होम /न्यूज /जीवन शैली /Exclusive: कम उम्र में डिप्रेशन को हरा कर कई बच्चों की मदद कर रही हैं अर्शिया गौड़

Exclusive: कम उम्र में डिप्रेशन को हरा कर कई बच्चों की मदद कर रही हैं अर्शिया गौड़

अर्शिया गौड़ एनोरेक्सिया को हरा कर आगे बढ़ीं.

अर्शिया गौड़ एनोरेक्सिया को हरा कर आगे बढ़ीं.

Motivational Story Of Arshya Gaur: छोटी उम्र में अर्शिया गौड़ डिप्रेशन और एनोरेक्सिया के खिलाफ जंग लड़कर कई बच्चों की श ...अधिक पढ़ें

Arshya Gaur’s Inspirational Story: जिंदगी में कुछ बेहतरीन न कर पाने के लिए उम्र महज एक बहाना होती है. कई लोगों ने छोटी उम्र में ही इतना कुछ हासिल कर लिया है कि वह दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं. ऐसी ही एक शख्सियत हैं 17 साल की अर्शिया गौड़. आपको बता दें कि अर्शिया एक मामूली स्कूल स्टूडेंट नहीं हैं बल्कि उन्होंने अपने नाम के साथ ऐसी पहचान जोड़ ली है जिसके बारे में जानकर कोई भी इस सोच में पड़ जाएगा कि इतनी छोटी उम्र में इन्होंने इतना सब कैसे कर लिया. हम आपको बता दें कि महज 17 साल की उम्र से ही अर्शिया गौड़ छोटे बच्चों की मेंटल हेल्थ (Child Mental Health) के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं. इसी के साथ ही वह ऐसे बच्चे, जो पढ़ाई-लिखाई से वंचित हैं और कोरोना काल में शिक्षा पाने के लिए इंटरनेट और स्मार्टफोन का पैसों की तंगी या किसी कारण से इस्तेमाल नहीं कर पाते, उनकी सहायता भी करती हैं. आपको बता दें कि अर्शिया अब तक लाखों की धन राशि जरूरतमंद बच्चों की बेहतरी के लिए जुटा चुकी हैं. न्यूज़18 को दिए खास इंटरव्यू में अर्शिया ने अपने मिशन और बच्चों की मेंटल हेल्थ से जुड़ी कई अहम बातें बताईं.

बच्चों के लिए तैयार किया ‘रीड टुगेदर प्रोग्राम’

कोविड-19 महामारी (COVID19 Pandemic) के दौरान सभी स्कूलों ने ऑनलाइन शिक्षा (Online Education) देनी शुरू की लेकिन इस बीच कई बच्चे ऐसे भी थे जो पैसों की कमी या ऑनलाइन क्लास लेने के लिए मोबाइल या कोई डिवाइस न होने की वजह से पढ़ाई नहीं कर पा रहे थे. दरअसल, इनमें से कई बच्चों के माता-पिता चाह कर भी उन्हें इंटरनेट और मोबाइल देने में असमर्थ थे. अर्शिया ने हमें बताया कि ऐसे ही बच्चों के लिए वह करीब 11 लाख का फंडरेज कर चुकी हैं. उन्होंने कई बच्चों तक टैबलेट और इंटरनेट की सुविधा पहुंचाई है.

आपको बता दें कि अर्शिया ने एड टेक प्लेटफॉर्म ‘रीड टुगेदर प्रोग्राम’ (EdTech Platform Read Together Programme) को डेवलव किया. इसमें एनसीआरटी बेस्ड ऑडियो-विजुअल कंटेंट उपल्ब्ध है. उनका मानना है कि बच्चे इस माध्यम से आसानी से पढ़ और समझ पाएंगे. अर्शिया ने जानकारी दी कि उनके ‘रीड टुगेदर प्रोग्राम’ पर इंग्लिश सबजेक्ट का कंटेंट फिलहाल उप्लब्ध है लेकिन उनका मकसद इसे मल्टी सब्जेक्ट बनाना है ताकि बच्चे टेक्स्ट बुक के अलावा जर्नल नॉलेज और तमाम टॉपिक्स पर ज्ञान प्राप्त कर पाएं.

यह भी पढ़ें- अपने दुखों की वजह आप खुद न बनें- गौतम बुद्ध

काम करते-करते हुआ खुद पर भरोसा

अर्शिया ने हमें बताया कि उन्हें पहले नहीं पता था कि वह ऐसा कुछ कर सकती हैं जिसका असर लंबे समय तक रहे लेकिन अब काम करते-करते उन्हें खुद पर भरोसा होने लगा है और उन्हें लगता है कि वह अपने मिशन को एक मुकाम तक पहुंचाने में सक्षम हैं. उनके इस नेक काम में उनके माता-पिता, उनके टीचर्स और दोस्त भी उनकी आर्थिक मदद के साथ-साथ रिसर्च में भी काफी हेल्प करते हैं.

अर्शिया अब तक कई बच्चों की मदद कर चुकी हैं. (Image- Arshya Gaur)

अर्शिया अब तक कई बच्चों की मदद कर चुकी हैं. (Image- Arshya Gaur)

उम्र बनती है उनके काम में बाधा
यंग टैलेंट अर्शिया ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, ‘मैं जब अपने इस प्रोग्राम के बारे में स्कूलों में जा कर बताती हूं तो कई बार मुझे ऐसा रिएक्शन मिलता है कि ये प्रोग्राम बच्चे ने तैयार किया है तो पता नहीं इसकी क्या वैल्यू होगी.’ उनके मुताबिक अक्सर उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता है. हांलाकि, इन सब के बावजूद उन्हें अभी तक कोई रोक नहीं पाया. अर्शिया अब तक करीब 500 बच्चों की मदद कर चुकी हैं. इसके अलावा वह युवा लेखिका भी हैं. आपको बता दें कि वह जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2021 में इनवाइट की गईं यंगेस्ट ऑर्थर हैं. उन्होंने ‘How to Open a Parachute’ नाम की किताब भी लिखी है. जानकारी के मुताबिक इस किताब में अर्शिया की डिप्रेशन और एनोरेक्सिया (Depression and anorexia) के खिलाफ जंग पर आधारित कविताओं का संग्रह है.

कम उम्र में डिप्रेशन की शिकार हुईं
अर्शिया बताती हैं कि पहले उनके मोटापे की वजह से उन्हें चिढ़ाया जाता था. जिसकी वजह से वह काफी परेशान रहने लगीं थीं और लोगों की कड़वी बातें उनके दिमाग में घूमती रहती थीं. जिसके बाद उन्हें उन चीजों से उबर पाने के लिए थेरिपी का सहारा लेना पड़ा. उन्होंने बताया कि थेरिपी और स्पोर्ट्स से उन्हें अपनी फीलिंग्स को शब्दों में बयान करना आया. जिसके बाद उन्होंने खुद को वैसे ही अपनाना शुरु कर दिया, जैसी वो हैं.

यह भी पढ़ें- महादेवी वर्मा की कविताएं: ‘क्या पूजन क्या अर्चन रे’, ‘नीर भरी दु:ख की बदली!’, ‘जो तुम आ जाते एक बार’

अर्शिया ने कहा, ‘मुझे लगता है कि बच्चों की मेंटल हेल्थ पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. उनका कहना है कि बच्चों के आसपास का माहौल कैसा है, उनके दोस्त और माता-पिता उनसे कैसा व्यवहार करते हैं, यह सब कुछ बच्चों की मानसिक सेहत के लिए मायने रखता है. वह कहती हैं कि बच्चों से आप जो कहते हैं, या उन्हें चिढ़ाते हैं तो वो उनके मन में बैठ जाता है. ऐसे में जरूरी है कि बच्चों की तकलीफों को समझा जाए. उन्हें अपनी बात कहने का मौका देना भी बहुत जरूरी है.

आपको बता दें कि इंटरव्यू में अर्शिया ने इस बात की जानकारी दी कि बच्चों को अजीबोगरीब नामों जैसे नालायक, मोटा या मोटी, छोटी आदी कहकर नहीं चिढ़ाना चाहिए. उन्होंने कहा कि बच्चों के प्रति संवेदनशीलता होना बहुत जरूरी है. इसके साथ ही उन्हें आगे बढ़ने का मौका देना और उनकी परेशानियों को सुनना भी चाहिए क्योंकि अगर वह ऐसी बातें जो उन्हें तकलीफ दे रही हैं, उन्हें मन में रखेंगे या डर के मारे किसी के साथ शेयर नहीं करेंगे तो आगे चलकर उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा. उनका कहना है कि डिप्रेशन, एंग्जाइटी (Anxiety) जैसी समस्याओं की जड़ समझकर बच्चों को उनसे बाहर निकालना बहुत जरूरी है.

Tags: Child Care, Health, Mental health, Mental Health Awareness, Women Health

टॉप स्टोरीज
अधिक पढ़ें