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लाइफ़ कोच: भूल जाना पढ़ने वालों के लिए किसी नेमत से कम नहीं...

News18Hindi
Updated: January 30, 2018, 5:11 PM IST
लाइफ़ कोच: भूल जाना पढ़ने वालों के लिए किसी नेमत से कम नहीं...
दोबारा पढ़ते हुए हम किताब को किसी अनबनी तस्वीर की तरह थामे रहते हैं

हम कोई भी किताब कभी पहली दफा नहीं पढ़ते. पहली बार पढ़ते हुए हमारी आंखें उससे शब्द-दर-शब्द, लाइन-दर-लाइन, पन्ना-दर-पन्ना गुजरती हैं. हमारे हाथ उसे उलटते-पलटते हैं. ये एक किस्म का शारीरिक श्रम है, जिसे करते हुए पढ़ने का सुख कहीं खोया रहता है. बाद में वही किताब दोबारा उठाई जाती है.

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  • Last Updated: January 30, 2018, 5:11 PM IST
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कोई भी किताब पढ़ी नहीं जाती, वो केवल दोहराई जाती है. पढ़ते हुए रंगीन कलम और ये डर लेकर न बैठें कि पढ़कर आप भूल जाएंगे. याद रहे तो बढ़िया, भूल जाएं तो उससे भी बढ़िया. आप वही किताब उतनी ही दिलचस्पी से दोबारा-तिबारा पढ़ सकेंगे.

उस किताब के हाशिए भी खाली नहीं थे. जितनी मेहनत लेखक ने किताब लिखने में थी, उससे कुछ कम मेहनत पढ़ने वाले ने नहीं की थी. जब किताब मेरे हाथ में आई तो पहले-पहल समझ नहीं आया कि कहां से शुरू करूं. पढ़ना शुरू किया. पहले एक पूरा पन्ना पढ़ती और फिर हाशिए में लिखी बातें. किताब जिन हाथों से गुजरकर आई थी, उसने पढ़ते हुए 'नोट्स' लिए थे. शायद उसे डर था कि पढ़ने के बाद वो भूल न जाए. ऐसा डर बहुतों को होता है, खासकर किसी दिलचस्प किताब से गुजरते वक्त.

हालांकि पढ़कर भूल जाना पढ़कर याद रखने से ज्यादा अच्छा है.

आप भी कईयों बार ऐसी किताब से गुजरे होंगे जो पहले से आखिरी पन्ने तक भरी हुई हो. कुछ छपे हुए शब्द तो कुछ लिखे गए शब्द. कई लोग पढ़ते हुए मार्कर लेकर बैठते हैं ताकि जो भी पसंद आए, उसे रंग-बिरंगा कर दें. ये उनका टोटका है, न भूलने का. इसमें कोई दो राय नहीं कि किताब उलटते-पलटते ऐसी चीजें आसानी से नजर आ जाती हैं. इसके साथ ही ये भी सच है कि शब्दों से ठसाठस किताब दोबारा उसी चाव से नहीं पढ़ी जा सकती इसलिए अगर परीक्षा न देनी हो तो पढ़े हुए को भूल जाने की कोशिश करें.



ख्यात लेखक पॉल ग्राहम का भी मानना है कि भूल जाना पढ़ने वालों के लिए नेमत है.

हम किताबों से किसी जगह का नाम, दिन या घटनाओं के बारे में नहीं जानते, बल्कि इससे हमारी सोच में बदलाव होता है. पढ़ना दुनिया के बारे में हमारे नजरिए में बदलाव लाता है. पढ़ा हुआ पसंद आने पर वो हमारे मस्तिष्क में कई बदलाव करता है और हमें एक नया इंसान बनाता है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस बदलाव का स्रोत क्या है.रशियन-अमेरिकन उपन्यासकार ब्लादिमीर सीरीन ने कहा कि हम कोई भी किताब कभी पहली दफा नहीं पढ़ते.

पहली बार पढ़ते हुए हमारी आंखें उससे शब्द-दर-शब्द, लाइन-दर-लाइन, पन्ना-दर-पन्ना गुजरती हैं. हमारे हाथ उसे उलटते-पलटते हैं. ये एक किस्म का शारीरिक श्रम है, जिसे करते हुए पढ़ने का सुख कहीं खोया रहता है. बाद में वही किताब दोबारा उठाई जाती है. उलटी-पलटी जाती है. कुछ शब्द कौंधते हैं. कुछ अक्स उभरते हैं. अबकी वही किताब हमसे शारीरिक मेहनत नहीं मांगती, वो हमें मांगती है. दोबारा पढ़ते हुए हम उस किताब को किसी अनबनी तस्वीर की तरह थामे रहते हैं.

अपने दोबारा पढ़े जाने में वही किताब एक तस्वीर बन जाती है या फिर कोई नाद, तबले से उंगलियां हटने के बाद भी देर तक जिसका कंपन यहां-वहां थिरकता रहे.

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First published: January 30, 2018, 5:11 PM IST
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