एक नदी की ‘मौत’ की तहकीकात : इस तरह से सीवर बनी यमुना

पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में काफी बदलाव आया है. दिल्ली की जनसंख्या काफी बढ़ी है. औद्योगिकीकरण ने नई तरह की समस्याएं पैदा कीं. नालों और नहरों को खत्म कर सड़कें बना दी गईं. दिल्ली में यमुना नदी के सीवर बनने की कहानी काफी लंबी है.

News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 4:06 PM IST
एक नदी की ‘मौत’ की तहकीकात : इस तरह से सीवर बनी यमुना
दिल्ली में यमुना की हालत
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Updated: July 29, 2019, 4:06 PM IST
अनिरुद्ध घोषाल, अंगना चक्रबर्ती, रौनक कुमार गुंजन

दिल्ली में यमुना नदी के सीवर वाला नाला बनने की कहानी कोई आज की नहीं है. दिल्ली ने पिछले कुछ वर्षों में जो हालात देखे हैं, जितनी जनसंख्या यहां बढ़ी है और जो कचरा पैदा किया है, उसने यमुना को नदी से नाले में तब्दील कर दिया है. यमुना की इस बेहद बुरी स्थिति को बारीकी से समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में आए बदलाव पर नजर डालनी होगी.

दिल्ली में अशोक रोड के पहले खिलौली बाग नहर हुआ करती थी. 2 मई 1912 को नई दिल्ली टाउन प्लानिंग कमिटी की बैठक में पानी और पानी की निकासी की समस्या को देखते हुए फैसला लिया गया कि नई राजधानी शाहजहानाबाद के दक्षिण-पश्चिम में बनाई जाए. ऐसा करने की वजह से न सिर्फ दिल्ली के इतिहास में बदलाव आया बल्कि इसके जलमार्ग (waterways) भी बदल गए. दिल्ली अब उस खतरनाक मुहाने पर खड़ी है, जहां उसके भविष्य में साफ पानी तक नसीब नहीं है.

कुछ ही वर्षों में या कहें कि पिछली चार पीढ़ियों के बाद दिल्ली की आबादी में 81 गुना की बढ़ोतरी हुई है. दिल्ली की जनसंख्या 2.3 लाख से बढ़कर 1.9 करोड़ हो गई है. भूजल स्तर 10 सेंटीमीटर सालाना की दर से नीचे जा रहा है. जलमार्गों और नहरों को बंद कर दिया गया, उस पर नई-नई रोड बना दी गईं. हालत ये है कि यमुना देश की सबसे प्रदूषित नदी हो चुकी है, जिसमें जीवन की संभावना नजर नहीं आती.

दिल्ली से क्यों रूठ गई यमुना
न्यूज18 की पिछली तहकीकात में हमने बताया था कि किस तरह प्लानिंग के तहत हुए विकास ने शहर के पारंपरिक जल निकासी के मार्गों को नाले में बदल दिया. इस बार हमने ज्यादा गहराई से पड़ताल के लिए विशेषज्ञों, अधिकारियों और इतिहासकारों से बात की. दिल्ली के ऐतिहासिक दस्तावेज, उसके मैप और सर्वे से मिलान करके कुछ सवालों के जवाब जानने की कोशिश की. सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि वो क्या है जिसने राजधानी को पानी का दुश्मन बना दिया?

अशोक रोड की जगह पर कभी खिलौली बाग नहर हुआ करता था. 1807 के एक हाथ से बनाए मैप में ये दिखाई पड़ता है. इसे 1989 में सर्वे ऑफ इंडिया ने खोज निकाला था. 2004 में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के लिए लिखे एक लेख में डैनी चेरियन ने सुझाव दिया कि इन संचालन मार्गों की दोबारा व्याख्या की जरूरत है.
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दिल्ली में नहर-नालों को दिखाता पुराना मैप


पुराने मैप से ऐसे कई जल निकासी वाले नालों का पता चलता है, जो अब गायब हो चुके हैं और वहां पर रोड बनी हैं. कर्जन रोड (कस्तूरबा गांधी मार्ग) के नीचे कभी निजामुद्दीन नाला बहा करता था. वहीं क्वीन विक्टोरिया रोड (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद रोड) के नीचे तालकटोरा नाला था. एक पतली धारा रकाबगंज और रायसीनी गांव के नीचे बहती थी, जो निजामुद्दीन नाले में मिलती थी. इन सबका अस्तित्व खत्म हो चुका है.
क्लाइव ड्यूपलेक्स और किंग एडवर्ड रोड (मौलाना आजाद रोड) कुशक नाले के ऊपर बना है. जो साइट के दक्षिणी किनारे को परिभाषित करता है.

टाउन प्लानिंग कमेटी की पहली रिपोर्ट से बहुत कुछ पता चलता है
इतिहासकार और INTACH की कन्वीनर स्वप्ना लिड्डले सुझाव देती हैं कि नालों के चैनल्स से जो जल निकासी का मार्ग बनता था वो बहुत ज्यादा मजबूत नहीं था. हालांकि ये हकीकत है कि नई दिल्ली के निर्माण ने ऐसे कई जल निकासी के मार्गों और नालों को बंद कर दिया.

1807 के मैप और दूसरे कई मैप को बारीकी से देखने पर पता चलता है कि रिज से निकलने वाली धाराएं शहर को आड़े-तिरछे पार करते हुए यमुना में मिलती थीं. आज के वक्त में सिर्फ दो बड़े नाले- चिराग नाला और बारापूला नाला रह गए हैं.

नालों के गायब होने के बारे में नई दिल्ली टाउन प्लानिंग कमेटी की पहली रिपोर्ट से बहुत कुछ पता चलता है. इस रिपोर्ट में कहा गया कि सड़कों के किनारे बेतरतीब और खराब हालत में बहने वाले नालों की वजह से सड़कें खराब दिखती थीं. इसमें सलाह दी गई थी कि नई राजधानी में इन सभी खुले और गहरे नालों से बचना चाहिए.

1950 के बाद बदले दिल्ली के हालात
आर्किटेक्ट स्वाति जानू और सागारिका सूरी ने अपने निबंध द रिवर एंड द सिटी में लिखा है कि अंग्रेजों के काल में भी जमीन के अंदर ही नालों का जाल बिछाया गया था. सीवेज का ये नेटवर्क आखिर में जाकर यमुना से मिलता था. उसी वक्त से यमुना नाले में तब्दील होनी शुरू हो गई थी. बाद में इसके हालात और खराब हुए.

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यमुना नदी में तैरता कचरा


दिल्ली जलबोर्ड के एक अधिकारी दिल्ली के बर्बाद ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर के बारे में बताते हुए कहते हैं कि अगर आप पिछली सदी से पहले जाएं तो नदियां, नहर और नाले मिलकर एक यूनिट का काम करते थे. ये सब मिलकर जिंदगी को बचाए हुए थे.

1950 के बाद जब आजादी का खुमार उतर गया तो हालात खराब होने लगे. बंटवारे के बाद दिल्ली की कुल आबादी (9 लाख) में से एक तिहाई (3 लाख 29 हजार) आबादी पाकिस्तान चली गई. बाकी बचे 4 लाख 95 हजार लोग पश्चिमी पंजाब, सिंध और नॉर्थवेस्ट फ्रंटियर की ओर चले गए. दिल्ली का बेतरतीब विकास होने लगा. 1952 में स्पेशल डेवलपमेंट अथॉरिटी बनी जिसे दिल्ली का मास्टर प्लान बनाने के जिम्मेदारी मिली.

दिल्ली आज जिस संकट का सामना कर रही है, वो ग्रेटर दिल्ली के निर्माण में बार-बार चेतावनी के बावजूद अनदेखी किए जाने का नतीजा है. देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री अमृता कौर ने चेतावनी दी थी कि दिल्ली के बेतरतीब विकास की वजह से पानी और सीवेज की समस्या पैदा होगी.

जनसंख्या के दबाव ने बिगाड़े दिल्ली के हालात
दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या के लिए पानी और ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त रखना कभी आसान नहीं रहा. ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर तेजी से लोग भागे. 1941 से 1951 के बीच दिल्ली की जनसंख्या 45 गुना बढ़ी. आबादी 9.1 लाख से बढ़कर 17.4 लाख हो गई. जमीन उतने ही रही. जनसंख्या के दबाव ने नहरों, नालों और तालाबों को खत्म कर दिया.

दिल्ली का पहला मास्टर प्लान 1962 में बना. इसने एक नई समस्या को जन्म दिया. दिल्ली के नालों के किनारे नए उद्योग लगने लगे. 1600 एकड़ के इलाके में बने इन उद्योगों ने नई परेशानी खड़ी करनी शुरू की. ये इलाके ओखला और शाहदरा के रहे. नालों में इन उद्योगों का कचरा डाले जाने लगा. पिछले हफ्ते एनजीटी की बनाई यमुना पॉल्यूशन मॉनिटरिंग कमेटी ने ऐसी 116 जगहों की पहचान की. राजधानी के 22 मुख्य नालों में उद्योगों का कचरा बह रहा है. इसमें कंस्ट्रक्शन के वेस्ट मैटेरियल डाले जा रहे हैं.

1975 में इमरजेंसी के दौरान एक नई तरह की चुनौती पेश आई. करीब 7 लाख की आबादी गोकुलपुरी, खिचड़ीपुर, कल्याणपुरी, सुल्तानपुरी और त्रिलोकपुरी जैसे 5 नए ठिकानों से बेदखल हो गई. रेवेन्यू रिकॉर्ड और 1981 के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के एक पेपर के मुताबिक पहले ये इलाके हरे-भरे थे. बाद में ट्रांस यमुना बेसिन के ये इलाके घनी आबादी वाले बन गए. यहां अभी भी सीवर लाइन नहीं है और सभी कचरा नदी में गिरता है.

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दिल्ली के विकास ने नए तरह की चुनौतियां पेश की


एशियाड गेम्स ने बदल दी दिल्ली की सूरत
रेवेन्यू रिकॉर्ड के मुताबिक एशियाड गेम्स के दौरान शहरीकरण बढ़ा. नए-नए होटल, रोड और फ्लाई ओवर बनने की वजह से नहर नाले खत्म होते चले गए. सीजीओ कॉम्पलैक्स बारापुला नाले पर बना है. रोहिणी नांगलोई नाले के किनारे बसा और द्वारिका नजफगढ़ नाले के ऊपर. दिल्ली में कंस्ट्रक्शन के लिए बाहर से आए मजदूर यहीं बस गए. इसकी वजह से संजय अमर कॉलोनी, मंगोलपुरी, जहांगीरपुरी जैसे कई अवैध कॉलोनियां बन गई.

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल सितंबर में जल मंत्रालय को अपने अधीन कर लिया. उनके एक कैबिनेट मंत्री कहते हैं कि इसी से पता चलता है कि दिल्ली सरकार पानी की समस्या को लेकर कितनी गंभीर है.

सभी सरकारों की तरह दिल्ली सरकार ने भी रिवरफ्रंट पर काम करना शुरू किया है. बाकियों से बड़ा अंतर ये है कि यहां ग्राउंड वाटर रिचार्ज पर जोर दिया जा रहा है. इसके लिए वेट लैंड और तालाब खुदवाए जा रहे हैं. दिल्ली सरकार खत्म हो चुकी झीलों और तालाबों की फिर से खुदाई करवा रही है. सवाल यह है कि हालात कितने बदले हैं और क्या ये पर्याप्त है.

दिल्ली के जल मंत्रालय के एक अधिकारी कहते हैं कि आप नजफगढ़ झील और नाले को देखिए. ये प्रदूषित है. लेकिन यहां से स्थिति के सुधरने की संभावना जगी है. हमें अपनी गलतियों से सीखना होगा.

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First published: July 29, 2019, 3:34 PM IST
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