'तड़पूंगा हिज्र-ए-यार में है रात चौदहवीं', पढ़ें 'अमानत' लखनवी का दर्द से लबरेज़ कलाम

'तड़पूंगा हिज्र-ए-यार में है रात चौदहवीं', पढ़ें 'अमानत' लखनवी का दर्द से लबरेज़ कलाम
'अमानत' लखनवी का कलाम...

'अमानत' लखनवी (Amanat Lakhnavi) उर्दू के अहम शायर के तौर पर जाने जाते हैं. उनका असल नाम आग़ा हसन (Agha Hasan) था...

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'अमानत' लखनवी (Amanat Lakhnavi) उर्दू के अहम शायर के तौर पर जाने जाते हैं. उनका असल नाम आग़ा हसन (Agha Hasan) था, मगर 'अमानत' लखनवी के नाम से पहचाने गए. वह 1825 में लखनऊ (Lucknow) में पैदा हुए थे. महज पंद्रह साल की उम्र में उन्‍होंने शायरी (Shayari) करना शुरू कर दिया था. शुरू में वह सिर्फ़ नोहे और सलाम कहते थे, मगर बाद में ग़ज़ल भी कहने लगे. इसके अलावा उन्‍होंने मर्सिया भी लिखे. वैसे तो उनको ज्‍यादा शोहरत अपने नाटकों की वजह से मिली. मगर ग़ज़ल (Ghazal) के मैदान में भी उनको अहमियत हासिल है. आज हम 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं 'अमानत' लखनवी का दर्द से लबरेज़ कलाम लेकर, तो पढ़िए और लुत्‍फ़ उठाइए...



वतन याद आया...
रूह को राह-ए-अदम में मेरा तन याद आया



दश्त-ए-ग़ुर्बत में मुसाफ़िर को वतन याद आया
चुटकियां दिल में मेरे लेने लगा नाख़ुन-ए-इश्क़

गुल-बदन देख के उस गुल का बदन याद आया

वहम ही वहम में अपनी हुई औक़ात बसर

कमर-ए-यार को भूले तो दहन याद आया

बर्ग-ए-गुल देख के आंखों में तेरे फिर गए लब

ग़ुंचा चटका तो मुझे लुत्फ़-ए-सुख़न याद आया

दर-ब-दर फिर के दिला घर की हमें क़द्र हुई

राह-ए-ग़ुर्बत में जो भूले तो वतन याद आया

आह क्‍यों खेंच के आंखों में भर आए आंसू

क्या क़फ़स में तुझे ऐ मुर्ग़-ए-चमन याद आया

फिर 'अमानत' मेरा दिल भूल गया ऐश ओ तरब

फिर मुझे रौज़ा-ए-सुल्तान-ए-ज़मन याद आया
है रात चौदहवीं...
उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुतां से आज

नाज़िल हुई बला मेरे सर पर कहां से आज

तड़पूंगा हिज्र-ए-यार में है रात चौदहवीं

तन चांदनी में होगा मुक़ाबिल कतां से आज

दो-चार रश्क-ए-माह भी हमराह चाहिए

वादा है चांदनी में किसी मेहरबां से आज

हंगाम-ए-वस्ल रद्द-ओ-बदल मुझ से है अबस

निकलेगा कुछ न काम नहीं और हां से आज

क़ार-ए-बदन में रूह पुकारी ये वक़्त-ए-नज़ा

मुद्दत के बाद उठते हैं हम इस मकां से आज

खींची है चर्ख़ ने भी किसी मांग की शबीह

साबित हुई ये बात मुझे कहकशां से आज

अंधेर था निगाह-ए-'अमानत' में शाम सहर

तुम चांद की तरह निकल आए कहां से आज
सय्याद की सूरत...
दिखलाए ख़ुदा उस सितम-ईजाद की सूरत

इस्तादा हैं हम बाग़ में शमशाद की सूरत

याद आती है बुलबुल पे जो बेदाद की सूरत

रो देता हूं मैं देख के सय्याद की सूरत

आज़ाद तेरे ऐ गुल-ए-तर बाग़-ए-जहां में

बे-जाह-ओ-हशम शाद हैं शमशाद की सूरत

जो गेसू-ए-जानां में फंसा फिर न छुटा वो

हैं क़ैद में फिर ख़ूब है मीआद की सूरत

खींचेंगे मेरे आईना-रुख़्सार की तस्वीर

देखे तो कोई मानी-ओ-बहज़ाद की सूरत

गाली के सिवा हाथ भी चलता है अब उन का

हर रोज़ नई होती है बेदाद की सूरत

किस तरह 'अमानत' न रहूं ग़म से मैं दिल-गीर

आंखों में फिरा करती है उस्ताद की सूरत

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वो क़दम जब कि नाज़ से...
आग़ोश में जो जल्वागर इक नाज़नीं हुआ

अंगुश्तरी बना मेरा तन वो नगीं हुआ

रौनक़-फ़ज़ा लहद पे जो वो महजबीं हुआ

गुम्बद हमारी क़ब्र का चर्ख़-ए-बरीं हुआ

कंदा जहां में कोई न ऐसा नगीं हुआ

जैसा कि तेरा नाम मेरे दिल-नशीं हुआ

रौशन हुआ ये मुझ पे कि फ़ानूस में है शम्अ

हाथ उस का जल्वागर जो तह-ए-आस्तीं हुआ

रखता है ख़ाक पर वो क़दम जब कि नाज़ से

कहता है आसमान न क्यों मैं ज़मीं हुआ

रौशन शबाब में जो हुई शम-ए-रू-ए-यार

दूद-ए-चराग़ हुस्न-ए-ख़त-ए-अम्बरीं हुआ

या रब गिरा अदू पे 'अमानत' के तू वो बर्क़

दो टुकड़े जिस से शहपर-ए-रूहुल-अमीं हुआ
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