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नेकी कर गटर में डाल

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Updated: November 19, 2019, 1:24 PM IST
नेकी कर गटर में डाल
वर्ल्ड टॉयलेट डे पर पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट

World Toilet Day: विश्व शौचालय दिवस पर पढ़ें ये विस्तृत रिपोर्ट....

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  • Last Updated: November 19, 2019, 1:24 PM IST
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(पंकज रामेन्दु)

आर्टिकल 15 फिल्म का एक दृश्य है. जब एक दलित नेता के कहने पर सारे सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले जाते हैं. पूरे शहर में हर जगह कूड़े-करकट का ढेर लग गया है. नालियां चोक हो चुकी है. नालियों से गंदगी उसकी सामाजिक व्यवस्था की तरह रिस रही होती है जिसने सफाई करने वालों को अछूत बना दिया है. ये वही व्यवस्था है जो उन लोगों से घिन करने को कहती है जिनकी वजह से वो अपनी गंदगी, अपनी घिन को नाली में बहा कर सुख पा लेते हैं. फिल्म में आगे जब ईमानदार पुलिस ऑफिसर दलित नेता को ये समझाने में कामयाब हो जाता है कि वो इस सड़ी गली व्यवस्था का समर्थक नहीं है और वो दिल से कुछ करना चाहता है. तो दलित नेता उसे मदद का भरोसा देता है. अगले दृश्य में एक गंदे पानी से भरे हुए गटर से एक आदमी बाहर निकलता है, उसके हाथ में एक बाल्टी है जिसमें शहर की सारी गंदगी भरी पड़ी है. वो अपने मुंह पर जमे हुए कीचड को साफ करता है और उसके सामने बाल्टी से वो गंदगी गिर रही होती है जिसने उसे समाज में अछूत बना दिया. ये वही गंदगी है जिसने उसे सम्मान हासिल नहीं होने दिया जिसका वो हकदार है. वो आदमी फिर अपनी नाक को एक अंगूठे और उंगली के सहारे बंद करके अपनी सांस रोकता है और फिर उस गटर में चला जाता है. फिल्म में उस सफाईकर्मी को आप एक नायक की तरह देख सकते हैं जो बाल्टी भर के समाज की गंदगी को जाम हुई नालियों से निकालता है और फिर वापस उस गटर में खो जाता है - गोया नेकी कर गटर में डाल.

सरकार कहती हैं कि वो अपना काम कर रही है. न्यायालय अपनी संवेदनाएं ज़ाहिर कर रहा है. कई गैर सरकार संगठन अपने काम में लगे हुए हैं. तमाम तरह की प्रक्रियाएं भी चल रही है. इसी बीच एक सफाईकर्मी अपनी व्यथा बताते हुए कहते हैं कि ‘लोगों से सम्मान तो कभी मिला नहीं, हां गैस चैंबर में घुसने के लिए अक्सर शराब का सहारा लेना पड़ता है, लोग हमारे मुंह से आती बदबू से नाक भौं सिकोड़ लेते हैं, हमारे पास तो कोई आना ही नहीं चाहते हैं, और हालत ये है कि अब तो दाल हो या कोई भी पीली चीज़ मुझे परेशान कर देती है.’

विश्व शौचालय दिवस
विश्व शौचालय दिवस


विश्व शौचालय दिवस - वर्ल्ड टॉयलेट डे आप सभी को मुबारक हो. इस बात को पढ़कर किसी भी तरह के भाव अपने अंदर लाने से पहले आइये आपको एक रिपोर्ट से वाबस्ता करवा देते हैं. ये रिपोर्ट इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइज़ेशन, वॉटरएड, वर्ल्ड बैंक और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन ने तैयार की है जो सफाईकर्मियों से जुड़े अमानवीय हालात को दर्शाती है.

ये वो सफाईकर्मी हैं जो स्वच्छता की उस लंबी कड़ी में काम करते हैं जो हमारे शौचालय जाने से शुरू होकर अवशेष के निपटान और उसके पुन:प्रयोग पर जाकर खत्म होती है. समाज के इतने अहम काम का हिस्सा होने के बावजूद इन सफाईकर्मियों और इनके काम को अनदेखा और गैर जरूरी समझा जाता रहा है. इनके काम में सिर्फ शौचालय और सार्वजनिक जगहों को साफ करना ही नहीं, अवशेष को अलग-अलग करना, टॉयलेट के गड्ढों और सेप्टिक टैंक को खाली करना, नाले और गटर का रख-रखाव, पंपिंग स्टेशन और ट्रीटमेंट प्लांट का संचालन शामिल है.

विश्व शौचालय दिवस
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2018 में डैलबर्ग एसोसिएट्स 1 के किए गए शोध के मुताबिक भारत के विभिन्न शहरी इलाकों में 50 लाख सफाईकर्मी काम करते हैं. इन्हें स्वच्छता मूल्य श्रंखला में मोटे तौर पर नौ श्रेणियों में बांटा गया है जिसमें नाले की सफाई, लैट्रीन सफाई, मैला ढोना, रेलवे की सफाई, वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में काम करना, सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालय सफाई, स्कूल के शौचालय की सफाई, झाड़ू लगाना तथा घरेलू काम शामिल है.

ये वो लोग हैं जो मानव अवशेष के सीधे संपर्क में आते हैं. सबसे खास बात हैं कि इसमें से अधिकांश ये काम बगैर किसी सुरक्षा तंत्र के करते है जिसकी वजह से खतरनाक गैस जैसे अमोनिया, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाय आक्साइड के ये सीधे संपर्क में आते हैं जो कई भयानक बीमारियों का कारण बन जाती है. बीमारियों का ज़िक्र है तो ये भी जानना ज़रूरी है कि ज्यादातर सफाईकर्मी ठेके पर या अस्थाई नौकरी पर होते है जिसकी वजह से इन्हें किसी तरह के स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी नहीं मिल पाते हैं. एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर पांचवे दिन तीन सफाइकर्मियों की मौत हो जाती है और जो लोग बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं उनकी संख्या का कोई अनुमान ही नहीं है.

मैला ढोना प्रथा जो खत्म हो कर भी नहीं हुई:

सफाई के काम के कई प्रकार में सबसे बदतर काम है मैला ढोना, ये काम अक्सर महिलाओं को करना होता है. ये काम करने वाली महिलाएं सीधे मानव मल के संपर्क में आती है और भारत के जिस क्षेत्र में वो ये काम करने को मजबूर है वहां उनके लिए सुरक्षा तंत्र की बात सोचना ही बेमानी है. इस अमानवीय काम को रोकने के कई तरह के प्रयास किये गए जिसके तहत ही मैला ढोने के काम को लंबे समय से नागरिक समाज में अपराध के साथ एक अमानवीय प्रथा के तौर पर चिन्हित किया गया है. महात्मा गांधी ने 1917 में पूरा जोर देकर कहा था कि साबरमती आश्रम में रहने वाले लोग अपने शौचालय को खुद ही साफ करेंगे. गौरतलब है कि आश्रम की स्थापना गांधीजी ने की थी और वो उसे कम्यून की तरह चलाते थे.

विश्व शौचालय दिवस
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महाराष्ट्र हरिजन सेवक संघ ने 1948 में मैला ढोने की प्रथा का विरोध किया था और उसने इसको ख़त्म करने की मांग की थी. ब्रेव-कमेटी ने 1949 में सफाई कर्मचारियों के काम करने की स्थितियों में सुधार के लिए बिंदुवार सुझाव दिए थे. मैला ढोने के हालात की जांच के लिए बनी समिति ने 1957 में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का सुझाव दिया था. राष्ट्रीय मजदूर आयोग ने 1968 में ‘सफाईकर्मियों और मैला ढोने वालों’ के काम करने की स्थितियों के अध्ययन के लिए एक कमेटी का गठन किया था. इन सभी समितियों ने मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और सफाईकर्मियों के पुनर्वास का सुझाव दिया था. इन समितियों के कुछ सुझावों को स्वीकार करने के साथ देश ने महिला धोने का काम और शुष्क शौचालय निर्माण रोकथाम कानून 1993 कानून बनाया जो (क) मैला ढोने वालों के काम और उचित तरीके से ड्रेनेज चैनल से जुड़ने पर शुष्क शौचालय के निर्माण पर प्रतिबंध लगाता है. (ख) इस कानून के उल्लंघन पर किसी शख्स को एक साल तक की सजा और दो हजार रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है. 2013 में 1993 के कानून को बदल कर इसका विस्तार किया गया और इसमें मैला ढोने की परिभाषा में कुछ बातों को और शामिल किया गया जिसमें सफाई से जुड़े खतरनाक काम को भी जोड़ दिया गया और ऐसे लोग जो इस तरह के काम में सम्मिलित है उनकी पहचान करने की ज़िम्मेदारी राज्य को सौंपी गयी. एक साल बाद ही 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में मैला ढोने को अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों का उल्लंघन बताया और इस कानून को और कड़ा करने की सलाह दी. दुर्भाग्य से मीडिया की नज़र में भी सफाईकर्मियों का दर्द तभी उभरता है जब किसी सफाइकर्मी की मौत हो जाती है.

सफाईकर्मियों से जुड़े आंकड़ों की कमी

सफाइकर्मियों से जुड़ी एक विडंबना यह है कि इनके रोज़मर्रा से जुड़े संघर्षों का कहीं कोई उल्लेख ही नहीं होता है. हमारे पास इनसे जुड़े विश्वसनीय आंकड़ों की बेहद कमी है. सरकार भी इस मामले में हाथ बांधी हुई और बेबस सी नज़र आती है. वर्तमान में सफाईकर्मियों से जुड़े जो आंकड़े मौजूद है वो भी विरोधाभास प्रदर्शित करते हैं. यहां तक कि सफाइकर्मियों की मौत से जुड़े आंकड़ों की सही तस्वीर भी सामने नहीं आ पाती है. जुलाई 2019 में सफाई कर्मचारियों से जुड़ी राष्ट्रीय समिति के खुलासे के मुताबिक 2019 में ही छह महीनों के अंदर करीब 50 सफाइकर्मियों की मौत हो चुकी है.

सामाजिक न्याय मंत्रालय के मुताबिक 2002-03 में देश भर में करीब 8 लाख सफाईकर्मचारी थे. 2011 की जनगणना के मुताबिक 7,94,390 ऐसे लेट्रीन पाए गये थे जहां सफाइकर्मियों को मैला साफ करने के लिए हाथ का इस्तेमाल करना पड़ता है.

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सामाजिक-आर्थिक जाति आधारित जनगणना 2011 के मुताबिक 1,82,505 परिवार मैला ढोने के काम में शामिल पाए गए थे. जुलाई 2019 में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने संसद में जानकारी देते हुए बताया कि सरकार ने 18 राज्यों के 170 जिलो में 54,130 मैला ढोने के कर्मचारियों की पहचान की थी.

वॉटरएड इंडिया और दूसरे संगठनों के साझा प्रयासों से तैयार की गई इसी रिपोर्ट के मुताबिक-

4 राज्यों के 12 जिलों की 36 स्थानों पर 2,505 शुष्क शौचालय पाए गए और ये हाल तब है जब देश में चारों तरफ स्वच्छ भारत अभियान जोर पर है. 1686 सफाईकर्मी विभिन्न तरह के मैला ढोने के काम में सम्मिलित पाए गए थे जिसमें 954 शुष्क शौचालय को साफ करने वाले थे और अहम बात ये है कि इसमें 90 फीसद से ज्यादा महिलाएं थी. 423 सेप्टिक टैंक सफाईकर्मी और 286 खुली हुई नालियां को साफ करने वाले थे. रिपोर्ट के मुताबिक मैला ढोने के काम में शामिल 26 फीसद लोग ही PEMSR 2013 कानून की जानकारी रखते थे और 20 फीसद को ही ये मालूम था कि ये काम करने पर कानूनी प्रतिबंध लगा हुए है.

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2018 में भारत सरकार ने सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए कुछ मानक प्रक्रिया तय की थी जिसके हिसाब से स्थानीय शहरी निकायों को सफाईकर्मियों की सहमति को शामिल करने के स्पष्ट आदेश दिए गए थे. 18 सितंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि दुनिया में कहीं भी इंसानों को मरने के लिए गैस चैंबर में नहीं भेजा जाता है. लेकिन हम जिस समाज और संस्कृति के अभिन्न अंग है वहां तो ऐसे आदेश, ऐसी बातें हम कमोड के एक बटन को दबा कर फ्लश करते रहे हैं. तो शौचालय दिवस, आदेश बहाने वालों को भी मुबारक!

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First published: November 19, 2019, 1:22 PM IST
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