धीरे-धीरे औरतों ने जहर पिया, धीरे-धीरे पेट के बच्‍चे ने हिलना बंद कर दिया

उसकी मां का जन्‍म परमाणु हमले के ढ़ाई महीने बाद हुआ था, लेकिन वो सुन-बोल नहीं सकती थीं. नानी को यकीन था कि ये उस काले बम और उसके बाद फैले धुएं का असर था. नानी पूरी जिंदगी होश और बेहोशी में उस काली रात का जिक्र करती रहीं. वो नींद में भी बोलती थीं.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 12:09 PM IST
धीरे-धीरे औरतों ने जहर पिया, धीरे-धीरे पेट के बच्‍चे ने हिलना बंद कर दिया
हिरोशिमा हमले पर 1952 में बनी फिल्‍म ‘चिल्‍ड्रेन ऑफ हिरोशिमा’ का एक दृश्‍य
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 12:09 PM IST
“पेन इको थ्रू द जनरेशंस” (दर्द की प्रतिध्‍वनि पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई देती है.)
- ‘द अफेयर’ - अमेरिकन सीरीज

उसी दर्द की वो प्रतिध्‍वनि थी. वो तीसरी पीढ़ी, वो एक 35 साल का बूढ़ा, जिसकी नानी 6 अगस्‍त, 1945 की उस रात हिरोशिमा से सटे एक छोटे कस्‍बे में थी, जिस दिन आसमान से काली बारिश हुई थी. मुझे उस कस्‍बे का नाम याद नहीं. उसने कुछ बताया तो था, लेकिन उस वक्‍त तो मैं सिर्फ कहानी सुन रही थी. सोचा नहीं था कि एक दिन वो कहानी सुनाऊंगी भी.

35 साल का छोटे कद का वो गोरा और चेहरे पर ढेर सारे तिल जैसे दिखने वाले महीन काले-भूरे दानों वाला वो लड़का मुझे समंदर वाले एक शहर के समंदर किनारे बने रेस्‍त्रां में मिला था. संयोग से उस जगह हम दोनों ही अकेले थे. वो एकदम चुप और मैं बहुत बातूनी. तब मैं इतना बोलती थी कि मेरे साथ कोई घुन्‍ना हो तो मैं उसके हिस्‍से का भी बोलकर शब्‍दों की कमी को पूरा कर सकती थी. उस दिन भी मैंने यही किया. चार कुर्सियों और चारखानेदार मेजपोश वाली उस मेज की एक कुर्सी पर जा बैठी, जहां वो अकेला बैठा था. हालांकि रेस्‍त्रां बिल्‍कुल खाली था. इतनी कुर्सियों में कोई भी कुर्सी चुनी जा सकती थी, लेकिन मैंने वो वाली चुनी, जिसके बगल वाली कुर्सी पर वो 33 साल का उदास बूढ़ा था. जाने क्‍यों मुझे लगा था कि उससे बात करनी चाहिए. हालांकि वो बड़ी खराब अंग्रेजी बोलता था. लेकिन मैं भी कौन ग्रेट ब्रिटेन में पैदा हुई थी और ‘वुदरिंग हाइट्स’ की कैथरीन थी.

हिरोशिमा का जिक्र हमारी बातों में इसलिए आया क्‍योंकि मैंने उससे पूछा कि वो जापान में कहां से है. उसने जवाब में कहा, “हिरोशिमा.” मैंने चौंककर दोहराया, “हिरोशिमा?” उसने पलटकर पूछा, “यू नो?” मैंने कहा, “हू डजंट?” उसकी आंखों से लगा कि उसे मेरी बात समझ में आ गई, लेकिन शायद ये समझ में आना उसे बहुत अच्‍छा नहीं लगा. दूर से कहानियां सुनना और सुनाना दोनों आसान है, लेकिन अगर आप खुद उस कहानी के पात्र हैं या शायद एक ऐसा परिवार, पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिसका हर सदस्‍य उस त्रासद कहानी का पात्र है तो आपको बिलकुल अच्‍छा नहीं लगेगा. न इस बात का जिक्र, न ये मामूली सा इशारा कि कोई और आपकी कहानी में झांक सकता है.

लेकिन कुछ वक्‍त गुजरा और मैं उसकी कहानी में झांक पाई. ले‍किन इससे पहले मैंने उसे अपनी कहानी में झांकने दिया. ताकि हम कहानियों के साझे का भरोसा कर सकें. कुछ तो था उसकी आंखों में जो उसकी कहानी सुनना उस वक्‍त इतना जरूरी लगा था.

उसने जो बताया वो कुछ यूं था. उसने मुश्किल से 10 वाक्‍यों में कहा था. मैं बहुत सारे वाक्‍यों में सुनाऊंगी.
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हिरोशिमा परमाणु हमला
हिरोशिमा परमाणु हमला


जिस रात हिरोशिमा पर बम गिरा, नानी घर पर अकेली थीं और उसकी मां नानी के पेट में थी. वो जगह हिरोशिमा शहर से बस इतनी दूरी पर थी कि बस से आधे घंटे में पहुंचा जा सकता था. रात के करीब आठ, सवा आठ बजे होंगे, जब बहुत जोर के धमाके की आवाज आई. युद्ध का समय था. पूरा देश, पूरी दुनिया मानो युद्ध में ही डूबी थी. लोग बात करते तो युद्ध के बारे में, स्‍कूल में होमवर्क मिलता तो युद्ध के बारे में, देश की आधी से ज्‍यादा आबादी कुछ काम भी कर रही थी तो उसका सीधा या टेढ़ा रिश्‍ता युद्ध से ही था. बम गिरना लोगों के लिए रोज की बात हो गई थी. आए दिन गिरते ही रहते थे. कभी किसी की छत टूटती, कभी किसी का पैर. लेकिन उस दिन जो गिरा, वो रोज वाला बम नहीं था. वो कुछ अलग था. उसकी आवाज, उसके गिरने के बाद पसरा सन्‍नाटा और फिर धीरे-धीरे उठती और धीरे-धीरे तीखी होती जाती आवाज. वो सब ऐसा था, जो पहले कभी नहीं हुआ था.

मुख्‍य शहर से बिलकुल सटी उस छोटी सी जगह पर घर तो नहीं गिरे थे. कुछ देर तो ऐसा लगा कि वो लोग बिलकुल सुरक्षित हैं. वहां कुछ नहीं हुआ. वो आवाज, सन्‍नाटा और वो चीख सब कहीं दूर से आ रही थी. लोग तमाशा देखने सड़कों पर निकल आए थे. उसकी नानी भी. रात बीत गई. कुछ नहीं हुआ. लेकिन तब तक ये खबर फैल चुकी थी कि शहर पर परमाणु हमला हो गया है. लोग जापानी में जिसे पिकादोन बोल रहे थे. रात बीती और फिर जो सुबह आई, वो बिलकुल नया उजाला लेकर नहीं आई थी. वो अपने साथ एक ऐसा धुंआ लेकर आई थी, जो धीरे-धीरे कर ऐसे लोगों के कलेजे में उतर रहा था, जिसका उन्‍हें उस वक्‍त एहसास तक नहीं था. वो रोज की हवा समझकर परमाणु हमले के बाद उठे जहरीले धुएं वाली हवा को लीले जा रहे थे.

सबकुछ धीरे-धीरे हुआ. धीरे-धीरे सांस भारी हुई, धीरे-धीरे सांस आनी बंद हुई, धीरे-धीरे आंखों के सामने अंधेरा छाया और धीरे-धीरे देह पर फफोले उभरे. धीरे-धीरे औरतों ने जहर पिया और धीरे-धीरे पेट के बच्‍चे का हिलना कम हो गया.

हिरोशिमा परमाणु हमले पर बनी एक फिल्‍म का दृश्‍य
हिरोशिमा परमाणु हमले पर बनी एक फिल्‍म का दृश्‍य


उस जापानी लड़के ने बताया था कि उसकी मां का जन्‍म परमाणु हमले के ढ़ाई महीने बाद हुआ था. लेकिन वो सुन-बोल नहीं सकती थीं. नानी को यकीन था कि ये उस काले बम और उसके बाद फैले धुएं का असर था. नानी पूरी जिंदगी होश और बेहोशी में उस काली रात का जिक्र करती रहीं. जब उस लड़के ने कहा कि वो नींद में भी बोलती थीं तो मुझे मार्खेज की कहानी ‘इन्‍नोसेंट इरेंड्रा’ की वो बूढ़ी औरत याद आई, जो अपने बीते सुख और वैभव की कहानियां सिर्फ नींद में सुना सकती थी.

नानी बम गिरने के वक्‍त बमुश्किल 20 साल की रही होंगी, लेकिन उसके बाद वो कभी पेट से नहीं हुईं. जब से उसने होश संभाला था, नानी को बिस्‍तर पर पाया और गूंगी-बहरी मां को उनकी तीमारदारी करते हुए. उस जहरीले धुंए का असर ऐसा था कि नानी वक्‍त से पहले ही बूढ़ी हो गई थी. उस लड़के ने अपने पिता का कोई जिक्र नहीं किया था. मेरे पूछने पर सिर्फ इतना ही कहा कि वो हमारे साथ नहीं रहते.

बस इतनी सी थी उसकी कहानी. बीमार नानी, जो तब तक मर चुकी थीं, गूंगी-बहरी मां और वो. 2015 में वो अपनी 70 साल की मां के साथ हिरोशिमा में रहता था और वीडियो गेम्‍स बनाने वाली किसी सॉफ्टवेअर कंपनी में काम करता था. वो अपने देश से इतनी दूर इंडिया घूमने के इरादे से बिलकुल नहीं आया था. क्‍योंकि “डू यू लव टू ट्रैवल?” के जवाब में उसने कहा था, “नो.”

35 साल का ये लड़का, जिसे घूमना पसंद नहीं था. जिसने शादी नहीं की थी और जिसकी कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं थी. जिसने 6 अगस्‍त की रात हुई उस काली बारिश को कभी अपनी आंखों से नहीं देखा था. जो 1945 की उस अंधेरी रात के बहुत-बहुत साल बाद पैदा हुआ था. इतने साल बाद कि तब तक दुनिया बदल चुकी थी, युद्ध खत्‍म हो चुका था. हिरोशिमा न सिर्फ तेजी से बढ़ता, बल्कि दौड़ता शहर था. गूगल पर हिरोशिमा सिटी लिखने पर शहर की चमकीली खुशहाल तस्‍वीरें दिखाई देती थीं. पूरी दुनिया उस परमाणु बम के लिए शर्मिंदा थी और बार-बार माफी मांग चुकी थी. अमेरिका भी कुछ कम माफीज़दा नहीं था. उसने जापान के साथ करार किया था कि जापान की अपनी कोई आर्मी नहीं होगी. संकट के पलों में अमेरिका उस देश की रक्षा के लिए खड़ा होगा, जिसे उसने एक बार परमाणु बम से जमींदोज कर दिया था.

इतनी माफियां थीं कि होना तो ये चाहिए था कि वो दुख पर भारी पड़ जातीं. लेकिन दर्द की प्रतिध्‍वनि तो पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई देती है न.

उस दिन महज दस वाक्‍यों में उसने जिस तकलीफ की कहानी सुनाई थी, उसकी प्रतिध्‍वनि उस शहर, उस देश के हजारों परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई दे रही है.

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First published: August 6, 2019, 11:42 AM IST
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