वो इस्लामिक धर्मप्रचारक जिनका कॉपी कैट है जाकिर नाइक, एक-एक शब्द जैसे चोरी के हों

वो इस्लामिक धर्मप्रचारक जिनका कॉपी कैट है जाकिर नाइक, एक-एक शब्द जैसे चोरी के हों
जाकिर नाइक भाषण देने के दौरान पूरी तरह अहमद दीदात को कॉपी करता है.

जाकिर नाइक (Zakir Naik) ने कई मौकों पर स्वीकार किया है कि वो अहमद दीदात (Ahmed Deedat) से प्रभावित है. अहमद के साथ उसकी मुलाकात 1987 में हुई थी. इसके बाद ही जाकिर नाइक ने धर्मप्रचार को गंभीरता से लेना शुरू किया. उसने अहमद दीदात की हर स्टाइल को कॉपी किया. भाषण देने से लेकर हाथ उठाने और बात करने के तरीकों तक.

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जाकिर नाइक का नाम भारत में साल 2000 के बाद धीरे-धीरे सुर्खियों में आना शुरू हुआ था. 2010 आते-आते वो भारत में इस्लामिक धर्मप्रचार का जाना-माना नाम बन चुका था. खुद को कंपैरिटिव रिलिजीन का स्कॉलर बताने वाला जाकिर नाइक धाराप्रवाह अंग्रेजी, उर्दू मिश्रित हिंदी और अरबी बोलता था. इस्लामिक धर्मप्रचार को लेकर वो मंच पर दूसरे धर्मगुरुओं के साथ बहसें आयोजित करता था. आर्ट ऑफ लीविंग गुरु श्रीश्री रविशंकर के साथ जाकिर नाइक की बहस की चर्चा तो पूरे देश में हुई थी. लेकिन जाकिर का ये सारा धारा प्रवाह ज्ञान धरा रह जाता है जब आप यूट्यूब पर सिर्फ दो शब्द टाइप करते हैं-Ahmed Deedat.

आप जैसे ही यूट्यूब पर अहमद दीदात टाइप करेंगे तो आपको तकरीबन जाकिर नाइक जैसे ही बोलने वाले व्यक्ति के वीडियो खुल कर सामने आएंगे. आपको जानकर हैरानी होगी कि ये आदमी तो बिल्कुल जाकिर जैसा बोलता है. लेकिन सच्चाई ये है कि खुद जाकिर नाइक ही अहमद दीदात का कॉपीकैट है. बिल्कुल उन्हीं की स्टाइल में अंग्रेजी बोलना, बात-बात पर अरबी रिफरेंस देना. आप हैरान रह जाएंगे कि कोई किसी को किस हद तक कॉपी कर सकता है. दरअसल जाकिर नाइक कॉपी करने के मामले में कई मिमिक्री आर्टिस्ट को भी फेल करता है. आप यहां क्लिक कर अहमद दीदात के वीडियो देख सकते हैं. आइए जानते हैं कि अहमद दीदात कौन हैं जिन्हें जाकिर नाइक कॉपी करता है. अहमद दीदात की जिंदगी के भी कई स्याह पहलू हैं जिनमें सबसे प्रमुख है ओसामा बिन लादेन के परिवार से ताल्लुक.

गुजरात में हुआ था जन्म
शेख अहमद दीदात का जन्म गुजरात के सूरत शहर में 1 जुलाई 1918 को हुआ था. उनके जन्म के कुछ ही समय बाद उनके पिता दक्षिण अफ्रीका चले गए थे. बाद में 9 साल की उम्र में अहमद दीदात भी पिता के साथ दक्षिण अफ्रीका चले गए. इसके बाद अहमद की जिंदगी दक्षिण अफ्रीका में ही बीती. दुनियाभर में उन्हें दक्षिण अफ्रीकी नागरिक के तौर पर ही पहचाना जाता है.



तस्वीर यूट्यूब से साभार




दक्षिण अफ्रीका में अहमद की पढ़ाई की शुरुआत हुई. वो पढ़ने में काफी तेज थे और भाषाई बैरियर तोड़ने के लिए अंग्रेजी की अच्छी शिक्षा हासिल की. लेकिन अहमद सिर्फ क्लास 6 तक ही पढ़ाई कर पाए थे कि पारिवारिक दबाव की वजह से नौकरी की शुरुआत करनी पड़ी. तब उनकी उम्र महज 16 साल थी. उन्होंने एक फर्नीचर सैल्समैन के रूप में काम की शुरुआत की. तकरीबन दो साल बाद यानी 1936 में जब काम के सिलसिले में उनकी मुलाकात ईसाई मिशनरियों से हुई तो मुस्लिम धर्म के लोगों को कन्वर्ट करने के क्रम में कुछ बातें मिशनरियों ने इस्लाम के खिलाफ भी कहीं. मिशनरियों का तर्क था कि इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए मुहम्मद साहब ने तलवार का सहारा लिया. इस तरह की बहसों का अहमद पर प्रभाव हुआ और उन्होंने धार्मिक किताबों में ज्यादा इंटरेस्ट लेना शुरू किया.

कहा जाता है कि अमहद की जिंदगी पर सबसे ज्यादा असर इज़हार-उल-हक नाम की एक धार्मिक किताब हुआ और इसी के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी इस्लाम धर्म के प्रचार में गुजारने की सोच ली. इसके बाद अहमद ने इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखने वाली किताबों और इस्लाम के अलावा बाइबिल को भी पढ़ना शुरू किया. उन्होंने धर्म पर गहन अध्ययन और ईसाई मिशनरियों के साथ बहसों की शुरुआत की. अब वो ईसाई मिशनरियों के उन सवालों का जवाब आसानी से दे देते जिनका जवाब पहले नहीं दे पाते थे.

इसी दौरान अहमद की मुलाकात ईसाई से मुस्लिम बने मिस्टर फेयरफैक्स से हुई. अहमद ने मिस्टर फेयरफैक्स से धर्म के बारे में पढ़ना शुरू किया. अहमद के भीतर पैदा हुए इंटरेस्ट को देखकर फेयरफैक्स ने उन्हें बाइबिल के बारे में भी शिक्षा दी. इसके बाद जिस जगह फेयरफैक्स इस्लाम धर्म की शिक्षा देते थे वहीं पर अहमद ने भी पढ़ाना शुरू किया. ये दिलचस्प है कि अहमद ने कभी इस्लामिक धर्मग्रंथों की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली थी.

1940 के दशक में अहमद दीदात ने धर्मप्रचार की शुरुआत की. कहते हैं कि 1942 में पहली बार डरबन के एक सिनेमा हॉल में उन्होंने 15 लोगों के सामने लेक्चर किया था. डरबन की जुमा मस्जिद को अहमद ने धर्मप्रचार का केंद्र बनाना शुरू किया. ये मस्जिद एक ऐसी जगह पर है जहां पर दुनियाभर के सैलानी आते थे. इन सैलानियों से अहमद बातचीत करते थे, धार्मिक पैंफलेट्स भी सैलानियों को बातचीत के दौरान दिए जाते थे. तकरीबन 1949 तक अमहद दीदात ने यहां काम किया और फिर 1949 में वो अपने परिवार सहित पाकिस्तान चले गए. कराची में तीन साल तक रहने के बाद एक बार फिर अहमद वापस अफ्रीका लौटे और अपने दो दोस्तों गुलाम हुसैन वांकेर और ताहिर रसूल के साथ मिलकर Islamic Propagation Centre International (IPCI) संस्था खोली जो धर्मप्रचार के लिए काम करने वाली थी. अलगे तीन दशक अपने दोस्तों के साथ अमहद ने धर्मप्रचार का ही काम किया.

ओसामा बिन लादेन को 2 मई 2011 में एबटाबाद में मार गिराया गया था.(फाइल फोटो)
अहमद दीदात के ओसामा बिन लादेन के साथ भी नजदीकी ताल्लुकात थे.


1986 में अहमद दीदात को सऊदी अरब का किंग फैसल पुरस्कार दिया गया. ये उनके धर्मप्रचार के लिए किए गए कामों के लिए दिया गया था. सऊदी अरब से पहचान मिलने के बाद अहमद इस्लामिक वर्ल्ड में मशहूर हो गए. इसके बाद एक के बाद एक देशों में जाकर उन्होंने धर्मप्रचार किया. इसी सिलसिले में वो एक बार पाकिस्तानी सैन्य तानाशाह जियाउल हक से मिले थे. 1996 में अहमद को स्ट्रोक आया जिसके बाद उनके शरीर का तकरीबन आधा हिस्सा पैरालाइज हो गया. वो अगले नौ सालों तक जीवित रहे लेकिन खाने-पीना तक मुश्किल था. कहा जाता है कि उनका आखिरी समय बेहद बुरा गुजरा. हालांकि उनके पास सारी सुविधाएं मौजूद थी. बीमार पड़ने के बाद वो अफ्रीका से रियाध आ गए थे और यही पर किंग फैसल स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल में उनका इलाज हुआ था. अहमद की मौत 8 अगस्त 2005 को हुई थी.

जुडे़ रहे कई विवाद
जाकिर नाइक की तरह अहमद दीदात की जिंदगी विवादों से घिरी रही. अफ्रीका में इस्लाम धर्म के प्रचार के क्रम में वो अन्य धर्मों की काफी आलोचना करते थे. इसका सबसे पहले विरोध दक्षिण अफ्रीका के पढ़े-लिखे मुस्लिम समुदाय ने ही करना शुरू किया था. मुस्लिम डाइजेस्ट नाम की एक मैगजीन में अहमद दीदात की खूब खिंचाई की गई थी. बाद में जब अहमद नहीं माने तो अन्य धर्म के लोगों की तरफ से भी उनकी तीखी आलोचना हुई थी. शुरुआत में अन्य धर्मों के लोग उनकी बेहतरीन भाषण क्षमता की वजह से ध्यान नहीं देते लेकिन बाद में तीखा विरोध किया गया.

अहमद दीदात इस्लामिक राष्ट्र के भी समर्थक थे. एक बार एक पाकिस्तानी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने इस्लामिक राष्ट्र की वकालत की थी. इतना ही नहीं जब सलमान रुश्दी ने सैटेनिक वर्सेज किताब लिखी तो ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामनेई द्वारा मौत का फतवा सुनाने पर अहमद दीदात ने समर्थन किया था. उन्होने कहा था कि सलमान रश्दी को माफ नहीं किया जाना चाहिए.

अहमद दीदात के आतंकी ओसामा बिन लादेन के साथ भी करीबी संबंध थे. अमहद के धार्मिक फाउंडेशन को सबसे ज्यादा मदद लादेन परिवार से मिला करती थी. कहा जाता है कि लादेन परिवार के पैसों पर ही दीदात ने धर्मप्रचार का अपना पूरा नेटवर्क खड़ा किया था.



दीदात का कॉपीकैट जाकिर नाइक
जाकिर नाइक ने कई मौकों पर स्वीकार किया है कि वो अहमद दीदात से प्रभावित है. अहमद के साथ उसकी मुलाकात 1987 में हुई थी. इसके बाद ही जाकिर नाइक ने धर्मप्रचार को गंभीरता से लेना शुरू किया. उसने अहमद दीदात की हर स्टाइल को कॉपी किया. भाषण देने से लेकर हाथ उठाने और बात करने के तरीकों तक. यही वजह है कि जाकिर नाइक कई ऐसे मुद्दों पर हार्डलाइनर राय रखता है जैसी कि अहमद दीदात रखते थे.

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