फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था, पढ़ें अदीम हाशमी की शायरी में दर्द और मोहब्बत के एहसास

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था, पढ़ें अदीम हाशमी की शायरी में दर्द और मोहब्बत के एहसास
अदीम हाशमी की शायरी पढ़ें

अदीम हाशमी की शायरी (Adeem Hashmi Shayari): इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा, मैं नहीं तो कोई तुझ को दूसरा मिल जाएगा...

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  • Last Updated: August 30, 2020, 7:31 AM IST
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अदीम हाशमी की शायरी (Adeem Hashmi Shayari): अदीम हाशमी का नाम 'शेर' और शायरी की दुनिया में बड़े अदब से लिया जाता है. अदीम हाशमी ने अपने शायरी में मोहब्बत की कसक, उलझन और जुदाई को बड़ी खूबसूरती से लफ्जों से पिरोया. अदीम हाशमी पाकिस्तान के लाहौर से ताल्लुक रखते थे. आज हम आपके लिए कविताकोश के साभार से लेकर आए हैं अदीम हाशमी की चुनिंदा शायरी....

1.बस कोई ऐसी कमी सारे सफ़र में रह गई
जैसे कोई चीज़ चलते वक़्त घर में रह गई

कौन ये चलता है मेरे साथ बे-जिस्म-ओ-सदा
चाप ये किस की मेरी हर रह-गुज़र में रह गई



गूँजते रहते हैं तनहाई में भी दीवार ओ दर
क्या सदा उस ने मुझे दी थी के घर में रह गई

और तो मौसम गुज़र कर जा चुका वादी के पार
बस ज़रा सी बर्फ़ हर सूखे शजर में रह गई

रात दरिया में फिर इक शोला सा चकराता रहा
फिर कोई जलती हुई कश्ती भँवर में रह गई

रात भर होता रहा है किन ख़ज़ानों का नुज़ूल
मोतियों की सी झलक हर बर्ग-ए-तर में रह गई

लौट कर आए न क्यूँ जाते हुए लम्हे 'अदीम'
क्या कमी मेरी सदा-ए-बे-असर में रह गई.

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2. तेरे लिए चलते थे हम तेरे लिए ठहर गए
तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए

वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया
दिल में तेरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए

होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का
सहरा उमड़ उमड़ पड़े दरिया बिफर बिफर गए

वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे
वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए

कोई किनार-ए-आब-जू बैठा हुआ है सर-निगूँ
कश्ती किधर चली गई जाने किधर भँवर गए

आज भी इंतिज़ार का वक़्त हुनूत हो गया
ऐसा लगा के हश्र तक सारे ही पल ठहर गए

बारिश-ए-वस्ल वो हुई सारा ग़ुबार धुल गया
वो भी निखर निखर गया हम भी निखर निखर गए

आब मुहीत-ए-इश्क़ का बहर अजीब बहर है
तेरे तो ग़र्क़ हो गए डूबे तो पार कर गए

इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए
वो भी ‘अदीम’ डर गया हम भी ‘अदीम’ डर गए

उस के सुलूक पर 'अदीम' अपनी हयात ओ मौत है
वो जो मिला तो जी उठे वो न मिला तो मर गए.

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3. इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा
मैं नहीं तो कोई तुझ को दूसरा मिल जाएगा

भागता हूँ हर तरफ़ ऐसे हवा के साथ साथ
जिस तरह सच मुच मुझे उस का पता मिल जाएगा

किस तरह रोकोगे अश्कों को पस-ए-दीवार-ए-चश्म
ये तो पानी है इसे तो रास्ता मिल जाएगा

एक दिन तो ख़त्म होगी लफ़्ज़ ओ मानी की तलाश
एक दिन तो मुझ को मेरा मुद्दआ मिल जाएगा

छोड़ ख़ाली घर को आ बाहर चलें घर से 'अदीम'
कुछ नहीं तो कोई चेहरा चाँद सा मिल जाएगा.



4.फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था
सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था

वो के ख़ुश-बू की तरह फैला था चार सू
मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था

रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही
झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था

मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा
सारी दुनिया में मगर कोई तेरे जैसा न था

ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं
आँख धुँधलाई हुई थी शहर धुंदलाया न था

सैंकड़ों तूफ़ान लफ़्ज़ों में दबे थे ज़ेर-ए-लब
एक पत्थर था ख़ेमोशी का के जो हटता न था

याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी 'अदीम'
भूल जाने के सिवा अब कोई भे चारा न था

मस्लेहत ने अजनबी हम को बनाया था 'अदीम'
वरना कब इक दूसरे को हम ने पहचाना न था
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