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जानिए, कैसे एक जानलेवा बीमारी ने अमेरिका को बना दिया सुपर पावर

जानिए, कैसे एक जानलेवा बीमारी ने अमेरिका को बना दिया सुपर पावर

येलो फीवर ने अमेरिका को उस मुकाम तक पहुंचने में मदद की, जहां वो आज है

येलो फीवर ने अमेरिका को उस मुकाम तक पहुंचने में मदद की, जहां वो आज है

हैती में येलो फीवर (yellow fever in Haiti) की वजह से 80 प्रतिशत से ज्यादा फ्रांसीसी सैनिक मारे गए. आखिरकार बची-खुची सेना को जान बचाकर भागना पड़ा. यहीं से सारा गणित बदलने लगा जो रुका अमेरिका के महाशक्ति बनने पर.

    कोरोना वायरस (coronavirus) की वजह से दुनिया में उथल-पुथल मची हुई है. माना जा रहा है कि महामारी के बाद (post-coronavirus) दुनिया के हालात बदल चुके होंगे. खासकर महाशक्तियों का क्रम ऊपर-नीचे हो सकता है. यानी जो देश फिलहाल सुपर पावर्स की गिनती में हैं, वे आगे चलकर नीचे हो सकते हैं और दूसरे देश उनकी जगह ले सकते हैं. फिलहाल अमेरिका सबसे ताकतवर मुल्क माना जाता है. वैसे ये देश भी एक बीमारी की वजह से दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बन सका. येलो फीवर ने अमेरिका को उस मुकाम तक पहुंचने में मदद की, जहां वो आज है. जानिए, कैसे.

    कहानी साल 1801 से शुरू होती है. तब फ्रांस के सैन्य जनरल नेपोलियन बोनापार्ट ने कैरिबयाई देश हैती में कब्जे के लिए फ्रांस की विशाल सेना भेजी. लेकिन येलो फीवर की वजह से 80 प्रतिशत से ज्यादा सैनिक मारे गए. इनमें सेनापति भी शामिल था. आखिरकार बची-खुची फ्रेंच सेना को जान बचाकर भागना पड़ा. इससे नेपोलियन की हैती पर कब्जे की योजना खत्म हो गई. अब सवाल आता है कि नेपोलियन के फ्रांस से एक कैरेबियाई देश पर कब्जे में क्योंकर दिलचस्पी थी? और इससे अमेरिका को क्या फायदा हुआ?

    नेपोलियन बोनापार्ट ने कैरिबयाई देश हैती में कब्जे के लिए फ्रांस की विशाल सेना भेजी


    इसके पीछे काफी बड़ा गणित काम करता था. इसके मूल में थे अश्वेत नस्ल के गुलाम जो लगभग मुफ्त में बहुत से काम करते और पैसे बनाने में श्वेत और अमीर लोगों की मदद करते थे. असल में फ्रांस ने प्राचीन कैरेबियाई शहर सेंटो डॉमिंग्वे पर कब्जा कर लिया. यहां पर भरपूर कॉफी और चीनी पैदा होती, जिसे यूरोप के दूसरे देशों में बेचकर फ्रांस मुनाफा कमाता था. इस दौरान सारे काम गुलाम करते थे. हालांकि बहुत ज्यादा काम और भरपूर पोषण और आराम न मिलने के कारण गुलामों की मौत होने नतीजा ये हुआ कि हैती में लगभग आधे गुलाम पहले ही साल में नहीं रहे.

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    अब काम कराने के लिए गुलामों की तो जरूरत थी ही. इसलिए यूरोप के दूसरे देशों से फ्रांस में गुलाम खरीदकर लाए जाने लगे. अमानवीय हालातों में काम कराए जाने के कारण भड़के गुलामों में धीरे-धीरे गुस्सा भरने लगा और साल 1791 में उन्होंने बगावत कर दी. अगले चार ही सालों में फ्रांस ने कैरेबियाई क्षेत्रों से गुलामी खत्म कर दी. हालांकि अंदर ही अंदर फ्रांस के रईसों में इस बात को लेकर नाखुशी थी.

    यही वजह है कि साल 1801 में नेपोलियन ने सेंट डॉमिंग्वे में विशाल सेना भेजी. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक ये सेना फ्रांस की सबसे बड़ी सेना थी, जिसमें 60 से 85 हजार तक सैनिक थे. नेपोलियन की योजना थी कि वापस सेंट डॉमिंग्वे पर कब्जा हो जाए और काम शुरू हो सके. इसके लिए अश्वेत नेता टॉस्सैंट को खुफिया तरीके से हिरासत में लेकर हैती से दूर भेजने की भी योजना थी.

    अमानवीय हालातों में काम कराए जाने के कारण भड़के गुलामों में धीरे-धीरे गुस्सा भरने लगा


    सैनिक सेंट डॉमिंग्वे पहुंचे. योजना के मुताबिक सब कुछ चलता दिखा और अश्वेत नेता को चुपके से फ्रांस भेज दिया गया. वहीं पर हिरासत में ही नेता की मौत हो गई. लेकिन मौत के दौरान वो काफी निश्चिंत था. ऐसा लगता था कि कहीं कुछ तो गड़बड़ी है, जिसका अंदाजा उस वक्त तक नेपोलियन या फ्रेंच सेना को नहीं. ये गड़बड़ी बाद में समझ आ सकी लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

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    अश्वेत नेता को पता था कि उसके इलाके में बारिश के दौरान हर साल की तरह येलो फीवर का कहर बरपने वाला है और उसमें फ्रेंच सेना खत्म हो जाएगी. बारिश आते ही ऐसा ही हुआ. सैनिक बड़ी संख्या में मच्छरों के काटने और येलो फीवर से मरने लगे. खुद सेना प्रमुख चार्ल्स लेक्लेर्क इसका शिकार हुए और वहीं खत्म हो गए. सैनिक मरते गए और आखिरकार नेपोलियन को बचे-खुचे सैनिकों को लौटाना पड़ा. तब 80 प्रतिशत से ज्यादा सैनिक खत्म हो चुके थे. जो फ्रांसीसी सेना बड़े-बड़ों के आगे नहीं हारती थी, वो एक बीमारी से हार गई.

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    फ्रांस के निराश लौटने के बाद कई दूसरे देश भी सेंट डॉमिंग्वे में दिलचस्पी लेने लगे. तब कई उलटफेर हुए. स्पेन ने अपनी औपनिवेशिक जगह लुइसियाना को फ्रांस को दे दिया. इससे अमेरिका के कई हिस्से कुछ वक्त के लिए फ्रांस की कॉलोनी बन गए थे. तब अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जैफरसन ने नेपोलियन से वापस न्यू ओरेलेंस खरीदने की बात का प्रस्ताव रखा. नेपोलियन ने ये प्रस्ताव तो माना ही, साथ ही कहा कि अमेरिका चाहे तो पूरी लुइसियाना कॉलोनी ही ले सकता है. इसके पीछे नेपोलियन की उदारता नहीं, बल्कि आर्थिक समस्या थी. असल में फ्रांस के लिए इतनी दूर-दूर तक फैली जगहों को कंट्रोल करना काफी मुश्किल और खर्चीला हो चुका था. ऐसे में नेपोलियन ने तय किया कि दूर की जगहों को बेचकर पास ही पास अभियान चलाए जाएं.

    अमेरिकी राजनेता थॉमस जैफरसन ने नेपोलियन से वापस न्यू ओरेलेंस खरीदने की बात का प्रस्ताव रखा


    इस तरह से साल 1803 में अमेरिका और फ्रांस के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ. इसके तहत अमेरिका ने फ्रांस को केवल 15 मिलियन डॉलर देकर अपनी सारी जगहें वापस पा लीं. बाद में अमेरिका अपनी सीमाओं में बढ़ोत्तरी ही करता गया. टैक्सास और कैलीफोर्निया भी उसके हिस्से आ गए. प्रशांत और अटलांटिक महासागरों से घिरा होने के कारण अमेरिका काफी रिमोट भी रहा. ऐसे में उस दौरान होने वाले कई आक्रमणों से वो बचा रहा और लगातार आर्थिक उन्नति में लगा रहा. आज भी येलो फीवर जैसी खतरनाक बीमारी को को अमेरिका की उन्नति में मददगार की तरह देखा जाता है.

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    अब लगे हाथों ये भी जान लें कि येलो फीवर होता क्या है. एक खास प्रजाति से मच्छर ईडीस ईजिप्टिआई (स्टीगोमिया फेसियाटा) से येलो फीवर यानी पित्त ज्वर होता है. ये वायरल बीमारी है, जिसमें शरीर के लगभग सारे अंग प्रभावित होते हैं. बुखार, तेज सिरदर्द, आंतरिक रक्तस्त्राव इसके लक्षण हैं. ये बीमारी इतनी घातक है कि इससे संक्रमित 50 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है. हालांकि इसका टीका भी है, जो बीमारी से बचा सकता है. यह दक्षिण अमरीका, पश्चिम भारत के टापू, पश्चिम अफ्रीका आदि देशों में ज्यादा फैलता है इसलिए ऐसी जगहों की यात्रा से पहले टीका लगवाना जरूरी होता है.

    Tags: America, France, France India, Slave

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