गुजरात दंगा: जाकिया जाफरी जो प्रधानमंत्री को मिली क्लीन चिट को चुनौती दे रही हैं

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Updated: December 3, 2018, 9:26 AM IST
गुजरात दंगा: जाकिया जाफरी जो प्रधानमंत्री को मिली क्लीन चिट को चुनौती दे रही हैं
जाकिया जाफरी: सभी तस्वीरें- फर्स्टपोस्ट

जाकिया ने 2006 में इंसाफ की लड़ाई शुरू की थी. आज उनकी उम्र 80 बरस से ज्यादा है.

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सालभर पहले अक्टूबर 2017 में गुजरात हाईकोर्ट ने गोधरा मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी. हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती दी जाकिया जाफरी ने. वही जाकिया जाफरी, जिनके पति 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में उग्र भीड़ के हमले में मारे गए थे. जाकिया के संघर्ष की कहानी सालों पुरानी है. इसकी शुरुआत होती है गोधरा में 27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के S-6 कोच के जलाए जाने से. भीड़ की आगजनी से कोच में मौजूद 59 कारसेवकों की मौत हो गई. ट्रेन के उस कोच की आग ने पूरे गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया. इसी आग ने बहुतों के साथ जाकिया के पति एहसान जाफरी को भी अपनी चपेट में ले लिया. तब से ही जाकिया इंसाफ की लड़ाई लड़ रही हैं. उन्होंने 2006 में इंसाफ के लिए लड़ाई शुरू की थी. आज उनकी उम्र 80 बरस से भी ज्यादा है.

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जाकिया कांग्रेसी नेता और पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी हैं. एहसान जाफरी उन 69 लोगों में से थे, जिन्हें गोधरा कांड की प्रतिक्रिया के तौर पर गुलबर्ग सोसाइटी में दंगाइयों ने मार दिया. उत्तरी अहमदाबाद की इस पॉश सोसाइटी पर हुए हमले में जाकिया बच गईं. हत्याकांड इतना भयावह था कि इसे गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार के तौर पर जाना जाता है. उस हादसे का खौफ इतना ज्यादा है कि आज तक यहां पर कोई बसाहट नहीं हो सकी.



क्या है गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार
28 फरवरी को हजारों लोग गुलबर्ग सोसाइटी के बाहर जमा हो गए. एक के बाद एक घरों को आग लगाई जाने लगी. बहुत से लोग सुरक्षा के लिए जाफरी के बंगले पर पहुंचे लेकिन वो भी सुरक्षित नहीं रहा. अंदर घुसकर लोगों को मारा गया, जलाया गया, इसी में एहसान जाफरी भी एक थे. वहीं जाकिया पहले माले पर एक कमरे में छिपी रहीं. 14 सालों बाद 2016 में ट्रायल कोर्ट ने मामले पर फैसला देते हुए उस दिन को गुजरात के इतिहास का सबसे काला दिन करार दिया, साथ ही 24 लोगों को सजा भी दी. इसी फैसले के दौरान कोर्ट ने माना कि एहसान जाफरी के बंगले से हुई गोलीबारी ने लोगों को उकसाया.
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पति को दंगे में खोने के दर्द से बाहर आई जाकिया ने दोषियों को सामने लाने की ठानी. साल 2006 में उन्होंने याचिका दायर की, जिसमें 2002 दंगों और गुलबर्ग हत्याकांड के लिए राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी 62 लोगों के साथ जिम्मेदार ठहराया. जाकिया के अनुसार दंगे भड़कने के बावजूद पुलिस घंटों निष्क्रय रही. कर्फ्यू के आदेश देर से दिए गए. घर के घर जलकर खाक होने लगे लेकिन सेना की तैनाती तब तक नहीं हो सकी. याचिका के अनुसार यहां तक कि वायरलेस संदेशों से संबंधित रिकॉर्ड्स से भी छेड़खानी हुई.

जाकिया ने बताया कि मौत से पहले के कुछ घंटों तक एहसान जाफरी लगातार मदद मांगते रहे थे. यहां तक कि उन्होंने मोदी से भी मदद मांगी थी. जाकिया ने मोदी समेत कई नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाए जाने की मांग की. पहले तो पुलिस ने इस बारे में कोई शिकायत दर्ज नहीं की. बाद में कोर्ट के दखल पर संज्ञान लिया गया. कोर्ट के आदेश पर विशेष जांच टीम ने पूछताछ शुरू की. साल 2010 में मोदी से लगभग 10 घंटे तक पूछताछ चली.

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एसआईटी ने 2012 में हाईकोर्ट को क्लोजर रिपोर्ट सौंप दी. इसी आधार पर गुजरात हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ 63 अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को क्लीन चिट दे दी. इसमें कहा गया कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिल सका है और याचिका पर आगे सुनवाई नहीं हो सकेगी. हाईकोर्ट के इस फैसले को जाकिया ने चुनौती दी, जिसपर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.



जाकिया के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ भी उप-याचिकाकर्ता हैं. हालांकि दशकभर से ज्यादा खिंचे आ रहे मामले की राह आसान नहीं लगती. जज एएम खानविलकर और दीपक गुप्ता की बेंच पहले 19 नवंबर को याचिका पर गौर करने वाली थी लेकिन फिर तारीख आगे बढ़ गई, ये कहते हुए कि 'इस याचिका की सुनवाई में थोड़ा वक्त लगेगा'. इसके बाद 26 नवंबर की तारीख मिली लेकिन उसे भी आगे बढ़ाते हुए 3 दिसंबर यानी आज की तारीख मिली. सप्ताह की शुरुआत उस याचिका की सुनवाई के साथ हो रही है जिसमें याचिकाकर्ता एक 80 बरस की महिला है. जो जांच कमेटी के उस फैसले को ठुकराती है, जिसके अनुसार लगभग दंगों में 12 सौ लोगों की मौत किसी आपराधिक साजिश का हिस्सा नहीं.

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First published: December 3, 2018, 8:37 AM IST
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