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नोबेल विजेता की ऐसी प्रेम कहानी जिसने करोड़ों बच्चों का जीवन संवार दिया

News18Hindi
Updated: February 14, 2020, 6:10 PM IST
नोबेल विजेता की ऐसी प्रेम कहानी जिसने करोड़ों बच्चों का जीवन संवार दिया
प्रेरणास्‍पद प्रेम कहानियों में से एक प्रेम कहानी नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी और उनकी धर्मपत्‍नी श्रीमती सुमेधा कैलाश की भी है.

कैलाश सत्यार्थी ने एक दिन सुमेधा जी को 04 पृष्‍ठों का एक प्रेम पत्र लिखा. इसमें उन्‍होंने विस्‍तार से अपने जीवन के लक्ष्‍यों और उद्देश्‍यों के बारे में बताया, 'आत्‍मनियंत्रण और धैर्य मेरी सुमेधा में इतना होना चाहिए कि लोग ईर्ष्‍या करने लगें.

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(पंकज चौधरी)


आज वेलेंटाइन डे (Valentine's Day) यानी प्रेम दिवस है. इस मौके पर एक से एक प्रेरणास्‍पद प्रेमकहानी याद आ रही है. ऐसी ही एक कहानी नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी (Kailash Satyarthi) और उनकी धर्मपत्‍नी श्रीमती सुमेधा कैलाश से भी जुड़ी है. यह हमारे रोम-रोम को पुलकित कर जाती है और एहसास कराती है कि काश सभी का प्रेम ऐसा ही होता. ऐसा प्रेम जो अपना सब कुछ समर्पण कर बदलाव को जन्म देता है. एक ऐसा बदलाव जो दुनिया के करोंड़ों बच्चों की दुनिया बदल देता है.


दोनों की मुलाकात दिल्‍ली में होती है
70 के दशक की बात है. कैलाश सत्यार्थी अपने गृह नगर मध्य प्रदेश के विदिशा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. वह छात्र राजनीति के साथ-साथ आर्य समाज से जुड़कर सामाजिक बदलाव में भी जुटे हुए थे. पढ़ाई के दौरान ही वह दिल्‍ली से निकलने वाली आर्य समाज की प्रसिद्ध पत्रिका 'जनज्ञान' में भी लिखा करते थे. व्‍यवस्‍था परिवर्तन में आर्य समाज की भूमिका पर पत्रिका में लिखा उनका एक लेख काफी चर्चित और विवादित हुआ था. इस बीच एक दिन वह दिल्ली आते हैं और पत्रिका के संपादक भारतेंद्रनाथ जी और उनकी प्रकाशक पत्‍नी पंडिता राकेशरानी से मिलने दफ्तर चले आते हैं, लेकिन ऑफिस में उनकी मुलाकात सुमेधा नाम की एक बेहद सुंदर लड़की से होती है, जो उस समय पत्रिका की सह-संपादिका थीं.

'जनज्ञान' नाम की एक पत्रिका दफ्तर में उनकी मुलाकात सुमेधा नाम की एक बेहद सुंदर लड़की से होती है.
'जनज्ञान' नाम की एक पत्रिका दफ्तर में उनकी मुलाकात सुमेधा नाम की एक बेहद सुंदर लड़की से होती है.


लेखक की व्यापक चर्चा की वजह से सुमेधा जी कैलाश सत्‍यार्थी के नाम से अवगत होते हुए भी उन्‍हें पहचानने से इंकार कर देती हैं, क्‍योंकि वह यह मानकर बैठी हुई थीं कि कैलाश सत्‍यार्थी नाम का व्‍यक्ति कोई 50-60 साल का परिपक्‍व और दार्शनिक व्यक्ति होगा. उन्‍हें 20-21 साल के छैल-छबीले रणबांकुरे में कैलाश सत्‍यार्थी में वह नहीं दिखा. सुमेधा जी सहित ऑफिस की सारी लड़कियां यह कह कर हंस पड़ीं, 'चले हैं महाशय, कैलाश सत्‍यार्थी बनने.' हालांकि संपादक भारतेंद्रनाथ ने ज्ञानवर्धक बातचीत में जान लिया कि यह नौजवान ही असली कैलाश सत्यार्थी है. वह रात को उन्हें अपने घर ले जाते हैं. सत्यार्थी जी को ऐसे देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं. घर के सभी सदस्‍यों से बातचीत होती है लेकिन सुमेधा जी और कैलाश जी का एक दूसरे के प्रति बर्ताव संकोच भरा ही रहता है. सुबह में सुमेधा जी चाय बनाकर लाई, लेकिन यह पूछना नहीं भूलती हैं कि 'चाय में कितनी चीनी डालूं?' कैलाश जी का जवाब होता है, 'आप चाहे जितनी डाल दें, या न भी डालें, चाय तो मीठी हो ही जाएगी.' सुमेधा जी शरमा जाती हैं और मुस्‍कुराती हुई लौटती हैं.

जब सुमेधा जी पूछतीं, 'चाय में कितनी चीनी डालूं?' कैलाश जी का जवाब होता, 'चाहे जितनी डाल दें, या न डालें, चाय मीठी हो ही जाएगी.'
जब सुमेधा जी पूछतीं, 'चाय में कितनी चीनी डालूं?' कैलाश जी का जवाब होता, 'चाहे जितनी डाल दें, या न डालें, चाय मीठी हो ही जाएगी.'
यहीं से कैलाश जी और सुमेधा जी की प्रेम कहानी शुरू हो चुकी होती है. कैलाश जी को इसका सुखद एहसास विदिशा लौटने पर होता है, जो दिल्‍ली से सैकड़ों मील की दूरी पर है. नजदीक में रहकर प्रेम को हम उतना नहीं जान पाते, जितना दूर रहकर जान लेते हैं. कैलाश जी की वे स्‍मृतियां ताजा होने लगती हैं, जिनमें वे 'जनज्ञान' में छपी सुमेधा जी की तस्‍वीर को देखकर सोचने लगते थे कि इस लड़की में कोई खास बात है, जो औरों में नहीं है. कैलाश जी और सुमेधा जी दोनों उस पहली मुलाकात में ही एक दूसरे को पसंद करने लगे थे, लेकिन अपने-अपने संस्‍कारों या सामाजिक वर्जनाओं, बंदिशों की वजह से प्रेम का इजहार नहीं कर पाए थे. वक्‍त कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. एक साल के दौरान दोनों में न तो कोई चिट्ठी-पत्री हुई थी और न ही कोई संवाद. हां, मथुरा में एक मुलाकात दोनों के बीच जरूर हुई थी. तभी दोनों ने अकेले में घूमने-फिरने का मौका ढूंढ़ लिया था. कैलाश जी के बालसखा ओमप्रकाश जी दोनों के बीच मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाने का काम कर रहे थे. दोनों की प्रेम चर्चा सुमेधा जी के परिवार में होने लगती है. नौजवान कैलाश जी की शख्सियत से भारतेंद्रनाथ जी पहले ही प्रभावित थे.

कैलाश जी सुमेधा जी की तस्‍वीर देखकर सोचने लगते थे कि इस लड़की में कोई खास बात है, जो औरों में नहीं है.
कैलाश जी सुमेधा जी की तस्‍वीर देखकर सोचने लगते थे कि इस लड़की में कोई खास बात है, जो औरों में नहीं है.


प्रेम की डोर से शादी के बंधन तक
सुमेधा जी के माता-पिता दोनों की शादी के सिलसिले में कैलाश जी के घर विदिशा पहुंचते हैं. विदिशा में अपने प्रगतिशील विचारों और बदलाव की मुहिम की वजह से समाज के पुरातनपंथी लोग कैलाश सत्यार्थी को पंसद नहीं करते थे. उनकी इस छवि को निर्मित करने में दलितों के हाथ का बना खाना विशेष रूप से शामिल हो गया था. इस वजह से उन्हें जाति बाहर भी कर दिया गया था. ब्राहमणों के धर्मादेश को भी उन्‍होंने नहीं माना था. कॉलेज में छात्र राजनीति करते हुए उन्‍होंने खुलकर छात्राओं के अधिकारों और गरिमा की बात की थी. कैलाश जी की इस छवि ने परंपरावादियों को आपे से बाहर कर दिया था. दलितों के साथ भोजन, उनके घर यज्ञ आयोजन, हिंदी आंदोलन, सरकारी लाल बत्ती गाड़ियों के दुरुपयोग और शहर की सफाई के लिए कूड़ा यज्ञ आदि की वजह से शहरवासियों में वह लोकप्रिय हो चुके थे और उनकी छवि युवा विद्रोही की बन चुकी थी.

प्रगतिशील विचारों और बदलाव की मुहिम की वजह से समाज के पुरातनपंथी लोग कैलाश सत्यार्थी को पंसद नहीं करते थे.
प्रगतिशील विचारों और बदलाव की मुहिम की वजह से समाज के पुरातनपंथी लोग कैलाश सत्यार्थी को पंसद नहीं करते थे.


भारतेंद्रनाथ जी विदिशा में जिनके यहां ठहरे थे. वह कैलाश जी के घनघोर विरोधी थे. जब यह सूचना शहर के पुरातनपंथियों को मिली कि प्रसिद्ध आर्यसमाजी भारतेंद्रनाथ जी और उनकी पत्‍नी अपनी सुपुत्री की शादी कैलाश सत्‍यार्थी से तय करने के सिलसिले में शहर आए हुए हैं, तो उन लोगों ने षड्यंत्र रचा कि किसी भी कीमत पर यह शादी नहीं होने देनी है. उन लोगों ने सुमेधा जी के माता-पिता से मिलकर कैलाश जी की मुखालफत करनी शुरू कर दी. यहां तक कि उन लोगों ने कैलाश सत्‍यार्थी को एक आवारा और गुंडा लड़का बताते हुए कहा कि सुमेधा यदि उनकी बहन या बेटी होतीं, तो वे किसी भी कीमत पर कैलाश सत्‍यार्थी से शादी करके उनके भविष्‍य को दांव पर नहीं लगाते.

लाख दुश्‍वारियों के बावजूद कैलाश जी और सुमेधा जी का प्‍यार बेपनाह, बेइंतिहा और बेहिसाब बढ़ता गया.
लाख दुश्‍वारियों के बावजूद कैलाश जी और सुमेधा जी का प्‍यार बेपनाह, बेइंतिहा और बेहिसाब बढ़ता गया.


सुमेधा जी के माता-पिता इन झूठी बातों के बहकावे में आ गए और उन्‍होंने शादी के अपने प्रस्‍ताव से इंकार कर दिया, लेकिन सुमेधा जी अड़ी रहीं कि वह शादी तो कैलाश से ही करेंगी. दोनों की प्रेम की नैया जैसे-जैसे शादी की तरफ बढ़ती वह उसी हिसाब से हिचकोले भी खाती जाती. बात बन-बनकर बिगड़ जाती. आंधी-तूफान के सैलाब उमड़ पड़ते, लेकिन तूफान को भी पता नहीं था कि वह जिस सागर में आ रहा है, उसकी गहराई कितनी है. आंधी को भी पता नहीं था कि वह जिस आसमान पर अपने को उड़ाना चाहती है, उसकी ऊंचाई कितनी है. ऐसे में कैलाश जी और सुमेधा जी का प्‍यार बेपनाह, बेइंतिहा और बेहिसाब बढ़ता गया.

दोनों की प्रेम की नैया जैसे-जैसे शादी की तरफ बढ़ती वह उसी हिसाब से हिचकोले खाती. बात बन कर बिगड़ जाती.
दोनों की प्रेम की नैया जैसे-जैसे शादी की तरफ बढ़ती वह उसी हिसाब से हिचकोले खाती. बात बन कर बिगड़ जाती.


कैलाश सत्यार्थी ने एक दिन सुमेधा जी को 04 पृष्‍ठों का एक प्रेम पत्र लिखा. इसमें उन्‍होंने विस्‍तार से अपने जीवन के लक्ष्‍यों और उद्देश्‍यों के बारे में बताया. उन्‍होंने लिखा, 'आत्‍मनियंत्रण और धैर्य मेरी सुमेधा में इतना होना चाहिए कि लोग ईर्ष्‍या करने लगें. हम जैसे लोग जो संपूर्ण सामाजिक व्‍यवस्‍था और ढांचे में बदलाव के लिए संकल्‍पबद्ध हैं, जिनका जीवन निज की सीमाएं तोड़कर 'पर' की असीमितता से जुड़ा हो, उन्‍हें विपरीत और जोखिम भरी परिस्थितियों में भी संतुलित और संयमित रहने का स्‍वभाव बनाना चाहिए.' कैलाश जी ने अपने जीवन के उद्देश्य को इंगित करती हुई एक कविता भी इसी पत्र के माध्यम से सुमेधा जी को भेजी.

उजली इमारत के लाख दीये बेमानी,
चलो बनें एक दीया अंधियारी बस्ती का
बाहर के साथ-साथ अंतस् का तम मिटे
फर्क मिटे बूंद और सागर की हस्ती का

 आखिरकार वह दिन आया, जिसका दोनों को बेसब्री से इंतजार था. सुमेधा जी ने कैलाश जी को फोन कियाकि घर के लोगों ने इसी रविवार को शादी का दिन तय कर दिया है. पिताजी ने गुस्से में कह दिया है कि अगर उस दिन हमारी शादी नहीं होती है, तब फिर मेरी शादी किसी और लड़के से कर दी जाएगी. इसलिए आप बरात लेकर फौरन दिल्‍ली चले आइए. कैलाश जी के अस्तित्‍व के लिए यह सवाल था. उन्‍होंने भी जैसे-तैसे अपने परिवार को मनाया और कुछ मित्रों और परिवार के सदस्‍यों को लेकर शादी के लिए दिल्‍ली पहुंच गए. 08 अक्‍टूबर, 1977 की शाम को बड़ी सादगी से कैलाश जी और सुमेधा जी दाम्‍पत्‍य सूत्र में बंध गए.




कैलाश सत्यार्थी ने एक दिन सुमेधा जी को 04 पृष्‍ठों का एक प्रेम पत्र लिखा. इसमें उन्‍होंने विस्‍तार से अपने जीवन के लक्ष्‍यों और उद्देश्‍यों के बारे में बताया.
कैलाश सत्यार्थी ने एक दिन सुमेधा जी को 04 पृष्‍ठों का एक प्रेम पत्र लिखा. इसमें उन्‍होंने विस्‍तार से अपने जीवन के लक्ष्‍यों और उद्देश्‍यों के बारे में बताया.

बच्‍चों की आस कैलाश
विद्वानों का मानना है कि चुनौतियों और संघर्ष का अनुपात उनके ही जीवन में अधिक होता है, जिनसे प्रकृति बड़े लक्ष्‍य को साधने की अपेक्षा पाले रहती है. जितना बड़ा लक्ष्‍य होगा, उसके रास्‍ते उतने ही कंटकाकीर्ण होंगे. प्रकृति जांचना चाहती है कि हम उसकी अपेक्षा को पूरा करने के काबिल हैं कि नहीं. हम कह सकते हैं कि प्रकृति हमें आगे के लिए तैयार करती है. कैलाश जी और सुमेधा जी अंतत: प्रेम की जंग को जीतते हैं और कैलाश सत्‍यार्थी को दुनिया आज 'बच्‍चों की आस कैलाश' के नाम से पुकारती है. नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्मानित कैलाश सत्‍यार्थी ने जिस समय बाल अधिकारों की लड़ाई शुरू की थी, उस समय बाल अधिकारों की बात तो दूर इस मुद्दे के प्रति भी लोग अनभिज्ञ थे. हम कल्‍पना कर सकते हैं कि कितनी बड़ी लड़ाई वह लड़ते आ रहे हैं, लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि इस संघर्ष में कैलाश जी के साथ सुमेधा जी हमेशा चट्टान की तरह डटी रहीं. करोड़ों बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए भले ही उन्हें अभाव और गरीबी में रहना पड़ा हो या फिर उनको गुलामी से मुक्त कराने के लिए अपने गहने बेचने पड़े हों. आज उनके संबल की वजह से ही दुनिया के करोड़ों बच्चे गुलामी से मुक्त होकर नया जीवन जी रहे हैं.


                          (लेखक हिंदी के युवा कवि और पत्रकार)


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First published: February 14, 2020, 5:17 PM IST
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