क्या है जीका वायरस, जिसके कई केस मिलने के बाद केरल में हुआ अलर्ट

जीका वायरस (Zika virus) के मामलों का केरल में पाया जाना सावधान होने के संकेत देता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

Zika virus in kerala: संक्रमण के केरल में मामले पाए गए है लेकिन इसके बारे में जानकारी रख कर पर्याप्त सावधानी (Precautions) से इससे बचा जा सकता है.

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    हाल ही में देश के दक्षिणी राज्य केरल में जीका वायरस संक्रमण (Zika Virus in Kerala) के मामले सामने आए हैं. इस खबर के बाद सरकार चौकन्ना हो गई है. लेकिन साथ लोगों में भी एक तरह का आशंका  देखी जा रही है. जीका वायरस कुछ साल पहले अफ्रीका में फैला था. इसका लाइलाज होने और इसका टीका अभी तक विकसित नहीं हो पाया लेकिन यह कोविड-19 की तरह जानलेवा भी नहीं है. फिर भी पहले  से ही कोविड-19 महामारी से जूझ रहे देश में इसको लेकर चिंचित होना स्वाभाविक है. लेकिन यह जानना बहुत जरूरी है कि यह संक्रमण कितना खतरनाक है, यह कैसे फैलता है और इसके बचाव के लिए कौन से जरूरी कदम उठाने चाहिए.

    क्या होता है ये जीका वायरस संक्रमण
    जीका वायरस के संक्रमण का असर डेंगू के बुखार, पीला ज्वर, वेस्ट नाइल वायरस के बुखार की तरह ही होता है. यह संक्रमण एईडीज इजिप्टाय (Aedes aegypti) मच्छर के काटने से होता है. इसती प्रजाति से डेंगू का वायरस भी फैलता है. यह सक्रमण प्रमुख रूप इस मच्छर के काटने से ही फैलता है, लेकिन यह गर्भवती मां से बच्चे में भी आ सकता है. वैसे तो यह संक्रमण किसी को भी को हो सकता है, लेकिन इसका जोखिम सबसे ज्यादा गर्भवती महिलाओं को होता है. इसके अलावा असुरक्षित यौन संबंधों से भी यह संक्रमण फैल सकता है.

    क्या होते हैं इसके लक्षण
    संक्रमण होने पर जीका वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून में अमूमन एक सप्ताह तक रहता है. इस संक्रमण के लक्षण में आमतौर पर हलके ही होते हैं. इसमें बुखार, बदन पर दाने, जोड़ों में दर्द जैसे ही लक्षण देखे जाते हैं, लेकिन अधिकांश लोगों में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. सामान्यतया 5 में से एक ही संक्रमित में इसके लक्षण दिखाई देते हैं. अहम बात यह है कि इस बीमारी से किसी को मरते नहीं देखा गया है.

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    जीका संक्रमण संक्रमण एईडीज इजिप्टाय (Aedes aegypti) मच्छर के काटने से फैलता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    कितना पुराना है जीका वायरस
    बेशक जीका वायरस का कोई इलाज नहीं निकला है. कई दशक से दुनिया में मौजूद यह वायरस सबसे पहले 1947 में यूगांडा में पाया गया था. इसके बाद साल 2015 में ही मध्य और दक्षिणी अमेरिका में बड़ी संख्या में इसका संक्रमण पाया गया था. लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रभाव गर्भवती महिलाओं और उनके पैदा होने वाले शिशुओं में देखा गया.

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    एक बहुत कम दिखने वाला प्रभाव
    जीका वायरस के साथ कुछ बहुत ही कम होने वाले गंभीर नतीजे देखने को मिले हैं जो उसका खौफ पैदा करते हैं. यह कुछ मामलों ममें गगुईलाइन बैरे सिंड्रोम से पीड़ित कर सकता है, जो इंसान के नर्वस सिस्टम को कमजोर करने वाली आसमान्य बीमारी है जिसमें हमारे शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली खुद की ही तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगते हैं. जिससे मांसपेशियों में कमजोरी से लेकर लकवा तक हो सकता है.

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    जीका वायरस (Zika virus) संक्रमण का पता केवल खून की जांच से लग सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    और ये खतरनाक असर भी
    इससे भी कम मामलों में इस बीमारी का असर दिमाग पर होता है जिसे स्पाइनल कॉर्ड या दिमाग में सूजन आ जाती है या खून में विकार आ जाता है जिससे खून का बहना,खून का थक्का तक लग सकता है. इसके अलावा संक्रमित महिला के नवजात शिशु में मस्तिष्क विकार आने के साथ माइक्रेसेफाली जैसा विकार भी हो सकता है जिसमें जन्म से ही सिर का आकार ही छोटा होता है.

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    केरल के मामले में अच्छी बात यह है कि सरकार ने चेतने में देर नहीं की है. जीका वायरस का पता खून की जांच से ही चल सकता है. ऐसे में संक्रमण फैल रहे इलाकों में इसकी जांच और अन्य सावधानियां बरतने बहुत जरूरी है. दुर्भाग्य से अभी मानसून का मौसम चल रहा है जब केरल में भारी बारिश होती है जो मच्छरों के लिए अनुकूल मौसम होता है. फिर भी सही तरह की सावधानी और तत्परता से इस खतरे से बचना संभव है.

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