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5 आदिवासी महिला कार्यकर्ता जिन्होंने अपने समुदाय के लिए उठाई बुलंद आवाज

News18Hindi
Updated: December 13, 2019, 1:30 PM IST
5 आदिवासी महिला कार्यकर्ता जिन्होंने अपने समुदाय के लिए उठाई बुलंद आवाज
कुछ आदिवासी महिला कार्यकर्ता ऐसी हैं जिन्होंने साबित किया है कि आदिवासियों को अब दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए.

कुछ आदिवासी महिलाएं ऐसी हैं जो लोकतंत्र और शांति को बनाए रखने के लिए अपने समुदायों और मानवता के लिए खड़ी हुईं. उन्होंने राज्य के दमनकारी विषयों, पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है.

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  • Last Updated: December 13, 2019, 1:30 PM IST
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भारत में एक आदिवासी महिला बड़ी ही आसानी से राज्य हिंसा और भेदभाव का शिकार हो जाती है लेकिन कुछ आदिवासी महिलाएं ऐसी भी हैं जो लोकतंत्र और शांति को बनाए रखने के लिए अपने समुदायों और मानवता के लिए खड़ी हुईं. उन्होंने राज्य के दमनकारी विषयों, पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है. फेमिनिज्म इन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कुछ आदिवासी महिला कार्यकर्ताएं हैं जिन्होंने साबित किया है कि आदिवासियों को अब दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए. आइए जानते हैं ऐसी 5 आदिवासी महिलाओ के बारे में जिन्होंने अपने समुदाय के लिए आवाज उठाई.

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दयामनी बारला



झारखंड में आदिवासियों और ग्रामीणों के साथ विस्थापन की एक ऐसी ही लड़ाई लड़ रही हैं दयामनी बारला, जिन्हें झारखंड की आयरन लेडी के रूप में भी जाना जाता है. दयामनी बारला का कहना है कि वो आदिवासी, दलित और महिलाओं की जिंदगी के सवालों की लड़ाई लड़ रही हैं. दयामनी 1995 में झारखंड में जल, जंगल, ज़मीन की लड़ाई से जुड़ी थीं, तब से लेकर आज तक वो झारखंड के लगभग सभी आंदोलनों में शामिल रही हैं.

दयामनी का कहना है कि विस्थापन की लड़ाई सरकार के खिलाफ होती है, बड़ी-बड़ी कंपनियों के खिलाफ होती है, कंपनियों के दलालों के खिलाफ होती है. सत्ता और सत्ता पोषित इन ताकतवर लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ने पर आपके ऊपर जानलेवा हमले होते हैं, आपको हर वक्त एक भयावह आतंक के साये में जीने के लिए विवश कर दिया जाता है.

दयामनी ने कॉलेज की पढ़ाई के बाद किसी बड़ी कंपनी में काम करने की जगह चाय की दुकान चलाने का फैसला किया और तब से लेकर आजतक वो एक चाय की दुकान चलाती हैं. दयामनी का कहना है कि जब उन्होंने पीपुल मूवमेंट से जुड़ना शुरू किया तब उन्हें लगा कि रोज़गार के लिए खुद ही कुछ करना चाहिए. दयामनी जल, जंगल जमीन के मूवमेंट में 2012 में करीब 3 महीनों तक जेल में रही थीं. अभी फिलहाल सारे प्रोजेक्ट रूके हुए हैं.कुनी सिकाका


कुनी सिकाका बीस साल की है. उसका गांव नियामगिरी के पहाड़ों पर बसा है. कुनी डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय से आती है. पिछले कई सालों से उसके गांव, जंगल और पहाड़ पर एक कंपनी की नजर गड़ी हुई है, जो वहां जंगलों-गांवों को खत्म करके बॉक्साइट निकालना चाह रही है लेकिन स्थानीय आदिवासी नियामगिरी पहाड़ को अपना भगवान मानते हैं, उनकी जीविका इसी जंगल पर टिकी है.

उन्होंने दशक भर से ज्यादा अपने जंगल, पहाड़ और प्रकृति को बचाने के लिए लड़ाई लड़ी- एकदम शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष का रास्ता चुना. इसी संघर्ष का नतीजा है कि कंपनी बॉक्साइट खनन करने में अब तक नाकाम रही है. इसी संघर्ष में कुनी सिकाका भी शामिल है. सिकाका के परिवार वाले नियामगिरी सुरक्षा समिति से जुड़े हैं, जो जंगल पर आदिवासियों की हक की लड़ाई को शांतिपूर्ण तरीके से लड़ने और जीतने में सफल रही है.

2 मई 2019 को सिकाका को पुलिस ने माओवादी होने के आरोप में गोर्टा गांव से गिरफ्तार कर लिया था. आरोप लगाया गया कि माओवादियों के लिए तैयार की गयी लिस्ट में उसका भी नाम शामिल है. सिकाका और उसके परिवार वाले समाजवादी जनपरिषद से जुड़े हैं. मध्यप्रदेश से लेकर ओडिशा तक यह एक राजनीतिक संगठन है जिसमें लोहिया और गांधी को मानने वाले समाजवादी लोग हैं.

जमुना टुडू


13 फरवरी 2019 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने लाखों आदिवासियों को वन क्षेत्रों से बाहर जाने का फरमान सुनाया था, जिसके बाद साहसी आदिवासी महिला जमुना टुडू ने वन और वृक्षों को बचाने की मुहिम में अपना जीवन दांव पर लगा दिया. जमुना टुडू संताल आदिवासी समुदाय से संबंध रखती हैं और झारखंड के पूर्वी सिंहभूम के चाकुलिया मातूराम गांव में रहती हैं. उनकी पैदाइश ओडिसा में हुई और 1998 में उनका विवाह झारखंड में हुआ था. जमुना ने अपने वृक्ष बचाओ अभियान के लिए महिलाओं के साथ पेट्रोलिंग का काम शुरू कर दिया.

कोई अगर वृक्षों को काटता दिखता तो जमुना और उसकी महिला टीम उन लोगों को वृक्ष काटने से रोकती. जमुना अपनी टीम के साथ सुबह, दोपहर और शाम को एक बार जरूर पेट्रोलिंग पर निकलती और बिना किसी सरकारी मदद के वह अभियान में लगी रहीं. जमुना का एक सपना है कि जंगल बचाने का यह अभियान सिर्फ झारखंड तक ही सीमित न रहे बल्कि यह अभियान अब पूरे भारत देश में फैले. लोगों को जंगल के बारे में जागरूक करना ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया है.

उन्हें न किसी राजनीतिक लोगों का डर है, न ही जंगल माफियाओं और न ही किसी नक्सली संगठनों से खौफ है. वह हमेशा उन चुनौतियों के लिए तैयार रहती हैं. लोग उन्हें लेडी टार्ज़न के नाम से भी पुकारते हैं. जमुना प्रत्येक वर्ष अपनी महिला साथियों के साथ जंगलों में जाकर वृक्षों को रक्षाबंधन के दिन राखी बांधती हैं और उन वृक्षों की रक्षा का प्रण लेती हैं. जमुना को वर्ष 2014 में स्त्री शक्ति अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था. वहीं 2019 को भारत के माननीय राष्ट्रपति द्वारा जमुना को पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया.

नीदोनू अंगामी


मदर ऑफ पीस नीदोनू अंगामी एक नागा आदिवासी महिला हैं और नागा मदर्स एसोसिएशन (NMA) की संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. 1984 में गठित, एसोसिएशन उस समय समाज में सामाजिक बुराइयों की प्रतिक्रिया थी. संघ एक मंच है जो साझा करता है कि नागा विद्रोहियों की महिलाओं को हत्याओं और हिंसा के बारे में क्या लगता है. NMA ने हमेशा भारतीय राज्य और नागा विद्रोहियों के बीच हत्याओं को रोकने के लिए मध्यस्थ बनने की कोशिश की है.

नीदोनू अंगामी का नाम नो मोर ब्लड अभियान के साथ सामने आया था. इसी के चलते NMA और विभिन्न नागा भूमिगत विद्रोहियों के बीच बातचीत हुई जिससे उन्हें शांति बनाए रखने का अनुरोध किया गया. उन्होंने NMA की विभिन्न शाखाओं जैसे NMA युवा और महिला कल्याण संगठन (1986) में नशीली दवाओं के दुरुपयोग और तस्करी, शराब और एचआईवी/एड्स से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. साल 2000 में, उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए 1000 महिलाओं की लिस्ट में नॉमिनेट किया गया था.

सोनी सोरी


सोनी सोरी छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित जबेली गांव की एक आदिवासी विद्यालय की शिक्षिका हैं. साल 2011 में पुलिस द्वारा यह इल्जाम लगाया गया कि वह नक्सलियों को सूचनाएं उपलब्ध करवाती हैं. सोनी सोरी को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया और छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया गया. कोर्ट में पेशी से पहले इन्हें दो दिन की पुलिस हिरासत में रखा गया, जहां छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा उन्हें बिजली के झटके लगाए गए.

थर्ड डिग्री टॉर्चर की वजह से कोर्ट में पहले दिन पेशी के दौरान वह चल भी नहीं पा रही थीं. सोनी सोरी को कोर्ट में पेशी के बाद जेल भेज दिया गया. ढाई साल की यातनापूर्ण कैद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्थाई जमानत प्रदान कर दी. छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा लगाए गए आठ आरोपों में सात झूठे निकले जबकि एक में उन्हें जमानत मिल गई.

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फिलहाल सोनी सोरी छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर हो रहे क्रूर हमलों का विरोध कर आदिवासियों को न्याय दिलाने की दिशा में काम कर रही हैं. बस्तर में फर्जी मुठभेड़ों, आदिवासियों महिलाओं के साथ सुरक्षाकर्मियों द्वारा बलात्कार समेत तमाम आदिवासी उत्पीडऩ के मुद्दों को सोनी सोरी ने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है, जिससे वह छत्तीसगढ़ पुलिस और प्रशासन के निशाने पर हैं.

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First published: December 13, 2019, 1:30 PM IST
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