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सफर 25 पैसे का : चतुर चेहरा 'चवन्नी छाप' का और सीधे-सादे चेहरे पर 'चवनिया मुस्कान'

25 पैसे के सिक्के का चलन बंद हुए आज 10 साल हो गए.

25 पैसे के सिक्के का चलन बंद हुए आज 10 साल हो गए.

आपको याद दिलाना चाहता हूं कि चवन्नी अब प्रचलन में नहीं है. इसे प्रचलन से बाहर हुए आज पूरे दस साल हो गए. 30 जून 2011 में रिजर्व बैंक के आदेश पर 25 पैसे के सिक्के का चलन बंद कर दिया गया था.

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जिंदगी में बड़ी आपाधापी है. अब पहले की तरह सुकून के पल नहीं महसूस होते. सबकी आंखों में एक बेचैनी छाई रहती है. चेहरे पर हवाइयां उड़ी रहती हैं. अब होठों पर 'चवनिया मुस्कान' नहीं दिखती. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि अब 'आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपइया' के दौर से हमसब गुजर रहे हैं. आप कह सकते हैं कि इस बढ़ी हुई महंगाई ने मध्यवर्ग को 'चवन्नी छाप' बना कर रख दिया है. हमसे पहले की पीढ़ी के लोग 'पाई-पाई' जोड़कर महल बना लिया करते थे, बाद की पीढ़ी ने 'एक-एक' पैसा जोड़कर अपना घर संवारा और अब तो खर्च इतना बढ़ गया कि मध्यवर्ग कहां से रुपये जोड़े?

कहां गुम हो गए मेरे पैसे

मेरी अब तक की बातों से आपको पैसे के सफर का थोड़ा अंदाज हो गया होगा. जी हां, आपको याद दिलाना चाहता हूं कि चवन्नी अब प्रचलन में नहीं है. इसे प्रचलन से बाहर हुए आज पूरे दस साल हो गए. 30 जून 2011 में रिजर्व बैंक के आदेश पर 25 पैसे के सिक्के का चलन बंद कर दिया गया था. बाद के दिनों में 50 पैसे का चलन खुद-ब-खुद बंद होता गया. सच तो यह भी है कि आज की पीढ़ी सोच नहीं सकती 25 पैसे की कीमत. जब मैंने अपने जीवन में पहली बार पापा के स्कूटर में पेट्रोल डलवाया उस वक्त 7 रुपये 25 पैसे लीटर इसकी कीमत थी. अपने नाना के लिए पान लाने जाता था, एक जोड़ा पान की कीमत सिर्फ 15 पैसे हुआ करती थी. हरे चने के 2 मुट्ठे (एक मुट्ठे में कई डंडियां) 25 पैसे में मिल जाते थे. कहा जा सकता है कि 25 पैसे उस वक्त हमारे दिन भर का जेबखर्च हुआ करता था, जिसमें हम अपने कई शौक पूरा कर लिया करते थे. धूम्रपान करने वालों को याद हो सकता है कि उस वक्त कई-कई ब्रांड के सिगरेट महज 25 पैसे पीस आया करते थे, कुछ की कीमत 10 पैसे भी हुआ करती थी.

श्रेष्ठता के मारे दो कौड़ी के लोग

कुछ लोगों में श्रेष्ठता बोध इस कदर सिर चढ़कर बोलता है कि वे दूसरों को खुद से कमतर बताने के लिए कह उठते हैं 'वह तो दो कौड़ी का आदमी भी नहीं है'. आपने भी इस तरह के जुमले अपने आसपास खूब सुने होंगे. मुमकिन है कि कभी गुस्से और नफरत में आपने भी किसी को 'चवन्नी छाप' कहा या समझा होगा. आखिर ये जुमले आए कहां से? आपको याद दिलाऊं कि जब भारतीय मुद्रा के रूप में पैसे और रुपये को मानक बनाया गया, उससे पहले भारतीय मुद्रा के रूप में 'आना' का प्रचलन था और 'आना' से पहले विनिमय के लिए 'कौड़ी' इस्तेमाल की जाती थी. कौड़ी मुद्रा की बहुत छोटी इकाई हुआ करती थी. आपने अब भी अपने घर के किसी बुजुर्ग को कहते सुना होगा कि फलां चीज तो हमारे समय में कौड़ियों के मोल भी नहीं बिका करती थी, जिसकी कीमत आज इतनी ज्यादा हो गई है. इसी तरह चवन्नी भी चूंकि मुद्रा की छोटी इकाई होती थी तो लोकोक्ति चल निकली - चवन्नी छाप आदमी और चवनिया मुस्कान.

चवन्नी पर चतुराई

अब के लोगों से तुलना करते हुए लोग कहते हैं कि पहले बहुत सीधे-सादे लोग हुआ करते थे. मेरा मानना है कि अब भी सीधे-सादे लोग हुआ करते हैं. लेकिन इन सीधे-सादे लोगों के बीच जैसे अब भी कई घाघ किस्म के लोग होते हैं, वैसे ही पहले भी कुछ घाघ लोग हुआ करते थे. तो जब 'आना' को विस्थापित कर 'चवन्नी' प्रचलन में आई तो कुछ लोगों ने अपनी चतुराई दिखानी शुरू की. इस चतुराई को एक छोटी सी घटना से समझें.

सोलहो आना बोले तो सौ प्रतिशत

'सोलहों आना सही' जैसी लोकोक्ति आपने सुनी होगी. दरअसल 16 आने का मतलब 100 प्रतिशत होता है. गर कोई मुझसे पूछे कि 16 आना मतलब 1 रुपया तो 1 आना मतलब कितना पैसा. जाहिर है मैं तुरंत 100 को सोलह से डिवाइड करूंगा और बता दूंगा कि 1 आना में 6.25 पैसे. लेकिन याद करें कि यह दशमल तो तब सामने आया जब भारतीय मुद्रा में पैसे को मानक माना गया. उससे पहले तो मुद्रा में दशमल का इस्तेमाल होता ही नहीं था. हमारे बुजुर्ग बताते हैं कि 16 आने में 96 पैसे होते थे, यानी 1 आना बराबर 6 पैसे. तो इसी हिसाब का फायदा उठा कर कुछ घाघ लोग दुकानदारों को चूना लगाते थे. बुजुर्ग ने अपने जमाने के एक 'चतुर' को याद करते हुए बताया कि जब मुद्रा के रूप में पैसे का चलन शुरू हुआ तो वह अक्सर सब्जी दुकानदारों से जाकर किसी सब्जी की कीमत पूछते और अभ्यासवश सब्जी दुकानदार बोल देता - चार आने किलो. तो वह आदमी सब्जी वाले को 24 पैसे थमा कर सब्जी लेकर चल देता था. इस तरह वह एक रुपये की खरीदारी करके 4 पैसे बचा लिया करता था, या कह सकते हो कि 4 पैसे की ठगी करता था. तो इस तरह के ठग अब भी हैं समाज में. अंतर केवल इतना है कि अब वे दो-चार पैसों की ठगी या हेराफेरी नहीं करते, बल्कि अब तो वे करोड़ों रुपयों की ठगी करते हैं.

12 आना से 'बरन्नी' में क्यों नहीं बदला 75 पैसा?

वैसे, यह जानना रोचक है कि 25 पैसे को हम चवन्नी कैसे कहने लगे और 50 पैसे को अठन्नी. दरअसल, 4 आना चवन्नी में बदला और 8 आना अठन्नी में. लेकिन पूछा जा सकता है कि 75 पैसा 12 आना से बरन्नी में क्यों नहीं बदला? इस सवाल का जवाब यही है कि 75 पैसे का सिक्का बना ही नहीं तो उसके बरन्नी में बदलने की गुंजाइश नहीं बनी और इसीलिए किशोर दा गाते रहे - दे दो मेरा 5 रुपइया 12 आना... अब जब आज 25 पैसे के बहाने उन पुरानी मुद्राओं को याद कर रहा हूं या पैसे के सबसे छोटे रूपों को याद कर रहा हूं, तो 1, 2, 3, 5, 10, 20, 25 और 50 पैसे के सिक्के भी याद आ रहे हैं. अलग-अलग साइज और रूप के ये सिक्के कितने प्यारे लगते थे. यह अलग बात है कि आज की महंगाई के सामने जब रुपये ने घुटने टेक दिए हैं तो इन छोटे सिक्कों की बिसात ही क्या? लेकिन एक सच तो यह भी है कि इन सिक्कों को याद कर एक चवनिया मुस्कान चेहरे पर आज भी बिखर जाती है.

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