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13 साल की ये लड़की कूड़ा बीनते हुए एक्ट्रेस बनने के सपने बुन रही है

13 साल की ये लड़की कूड़ा बीनते हुए एक्ट्रेस बनने के सपने बुन रही है

भरोसा 'हसीना' को विरासत में नहीं मिला. संघर्षों से उपजा है. वो एक ऐसे घर में रहती है, जिसकी दीवारें कहीं टिन की हैं तो कहीं बांस की टट्टियां लगी हैं. दरवाजे की जगह मोटा परदा झूलता है. कचरे के जिस ढेर से सामने से गुजरते हुए आप नाक पर रुमाल धर लेते हैं, हसीना उसी ढेर के बीच अपना पूरा दिन बिताती हैं.

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    भरोसा वो जमीन है, जिसकी नमी और खाद पाकर सपनों की खेती लहलहाती है. ये भरोसा 'हसीना' को विरासत में नहीं मिला. संघर्षों से उपजा है. वो एक ऐसे घर में रहती है, जिसकी दीवारें कहीं टिन की हैं तो कहीं बांस की टट्टियां लगी हैं. दरवाजे की जगह मोटा परदा झूलता है.

    कचरे के जिस ढेर से सामने से गुजरते हुए आप नाक पर रुमाल धर लेते हैं, हसीना उसी ढेर के बीच अपना पूरा दिन बिताती हैं. ये तकलीफें हसीना के ख्वाबों पर स्याही नहीं उड़ेलतीं, बल्कि उसे और खुशरंग बना रही हैं. दिल्ली के मदनपुर खादर में रहने वाली हसीना ख़ातून 13 साल की हैं. वे कूड़ा बीनती हैं और बड़ी होकर एक्ट्रेस बनना चाहती हैं. मिलें, उनके सपनों से...



    " सुबह उठते ही जिस चीज पर सबसे पहले नजर जाती है, वो है कूड़ा. हमारे घर में चारों ओर कोई न कोई ऐसा सामान रहता है, जो ज्यादातर लोगों के लिए किसी काम का नहीं.

    पन्नियां...फटे हुए कुशन कवर...टूटी मेज़...पुराने बर्तन...आदि. इक्का-दुक्का चीजें ही मां-पापा ने खरीदी हैं, बाकी सारा सामान कूड़े के ढेर से ही मिला है. प्लास्टिक का एक कप मेरा फेवरेट है, जिसपर बार्बी बनी है. वो कप भी मुझे कूड़ा बीनते हुए ही मिला था. मैं उसी में चाय पीती हूं.

    पापा बताते हैं कि हमारा घर भी कूड़े के ढेर में मिले सामानों से मिलकर बना है. तब मां-पापा असम से नए-नए दिल्ली आए थे. पढ़े-लिखे नहीं थे, उन्हें कोई काम नहीं मिला. असम से आए दूसरे लोगों ने उन्हें अपने साथ कूड़ा बीनने के काम में लगा लिया. गांवघर की हरियाली और खुशबुओं को छोड़कर एकदम से दिन-रात कूड़े के ढेर में काम करना उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा, ये मैं उनके बातों से महसूस कर पाती हूं.

    कूड़े के ढेर में लोगों के फेंके हुए सामानों से उन्होंने घर बना लिया. उनके साथ-साथ मैं भी यही काम करती हूं. दोपहर में स्कूल भी जाती हूं.

    अपनी सहेलियों के साथ सुबह घर से निकलती हूं. गलियों से बाहर जहां कूड़े के ढेर होते हैं, हम वहां जाते और कूड़ा खंगालते हैं. अपने साथ बड़ी-बड़ी थैलियां लेकर जाते हैं, जिनमें सारा कूड़ा जमा कर घर लौट आते हैं. फिर खाना खाने के बाद घर पर ही इन सामानों की छंटनी होती है. मां, मैं और दो छोटे भाई घेरा बनाकर बैठ जाते हैं, फिर प्लास्टिक की बोतलें, दूध की थैलियां, लंबे बाल, सफेद पॉलीथिन- सबको अलग-अलग जमा करते हैं. यही सब बेचकर हमें पैसे मिलते हैं.

    कई बार घर में काम आने वाली चीजें भी मिल जाती हैं. जैसे फोटो फ्रेम या परदे. हमारे घर में दरवाजे की जगह कई सालों से कूड़े में मिला परदा ही लटका हुआ है. रात में पापा परदे के पास सोते हैं ताकि हमें डर न लगे.



    कूड़ा बीनना उतना भी खराब नहीं, जितना लोग इस काम को सोचते हैं. यही काम करते हुए मुझे अपने काम की कई चीजें मिल जाती हैं. जैसे बालों में पहनने वाली माला (टियारा). टीवी पर हीरोइनें इसे लगाती हैं. मैं रोज यही नीली माला पहनकर काम पर निकलती हूं. अपनी सहेलियों के बीच फिल्मों के डायलॉग बोलती हूं. घर पहुंचकर माला उतारकर मां के संदूक में रख देती हूं. बड़ी होकर जब मैं टीवी पर आउंगी तो अपने साथ ये माला लेकर जाउंगी. "

    मां का संदूक हसीना के लिए सुंदर चीजों का अभयारण्य है, जहां वे हमेशा सलामत रहेंगे. कूड़ा छांटते हुए वो अपने सपने भी मां से बांटती है ताकि उनका तिलिस्म कभी खत्म न हो.

    (फोटो एवं इनपुट: महेंद्र नाथ)

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