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SC ने क्यों माना कि शादी के बाहर संबंध बनाने वाले पुरुषों को जेल नहीं जाना चाहिए?

SC ने क्यों माना कि शादी के बाहर संबंध बनाने वाले पुरुषों को जेल नहीं जाना चाहिए?

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर

‘एडल्टरी’ के अपराध को 1837 में लॉर्ड मैकॉले की अध्यक्षता में तैयार भारतीय दंड संहिता के पहले ड्राफ्ट में स्थान नहीं मिला था.

  • News18Hindi
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    सुप्रीम कोर्ट ने 150 साल पुराने एडल्टरी पर आपराधिक कानून (IPC की धारा-497) को असंवैधानिक करार दिया है. फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह बराबरी के हक के खिलाफ है. इस कानून (IPC की धारा-497) को महिला और पुरुष को समान नजर से नहीं देखने और आपराधिक कानून संवैधानिक रूप से पुरुष और महिलाओं के लिए बराबर किए जाने के तर्क देकर चुनौती दी गई थी. डेढ़ सौ साल पुराने एडल्ट्री कानून की कमियां सामने आने के बाद उसकी समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही थी. महिला-पुरुष समानता की दृष्टि से धारा 497 में यह बदलाव अहम माना जा रहा है.

    क्या है धारा 497 जिसे कोर्ट ने बताया असंवैधानिक?
    धारा 497 केवल उस व्यक्ति के संबंध को अपराध मानती थी, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं. पत्नी को न तो व्यभिचारी और न ही कानून में अपराध माना जाता था, जबकि आदमी को पांच साल तक जेल का सामना करना पड़ता है. यदि कोई पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है लेकिन उसके पति की सहमति नहीं लेता है तो उसे पांच साल की जेल होगी. लेकिन जब पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाता है तो उसे अपने पत्नी की सहमति की कोई जरुरत नहीं है.



    150 साल पुराना कानून
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान महिला और पुरुष को समान नजर से नहीं देखता और आपराधिक कानून पुरुष और महिलाओं के लिए बराबर है.

    पहले ड्राफ्ट में ऐसा नहीं था
    यह वास्तव में दिलचस्प है कि 'एडल्टरी' के अपराध को 1837 में थॉमस बाबिंगटन मैकॉले यानि लॉर्ड मैकॉले की अध्यक्षता में तैयार भारतीय दंड संहिता के पहले ड्राफ्ट में स्थान नहीं मिला था. हालांकि, कानून आयोग ने 1847 में दंड संहिता पर अपनी दूसरी रिपोर्ट में एक अलग विचार लिया और लिखा: "जबकि हम सोचते हैं कि व्यभिचार का अपराध संहिता से नहीं छोड़ा जाना चाहिए, हम विवाहित महिला के साथ व्यभिचार के लिए अपनी संज्ञान को सीमित कर देंगे, और इस बात पर विचार करते हुए कि इस देश में महिला की हालत, इसके प्रति सम्मान में, हम अकेले पुरुष अपराधी को दंड के लिए जिम्मेदार ठहराएंगे."

    हालांकि, कानून आयुक्तों द्वारा यह सिफारिश स्वीकार नहीं की गई थी, और 1860 में आई धारा 497 के रूप में आज जो हमारे सामने है, इसे लागू किया गया था.

    एक पीआईएल ने अदालत के समक्ष निम्नलिखित प्रश्न उठाए हैं:

    - क्या रिश्ते में मनुष्य अकेला महिला को रिझा सकता है?

    - क्या एक महिला व्यभिचार करने में असमर्थ है?

    - क्या पुरुष को ही जेल जाना होना अगर उसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं?

    - अगर पति अपनी पत्नी के साथ रिश्ते के लिए अपनी सहमति देता है तो क्या यह जायज़ हो जाएगा?

    - क्या पति की सहमति का कानून किसी महिला को एक वस्तु की तरह नहीं आंक रहा?

    सीआरपीसी की धारा 198(2)

    इस अपराध में सिर्फ पति ही शिकायत कर सकता है. पति की अनुपस्थिति में महिला की देखभाल करने वाला व्यक्ति कोर्ट की इजाजत से पति की ओर से शिकायत कर सकता है.

    किसने दी थी चुनौती

    थॉमस बाबिंगटन मैकॉले


    जोसेफ शाइनी की जनहित याचिका में आइपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198(2) को चुनौती दी. दलील थी कि आज औरतें पहले से मज़बूत हैं. औरत को किसी भी कार्रवाई से छूट दे देना समानता के अधिकार के खिलाफ है.

    याचिका के आधार  पर शीर्ष अदालत की कार्रवाई
    आपराधिक कानून लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता लेकिन यह धारा एक अपवाद है. इस पर विचार की ज़रूरत है. पति की मंजूरी से किसी और से संबंध बनाने पर इस धारा का लागू न होना दिखाता है कि औरत को एक संपत्ति की तरह लिया गया है.

    इससे पहले 1954, 2004 और 2008 में आए फैसलों में सुप्रीम कोर्ट आईपीसी की धारा 497 में बदलाव की मांग को ठुकरा चुका है. यह फैसले 3 और 4 जजों की बेंच के थे इसलिए नई याचिका को 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा गया है.

    सीजेआई मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र को कानूनी प्रावधान की वैधता पर एक नोटिस जारी किया.

    न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ समेत पीठ ने नोट किया कि धारा 497 महिलाओं को सभी स्थितियों में पीड़ित के रूप में ही देखती है और अपराध के लिए केवल पुरुष ही जिम्मेदार है.

    अदालत ने जोर दिया था कि जब समाज प्रगति करता है और लोगों पर नए अधिकार प्रदान किए जाते हैं, तो नए विचार भी बढ़ने चाहिए और इसलिए धारा 497 की समीक्षा अब की जानी चाहिए.

    केंद्र ने कहा था एक्स्ट्रा मैरिटल संबंधों को अपराध बनाए रखें वरना शादियों पर पड़ेगा असर
    इस मामले में केंद्र सरकार ने शपथपत्र दिया था कि IPC की धारा 497 और CPC की धारा 198(2) को खत्म करने का सीधा असर भारत की संस्कृति पर पड़ेगा जो कि शादी की संस्था और उसकी पवित्रता पर जोर देता है.

    पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने केंद्र सरकार को धारा 497 की वैधता के संबंध में नोटिस भेजते हुए कहा था कि यह कानून बेहद प्राचीन लगता है और यह महिला को पुरुष के समकक्ष नहीं मानता है. हालांकि केंद्र ने अपने शपथपत्र में कहा कि धारा 497 एक उचित प्रावधान है और इसका होना अनिवार्य है.

    केरल के रहने वाले जोसेफ शीने से सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल की थी कि कोर्ट को धारा 497 की वैधता पर फिर से विचार करना चाहिए क्योंकि यह लिंग के आधार पर भेदभाव करने वाला है.

    यह भी पढ़ें : अयोध्या विवादः 1885 में पहली बार कोर्ट पहुंचा था केस, पढ़ें पूरा घटनाक्रम

    Tags: Adultery Law, Marriage, Marriage Facts, Relationship

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