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भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, राम मनोहर लोहिया के साथ खूब याद आते हैं कवि पाश

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Updated: March 23, 2020, 9:08 AM IST
भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, राम मनोहर लोहिया के साथ खूब याद आते हैं कवि पाश
पाश आज सिर्फ पंजाबी कवि नहीं रह गए बल्कि हिंदी प्रदेश भी उन्हें अपना कवि समझने लगा

पाश की पहचान सिर्फ पंजाबी कवि के रूप में थी. आतंकवादियों की गोली ने पाश की देह की उम्र तो रोक दी पर उनकी आवाज को उम्र से परे कर दिया.

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  • Last Updated: March 23, 2020, 9:08 AM IST
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भारतीय इतिहास में 23 मार्च कई वजहों से बेहद खास दिन है. आज ही के दिन 1931 को हमारे स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के साहस से डरे अंग्रेजों ने इन तीनों को फांसी दे दी थी. इन तीनों बलिदानियों को उनकी शहादत के लिए हमारा नमन.

आज ही के दिन 1910 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जनपद में समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था. लोहिया ने भारत में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का पुरजोर विरोध किया था. भारतीय गणतंत्र को लेकर उनकी सोच ठेठ देसी थी. लोहिया ने साठ के दशक में देश से अंग्रेजी हटाने का आह्वान किया. उनके लिए अपनी भाषा का मुद्दा राजनीति का नहीं, बल्कि स्वाभिमान का प्रश्न था. वे लोगों को अंग्रेजी न जानने की हीन ग्रंथि से उबार देना चाहते थे. वे कहते थे 'मैं चाहूंगा कि हिंदुस्तान के साधारण लोग अपने अंग्रेजी के अज्ञान पर लजाएं नहीं, बल्कि गर्व करें. इस सामंती भाषा को उन्हीं के लिए छोड़ दें, जिनके मां-बाप अगर शरीर से नहीं तो आत्मा से अंग्रेज रहे हैं.' उन्होंने देश को सप्त क्रांति का संदेश दिया था.

तीसरी खास बात है कि 23 मार्च 1988 को खालिस्तानी आतंकवादियों ने अवतार सिंह संधू 'पाश' की कविताओं से डरकर उनकी हत्या कर दी थी. इस पंजाबी कवि का अपराध (?) यही था कि वह इस जंगलतंत्र में फंसी सारी चिड़ियों को लू-शुन की तरह समझाना चाह रहे थे. चिड़ियों को भी इनकी बात समझ आने लगी थी और वे एकजुट होकर बंदूकवाले हाथों पर हमला करने ही वाली थीं कि किसिम-किसिम के चिड़ियों का हितैषी मारा गया. उस वक्त पाश महज 36 बरस के थे.

पाश बेशक जिंदादिल इंसान थे. उनकी जिंदादिली की पहचान हैं उनकी बोलती-बतियाती कविताएं. पाश की कविताएं महज कविताएं नहीं हैं, बल्कि विचार हैं. जिंदगी को करीब से देखने का तरीका हैं. अपने 21 वर्षों की काव्य-यात्रा में पाश ने कविता के पुराने पड़ रहे कई प्रतिमानों को तोड़ा और अपने लिए एक नई शैली तलाशी. संभवतः अपने इसी परंपराभंजक तेवर के कारण पाश ने लिखा है :



तुम्हें पता नहीं

मैं शायरी में किस तरह जाना जाता हूं

जैसे किसी उत्तेजित मुजरे में

कोई आवारा कुत्ता आ जाए

तुम्हें पता नहीं

मैं कविता के पास कैसे जाता हूं

कोई ग्रामीण यौवना घिस चुके फैशन का नया सूट पहने

जैसे चकराई हुई शहर की दुकानों पर चढ़ती है.

 

पाश की कविताओं में विषय-वैविध्य भरपूर है, किंतु उनके केंद्रीय भाव हमेशा एक हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह रही है कि पाश ने जिंदगी को बहुत करीब से देखा. तहजीब की आड़ में छूरे के इस्तेमाल को उन्होंने हमेशा दुत्कारा, साथ ही मानवता और उसकी सचाई को उन्होंने गहरे आत्मसात किया. पाश के लिए ये पंक्तियां लिखते हुए उनकी कविता 'प्रतिबद्धता' याद आती है, जिसका करारा सच प्रतिबद्धता के नाम पर लिखी ढेर सारी कविताओं को मुंह चिढ़ाता है :
हम चाहते हैं अपनी हथेली पर कोई इस तरह का सच

जैसे गुड़ की चाशनी में कण होता है

जैसे हुक्के में निकोटिन होती है

जैसे मिलन के समय महबूब के होठों पर

कोई मलाई जैसी चीज होती है.

गुड़ की चाशनी, हुक्के की निकोटिन और महबूब के होठों की मलाई - ये बिंब पाश जैसे कवि को ही सूझ सकते हैं. यह अलग बात है कि नासमझ आलोचक इसे बेमेल बिंबों की अंतर्योजना कह कर खारिज करना चाहें. पाश ने खेतों-खलिहानों में दौड़ते-गाते, बोलते बतियाते हुए हाथों की भूमिका भी सीखी :
हाथ अगर हों तो

जोड़ने के लिए ही नहीं होते

न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं

यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं

हाथ अगर हों तो

'हीर' के हाथों से 'चूरी' पकड़ने के लिए ही नहीं होते

'सैदे' की बारात रोकने के लिए भी होते हैं

'कैदो' की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं

हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते

लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं.

इस अंदाज में अपनी बात वही कवि रख सकता है जिसे पता हो कि वह कहां खड़ा है और सामनेवाला कितने पानी में है :
जा, तू शिकायत के काबिल होकर आ

अभी तो मेरी हर शिकायत से

तेरा कद बहुत छोटा है.

मनुष्य और उसके सपने, उसकी जिंदादिली और इन सबसे भी पहले अपने आसपास की चीजों के प्रति उसकी सजगता पाश को बहुत प्यारी थी :
मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती

लोभ और गद्दारी की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है

सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है

किसी जुगनू की लौ में पढ़ना बुरा तो है

कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है

पर सबसे खतरनाक नहीं होता.

सबसे खतरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना

न होना तड़प का, सब कुछ सहन कर लेना

घर से निकलना काम पर और काम से घर लौट जाना

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना....

पाश के लिए कविता प्रेम-पत्र नहीं है और जीवन का अर्थ शारीरिक और भौतिक सुख भर नहीं. बल्कि इन सबसे परे पाश की दृष्टि एक ऐसे कोने पर टिकती है, जिसे आज के भौतिकतावादी समाज ने नकारने की कोशिश की है, वह है उसकी आजादी के सपने. आज़ादी सिर्फ तीन थके रंगों का नाम नहीं और देश का मतलब भौगोलिक सीमाओं में बंधा क्षेत्र विशेष नहीं. आज़ादी शिद्दत से महसूसने की चीज है और देश, जिसकी नब्ज भूखी जनता है, उसके भीतर भी एक दिल धड़कता है. इसलिए पाश हमेशा इसी सर्वहारा के पक्ष में खड़े दिखते हैं.

वैसे तो पाश की राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज रही हैं. विभिन्न पार्टियों से जुड़कर आमजन के लिए लड़ना उनका धर्म रहा है. पर उनकी मुख्य पहचान किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बनी, बल्कि एक क्रांतिकारी और जुझारू कवि के रूप में बनी. पार्टियों के बदलते स्टैंड और वहां पैठी अवसरवादिता पाश को कचोटती थी. यह पाश की खीज ही थी जो उनकी कविता ‘हमारे समय में’ में पूरे चरम पर दिखती है :
यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था

कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्द ने

बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं

मार्क्स का सिंह जैसा सिर

दिल्ली के भूलभुलैयों में मिमियाता फिरता

हमें ही देखना था

मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे समयों में होना था...

पाश ने अपने पहले काव्य संग्रह का नाम रखा था - लौहकथा. इस नाम को सार्थक करनेवाली उनकी कविता है लोहा. कवि ने इस कविता में लोहे को इस कदर पेश किया है कि समाज के दोनों वर्ग सामने खड़े दिखते हैं. एक के पास लोहे की कार है तो दूसरे के पास लोहे की कुदाल. कुदाल लिए हुए हाथ आक्रोश से भरे हैं, जबकि कारवाले की आंखों में पैसे का मद है. लेकिन इन दोनों में पाश को जो अर्थपूर्ण अंतर दिखता है, वह यह है कि :
आप लोहे की चमक में चुंधियाकर

अपनी बेटी को बीवी समझ सकते हैं

(लेकिन) मैं लोहे की आंख से

दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन

भी पहचान सकता हूं

क्योंकि मैंने लोहा खाया है

आप लोहे की बात करते हो.

पाश की कविताओं से गुजरते हुए एक खास बात यह लगती है कि उनकी कविता की बगल से गुजरना पाठकों के लिए मुश्किल है. इन कविताओं की बुनावट ऐसी है, भाव ऐसे हैं कि पाठक बाध्य होकर इनके बीच से गुजरते हैं और जहां कविता खत्म होती है, वहां आशा की एक नई रोशनी के साथ पाठक खड़े होते हैं. यानी, तमाम खिलाफ हवाओं के बीच भी कवि का भरोसा इतना मुखर है, उसका यकीन इतना गहरा है कि वह पाठक को युयुत्सु तो बनाता ही है, उसकी जिजीविषा को बल भी देता है.
मैं किसी सफ़ेदपोश कुर्सी का बेटा नहीं

बल्कि इस अभागे देश की भावी को गढ़ते

धूल में लथपथ हजारों चेहरों में से एक हूं

मेरे माथे पर बहती पसीने की धारों से

मेरे देश की कोई भी नदी बेहद छोटी है.

किसी भी धर्म का कोई ग्रंथ

मेरे जख्मी होठों की चुप से अधिक पवित्र नहीं है.

तू जिस झंडे को एड़ियां जोड़कर देता है सलामी

हम लुटे हुओं के दर्द का इतिहास

उसके तीन रंगों से ज्यादा गाढ़ा है

और हमारी रूह का हर एक जख्म

उसके बीच वाले चक्र से बहुत बड़ा है

मेरे दोस्त, मैं मसला पड़ा भी

तेरे कीलों वाले बूटों तले

माउंट एवरेस्ट से बहुत ऊंचा हूं

मेरे बारे में गलत बताया तेरे कायर अफसरों ने

कि मैं इस राज्य का सबसे खतरनाक महादुश्मन हूं

अभी तो मैंने दुश्मनी की शुरुआत भी नहीं की

अभी तो हार जाता हूं मैं

घर की मुश्किलों के आगे

अभी मैं कर्म के गड्ढे

कलम से आट लेता हूं

अभी मैं कर्मियों और किसानों के बीच

छटपटाती कड़ी हूं

अभी तो मेरा दाहिना हाथ तू भी

मुझसे बेगाना फिरता है.

अभी मैंने उस्तरे नाइयों के

खंजरों में बदलने हैं

अभी राजों की करंडियों पर

मैंने लिखनी है वार चंडी की.

उन्होंने अपनी लंबी कविता 'पुलिस के सिपाही से' में स्पष्ट कहा है :

मैं जिस दिन रंग सातों जोड़कर

इंद्रधनुष बना

मेरा कोई भी वार दुश्मनों पर

कभी खाली नहीं जाएगा.

तब फिर झंडीवाले कार के

बदबू भरे थूक के छींटे

मेरी जिंदगी के घाव भरे मुंह पर

न चमकेंगे...

1974 में प्रकाशित 'उड्डदे बाजां मगर' में पाश की निगाह बेहद पैनी हो गयी है और शब्द उतने ही मारक. इसी संकलन की कविता है - हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम से

हम लड़ेंगे साथी गुलाम इच्छाओं से

हम चुनेंगे साथी जिंदगी के सपने

पाश ने देश के प्रति अपनी कोमल भावना का इजहार पहले काव्य संग्रह की पहली कविता में किया है :

भारत

मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द

जहां कहीं भी इस्तेमाल होता है

बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं...

पर पाश इस भारत को किसी सामंत पुत्र का भारत नहीं मानते. वह मानते हैं कि भारत वंचक पुत्रों का देश है.

नवंबर '84 के सिख विरोधी दंगों से सात्विक क्रोध में भर कर पाश ने 'बेदखली के लिए विनयपत्र' जैसी रचना भी की. इस कविता में मारे गये निर्दोष सिखों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, तो दूसरी तरफ सत्ता की गलत नीतियों के प्रति विद्रोह भी.
मैंने उम्रभर उसके खिलाफ़ सोचा और लिखा है

अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है

तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें...

... इसका जो भी नाम है - गुंडों की सल्तनत का

मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं

मैं उस पायलट की चालाक आंखों में

चुभता हुआ भारत हूं

हां, मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में

अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है

तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो.

क्या आज की तारीख में यह मुमकिन है कि कोई कवि सत्ता के खिलाफ अपना सात्विक विरोध इन शब्दों के साथ सामने रखे और उसे देशद्रोही की उपाधि न मिले? क्या आज अगर पाश जीवित होते और लगातार कविताएं लिख रहे होते तो उनकी आवाज में यही खनक होती? मुझे लगता है कि पाश अपनी विचारधारा और अपनी भाषा पर अंकुश नहीं लगाते बल्कि वे और सख्ती के साथ विद्रोही कवि के रूप में सामने आते.

वैसे, अपनी हत्या तक पाश की पहचान सिर्फ पंजाबी कवि के रूप में थी. आतंकवादियों की गोली ने पाश की देह की उम्र तो रोक दी पर उनकी आवाज को उम्र से परे कर दिया. वह आवाज इतनी बुलंद होती गई कि पाश आज सिर्फ पंजाबी कवि नहीं रह गए बल्कि हिंदी प्रदेश भी उन्हें अपना कवि समझने लगा और विरोध के लिए पाश की कविताएं अब भी उनसे उधार लेता रहता है.

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First published: March 23, 2020, 9:03 AM IST
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