आलोचनाओं के बाद सरकार को अपनी बातों से पीछे हटना पड़ा था.

अब तक दुनिया में कोरोना वायरस किसी भी जगह इस तरह नहीं फैला है कि वो उस शहर या राज्य के साठ प्रतिशत लोगों को संक्रमित कर दे. चीन का वुहान हो, इटली का लोम्बार्डी या फिर अमेरिका का न्यूयॉर्क. इऩ सभी जगहों पर संक्रमण के कुल मामले अधिकतम 20 प्रतिशत तक पहुंचे हैं. हावर्ड यूनिवर्सिटी में संक्रामक रोगों के एक्सपर्ट माइकल मिना का कहना है कि हर्ड इम्यूनिटी की बात तो अभी सोची भी नहीं जा सकती है. इसके लिए हमें कोरोना वायरस को समाज बिल्कुल फैलने देना होगा. लेकिन ये सुरक्षित रास्ता नहीं है क्योंकि ये वायरस अभी बिल्कुल नया है और ये किस ढंग से रिएक्ट करेगा, कहना मुश्किल है.



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प्रतीकात्मक तस्वीर




आ सकती है सेकंड वेव
इससे पहले अमेरिका की मिनेसॅटा यूनिवर्सिटी के संक्रामक रोग रिसर्च केंद्र के शोधकर्ताओं ने 300 साल के इतिहास में फ्लू संबंधी बड़ी महामारियों को लेकर अध्ययन किया. सीबीएस न्यूज़ और अटलांटा जर्नल में प्रकाशित खबरों के मुताबिक रिसर्च में पाया गया कि पहले दौर के छह महीने के बाद तकरीबन हर महामारी का दूसरा दौर आता है, जो ज़्यादा घातक साबित होता है. करीब दो सालों तक और भी दौर आते हैं, लेकिन बाद के दौर अपेक्षाकृत कम असरकारी होते हैं.

हर्ड इम्यूनिटी की थ्योरी पर सवाल
इससे पहले भारत में हर्ड इम्यूनिटी के आधार पर ही संक्रमण पर काबू पाए जाने की थ्योरी दी गई थी. भारतीय वैज्ञानिकों ने कहा था कि भारत की करीब 60 फीसदी आबादी को संक्रमित होकर वायरस के खिलाफ इम्यूनिटी विकसित करना होगी. लेकिन हर्ड इम्यूनिटी की थ्योरी पर सवाल खड़े करते हुए फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट कहती है कि यह थ्योरी विवादित है जिसे यूके पहले ही खारिज कर चुका है.

कितनी है विश्व की जनसंख्या
अगर हर्ड इम्यूनिटी की थ्योरी पर भरोसा किया जाए तो इसके लिए दुनिया के करीब 400 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना संक्रमित होना जरूरी है. या फिर किसी एक शहर या राज्य की 60 प्रतिशत जनसंख्या कोरोना संक्रमित हो तभी हर्ड इम्यूनिटी कारगर होगी. वर्ल्डोमीटर वेबसाइट के मुताबिक वर्तमान में विश्व की जनसंख्या तकरीबन साढ़े सात अरब है. ऐसे में अगर दुनिया को कोरोना से हर्ड इम्यूनिटी हासिल करनी है तो 400 करोड़ से ज्यादा लोगों को संक्रमित होना होगा. ये संख्या सुनने में जितनी खतरनाक है, हर्ड इम्यूनिटी के कॉन्सेप्ट पर भरोसा करना भी उतना ही मुश्किल.

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प्रतीकात्मक तस्वीर


हर्ड इम्यूनिटी के थ्योरी की हुई आलोचना
गौरतलब है कि हर्ड इम्यूनिटी की आलोचना विश्व स्वास्थ्य संगठन तक चुका है. WHO के हेल्थ इमरजेंसी डायरेक्टर डॉ. रेयान ने चेतावनी देते हुए कहा है कि, 'यह सोचना गलत था और आज भी है कि कोई भी देश कोविड-19 के लिए अपनी आबादी पर कोई जादू चलाकर उसमें इम्यूनिटी भर देगा. इंसान जानवरों के झुंड नहीं हैं. हर्ड इम्यूनिटी की बात तब करते हैं, जब यह देखना होता है कि किसी आबादी में कितने लोगों को वैक्सीन की जरूरत है. यह एक बहुत ही खतरनाक अंकगणित होगा.

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First published: May 31, 2020, 1:30 PM IST
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