कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके, पढ़ें अख़्तर नाज़्मी की शायरी

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके, पढ़ें अख़्तर नाज़्मी की शायरी
अख़्तर नाज़्मी की शायरी

अख़्तर नाज़्मी की शायरी (Akhtar Nazmi Shayari And Gazals): दिल बेचारा सीधा सादा, ख़ुद रूठे ख़ुद मान भी जाए...

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अख़्तर नाज़्मी की शायरी (Akhtar Nazmi Shayari And Gazals): अख़्तर नाज़्मी उर्दू के जानेमाने शायर हैं, जिनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. अख़्तर नाज़्मी का वास्तविक नाम सय्यद अख़्तर जमील है. उनका ताल्लुक ग्वालियर से है. अख़्तर नाज़्मी ने कई शेर और ग़ज़लें ऐसी लिखी जिन्हें लोगों ने जिंदगी से जोड़कर महसूस किया. इस वजह से इनकी रचनाओं को काफी पसंद किया गया. इनकी प्रमुख कृति है 'सवा नेज़े पे सूरज' . आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लाए हैं अख़्तर नाज़्मी की शायरी...

लिखा है..... मुझको भी लिखना पड़ा है...

लिखा है..... मुझको भी लिखना पड़ा है
जहाँ से हाशिया छोड़ा गया है
अगर मानूस है तुम से परिंदा


तो फिर उड़ने को पर क्यूँ तौलता है

कहीं कुछ है... कहीं कुछ है... कहीं कुछ
मेरा सामन सब बिखरा हुआ है

मैं जा बैठूँ किसी बरगद के नीचे
सुकूँ का बस यही एक रास्ता है

क़यामत देखिए मेरी नज़र से
सवा नेज़े पे सूरज आ गया है

शजर जाने कहाँ जाकर लगेगा
जिसे दरिया बहा कर ले गया है

अभी तो घर नहीं छोड़ा है मैंने
ये किसका नाम तख़्ती पर लिखा है

बहुत रोका है "नाज़्मी" पत्थरों ने
मगर पानी को रास्ता मिल गया है.

सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है...



सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है
ये ज़मी दूर तक हमारी है

मैं बहुत कम किसी से मिलता हूँ
जिससे यारी है उससे यारी है

हम जिसे जी रहे हैं वो लम्हा
हर गुज़िश्ता सदी पे भारी है

मैं तो अब उससे दूर हूँ शायद
जिस इमारत पे संगबारी है

नाव काग़ज़ की छोड़ दी मैंने
अब समन्दर की ज़िम्मेदारी है

फ़लसफ़ा है हयात का मुश्किल
वैसे मज़मून इख्तियारी है

रेत के घर तो बह गए नज़मी
बारिशों का खुलूस जारी है.



जो भी मिल जाता है घर बार को दे देता हूँ...

जो भी मिल जाता है घर बार को दे देता हूँ.
या किसी और तलबगार को दे देता हूँ.

धूप को दे देता हूँ तन अपना झुलसने के लिये
और साया किसी दीवार को दे देता हूँ.

जो दुआ अपने लिये मांगनी होती है मुझे
वो दुआ भी किसी ग़मख़ार को दे देता हूँ.

मुतमइन अब भी अगर कोई नहीं है, न सही
हक़ तो मैं पहले ही हक़दार को दे देता हूँ.

जब भी लिखता हूँ मैं अफ़साना यही होता है
अपना सब कुछ किसी किरदार को दे देता हूँ.

ख़ुद को कर देता हूँ कागज़ के हवाले अक्सर
अपना चेहरा कभी अख़बार को देता हूँ .

मेरी दुकान की चीजें नहीं बिकती नज़्मी
इतनी तफ़सील ख़रीदार को दे देता हूँ.

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके....

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके
वो ख़त भी मगर मैंने जला कर नहीं फेंके

ठहरे हुए पानी ने इशारा तो किया था
कुछ सोच के खुद मैंने ही पत्थर नहीं फेंके

इक तंज़ है कलियों का तबस्सुम भी मगर क्यों
मैंने तो कभी फूल मसल कर नहीं फेंके

वैसे तो इरादा नहीं तौबा शिकनी का
लेकिन अभी टूटे हुए साग़र नहीं फेंके

क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े
घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके

दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी
लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके.

तर्क-ए-वफ़ा की बात कहें क्या...

तर्क-ए-वफ़ा की बात कहें क्या

दिल में हो तो लब तक आए

दिल बेचारा सीधा सादा

ख़ुद रूठे ख़ुद मान भी जाए

चलते रहिए मंज़िल मंज़िल

इस आँचल के साए साए

दूर नहीं था शहर-ए-तमन्ना

आप ही मेरे साथ न आए

आज का दिन भी याद रहेगा

आज वो मुझ को याद न आए .
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