सवा सौ साल पुराना यूरोपियन रेस्टोरेंट, शाकाहार परोसने के कारण जिसके मालिक को कहा गया पागल

सवा सौ साल पुराना यूरोपियन रेस्टोरेंट, शाकाहार परोसने के कारण जिसके मालिक को कहा गया पागल
इस रेस्त्रां को एक ही खानदान के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत की तरह संभालते आ रहे हैं

रेस्त्रां (restaurant) खुलने पर शहर में तरह-तरह की बातें हुई. खालिस साग-सब्जियां परोसने वाले इस यूरोपियन रेस्त्रां (vegetarian restaurant in Europe) को काफी खराब नजर से देखा जाता रहा.

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कोरोनो वायरस (coronavirus) के केंद्र रहे वुहान (Wuhan) में जंगली जानवरों के मांस पर बैन (meat ban) लगा दिया गया. माना जा रहा है कि मांस ही वायरस के फैलने की वजह रहा. वैसे मीट-ईटर देशों में कोरोना से पहले से ही शाकाहार (vegetarian diet) का चलन तेजी से बढ़ता दिखा है. हालांकि आज से सौ साल पहले बर्फीले देशों में वेजिटेरियन रेस्त्रां खोलना आसान बात नहीं थी. सबसे पुराना वेजिटेरियन रेस्त्रां माने जाने वाले स्विस रेस्त्रां के मालिक को इसकी वजह से मानसिक दिवालिया तक घोषित कर दिया गया था.

स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में है दुनिया का प्राचीनतम वेज रेस्त्रां, जो साल 1898 से चल रहा है. पूरी तरह से शाकाहारी खानपान वाले इस रेस्त्रां का नाम है हौस हिल्ट (Haus Hiltl), जिसे एक ही खानदान के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत की तरह संभालते आ रहे हैं. यहां तक कि अपने खालिस शाकाहारी अंदाज के कारण इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड (guinness book of world record) में दर्ज हो चुका है. यहां भारतीय अंदाज में थाली सिस्टम भी है.

तकरीबन 120 साल पहले हिल्ट परिवार के Ambrosius Hiltl ने इसकी शुरुआत शहर को अपने परिवार की शाकाहारी रेसिपीज से परिचय करवाने के लिए शुरू की थी. तब इसका नाम था Vegetarierheim and Abstinence-Café और यहां के मेन्यू में आलू और जड़ वाली दूसरी सब्जियां ही हुआ करती थीं. इसके बाद से कई बार इस रेस्त्रां के नाम में बदलाव हुआ. मेन्यू में भी डिशेज जुड़ती गईं लेकिन जो बात नहीं बदली, वो थी शाकाहारी खाना ही परोसने की.



शुरुआत शहर को अपने परिवार की शाकाहारी रेसिपीज से परिचय करवाने के लिए की गई थी (Photo-pixabay)




हालांकि उस दौर में यूरोप में शाकाहार का प्रचलन नहीं के बराबर था और सूअर और गाय का गोश्त ही मुख्य रूप से खाया जाता था. जो लोग साग-भाजियां खाते भी थे, उन्हें हिप्पी की तरह देखा जाता था यानी वो युवा पीढ़ी जो फैशन में खानाबदोश है और जो हर चीज में प्रयोग करना चाहती है. ऐसे में इस रेस्त्रां के खुलने पर शहर में तरह-तरह की बातें हुई. खालिस साग-सब्जियां परोसने वाले इस रेस्त्रां को काफी खराब नजर से देखा जाता रहा. हिल्ट परिवार को मूर्ख और पागल भी बताया जाने लगा. इन हालातों में भी परिवार ने रेस्त्रां बंद नहीं किया और आखिरकार ये अपने अनोखेपन के कारण ही चल निकला.

वेजिटेरियनिज्म और वीगन लाइफस्टाइल के फायदे सामने आने के बाद से साल 1951 से इस रेस्त्रां की पूछ-परख बढ़ने लगी. अब यहां पर स्विस डिशेज ही नहीं, बल्कि एशियन, मेडिटेरेनियन, इंडियन तमाम तरह के शाकाहारी फ्लेवर मिलते हैं. यहां का सबसे खास पकवान है Zürcher geschnetzeltes, जो कि एक शाकाहरी स्विस डिश है. Haus Hiltl पांच मंजिला रेस्त्रां है, जहां खाने के साथ-साथ हजारों किताबें भी मिलती हैं. ये सारी किताबें दुनियाभर की शाकाहारी डिशेज के बारे बताती हैं. Meat the Green इस रेस्त्रां का सबसे लोकप्रिय फीचर है. चूंकि ज्यूरिख के अधिकतर लोग मांसाहारी है, ऐसे में शाकाहार को बढ़ावा देने के लिए रेस्त्रां मालिक ने Meat the Green नाम से कुकबुक लिखी. इसमें 60 ऐसी मीट और फिश डिशेज के बारे में लिखा गया है, जिसमें असल में मीट या फिश है ही नहीं. इसमें दूध और सोया से बने उत्पादों का इस्तेमाल किया गया है. यहां लोगों को शाकाहारी खाना पकाने के ट्रेनिंग भी दी जाती है.

यहां 60 ऐसी मीट और फिश डिशेज के बारे में लिखा गया है, जिसमें असल में मीट या फिश है ही नहीं (Photo-pixabay)


मांसाहार को तरजीह देने वाले देश में शाकाहारी रेस्त्रां क्यों खोला गया, इसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. माना जाता है कि हिल्ट परिवार के उस दौर के मुखिया एम्ब्रोसुइस हिल्ट को गठिया की बीमारी हो गई थी. 18 सदी में इसका कोई इलाज नहीं था, धीरे-धीरे मरीज बिस्तर पर रह जाता और जलद ही जिंदगी खत्म हो जाती थी. तब एक स्थानीय डॉक्टर ने मरीज से कहा कि गठिया पर कंट्रोल रखना है तो मांसाहार पूरी तरह से छोड़ना होगा. तब साग-सब्जी के नाम पर वहां ज्यादा विकल्प नहीं थे. ऐसे में हिल्ट ने खुद ही शाकाहारी डाइट के साथ प्रयोग शुरू किया. तब वो एब्सटिनेन्स नाम के एक रेस्त्रां में जाया करते थे, जहां कुछ वेजिटेरियन चीजें मिलती थीं. हिल्ट ने इसी रेस्त्रां को खरीद लिया और पूरी तरह से शाकाहारी खाना परोसने लगे.

वैसे यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के मुताबिक लोग लगातार वेजिटेरियन और वेगन डाइट की तरफ बढ़ रहे हैं. इनमें सबसे ऊपर नाइजीरिया है. इस अफ्रीकन देश में इसी साल पहला पूरी तरह से वेजिटेरियन रेस्त्रां खुला है जिसका नाम है वेजी विक्टरी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस देश में शाकाहार का कंसेप्ट कितना नया है. यहां तक कि पहले शाकाहार को "White people food" माना जाता रहा. ऐसे में एकदम से पूरा का पूरा देश शाकाहार की तरफ क्यों बढ़ने लगा! इसके पीछे पर्यावरण और खासकर क्लाइमेट चेंज पर लगातार हो रही चर्चाओं को देखा जा रहा है. कई ब्लॉगर्स इसपर लिख, बोल रहे हैं और नई पीढ़ी तेजी से इस तरफ बढ़ी है.

आलोचना के चलते हाल ही में चीन के वुहान में वाइल्ड मीट पर प्रतिबंध लग गया है (Photo-pixabay)


शाकाहारी देशों में भारत 38% के साथ सबसे ऊपर है. माना जाता है कि ईसापूर्व छठवीं शताब्दी में बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार के बाद से शाकाहार को मानने वाले बढ़े. यहां पर शाकाहारी में Lacto-vegetarianism को मानने वालों की बहुतायत है यानी वे लोग जो प्लांट-बेस्ड डाइट और दूध के उत्पाद तो खाते हैं लेकिन अंडे नहीं लेते. वहीं 13% के साथ शाकाहार के मामले में इजराइल दूसरे नंबर पर है. Judaism को मानने वाले लोग पशुओं पर हिंसा को खराब मानते हैं और शाकाहार अपना लेते हैं.

क्या है चीन में बैन की कहानी
कोरोना संक्रमण के बीच लगातार ये कहा जा रहा है कि चीन का जंगली जानवरों को खाना इस वायरस के फैलने की वजह बना. हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी लेकिन ग्लोबल स्तर पर लगातार आलोचना के चलते हाल ही में चीन के वुहान में वाइल्ड मीट पर प्रतिबंध लग गया है. ग्लोबल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये बैन वुहान में दोबारा फैल रहे संक्रमण को देखते हुए लगाया गया है. इसके लागू होने के बाद से अगले पांच सालों तक वुहान के वेट मार्केट में सांप, छिपकली, चमगादड़, चूहे, बिल्लियां, कोबरा जैसे जंतु नहीं बिक सकेंगे. वैसे लगभग महीनेभर पहले ही चीन में डॉग मीट पर भी बैन लग चुका है. ये तमाम बैन वैज्ञानिकों के इस अनुमान पर टिके हुए हैं कि जंगली जानवरों में वायरल लोड काफी ज्यादा होता है और उन्हें खाना या किसी भी तरह से उनके संपर्क में आना नई महामारी का खतरा ला सकता है.

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First published: May 24, 2020, 6:50 PM IST
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