तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं, पढ़ें अमजद इस्लाम अमजद की शायरी

पढ़ें अमजद इस्लाम अमजद की शायरी
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अमजद इस्लाम अमजद की शायरी (Amjad Islam Amjad Shayari): हिज्र के दोराहे पर एक पल न ठहरा वो , रास्ते बदलने में देर कुछ तो लगती है...

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 6, 2020, 9:55 AM IST
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अमजद इस्लाम अमजद की शायरी (Amjad Islam Amjad Shayari): अमजद इस्लाम अमजद का नाम शेर और शायरी की दुनिया में बड़े अदब के साथ लिया जाता है. अमजद इस्लाम अमजद की लिखी हुई ग़ज़लें और शायरी पाकिस्तान के के कई सीरियल्स में भी ली गई हैं. अमजद इस्लाम अमजद ने इश्क, मुश्क और हिज्र के एहसासों को बड़ी नफासत के साथ शायरी और गजलों में पिरोया है. अमजद इस्लाम अमजद पाकिस्तान के पंजाब के एक जिले सियालकोट से तालुक रखते थे. आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लेकर आए हैं अमजद इस्लाम अमजद के चंद खूबसूरत अशरार...

1. कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा

वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा



वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा

मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तिरी आस तेरे गुमान में

सबा कह गई मिरे कान में मिरे साथ आ उसे भूल जा

किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बअ'द कुछ भी नहीं है कम

तुझे ज़िंदगी ने भुला दिया तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा

कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं

कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा

क्यूँ अटा हुआ है ग़ुबार में ग़म-ए-ज़िंदगी के फ़िशार में

वो जो दर्द था तिरे बख़्त में सो वो हो गया उसे भूल जा

तुझे चाँद बन के मिला था जो तिरे साहिलों पे खिला था जो

वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा.

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2. दूरियाँ सिमटने में देर कुछ तो लगती है

रंजिशों के मिटने में देर कुछ तो लगती है

हिज्र के दोराहे पर एक पल न ठहरा वो

रास्ते बदलने में देर कुछ तो लगती है

आँख से न हटना तुम आँख के झपकने तक

आँख के झपकने में देर कुछ तो लगती है

हादिसा भी होने में वक़्त कुछ तो लेता है

बख़्त के बिगड़ने में देर कुछ तो लगती है

ख़ुश्क भी न हो पाई रौशनाई हर्फ़ों की

जान-ए-मन मुकरने में देर कुछ तो लगती है

फ़र्द की नहीं है ये बात है क़बीले की

गिर के फिर सँभलने में देर कुछ तो लगती है

दर्द की कहानी को इश्क़ के फ़साने को

दास्तान बनने में देर कुछ तो लगती है

दस्तकें भी देने पर दर अगर न खुलता हो

सीढ़ियाँ उतरने में देर कुछ तो लगती है

ख़्वाहिशें परिंदों से लाख मिलती-जुलती हों

दोस्त पर निकलने में देर कुछ तो लगती है

उम्र-भर की मोहलत तो वक़्त है तआ'रुफ़ का

ज़िंदगी समझने में देर कुछ तो लगती है

रंग यूँ तो होते हैं बादलों के अंदर ही

पर धनक के बनने में देर कुछ तो लगती है

उन की और फूलों की एक सी रिदाएँ हैं

तितलियाँ पकड़ने में देर कुछ तो लगती है

ज़लज़ले की सूरत में इश्क़ वार करता है

सोचने समझने में देर कुछ तो लगती है

भीड़ वक़्त लेती है रहनुमा परखने में

कारवान बनने में देर कुछ तो लगती है

हो चमन के फूलों का या किसी परी-वश का

हुस्न के सँवरने में देर कुछ तो लगती है

मुस्तक़िल नहीं 'अमजद' ये धुआँ मुक़द्दर का

लकड़ियाँ सुलगने में देर कुछ तो लगती है .

3. भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा

सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा

सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे

कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा

बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम

हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा

चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत

ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा

दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे

वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा

बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी

कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा

नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल

तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा

इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ

जब भी आया सामने वो बेवफ़ा अच्छा लगा .

4. ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते

जो ज़ख़्म तू ने दिए हैं भरा नहीं करते

हज़ार जाल लिए घूमती फिरे दुनिया

तिरे असीर किसी के हुआ नहीं करते

ये आइनों की तरह देख-भाल चाहते हैं

कि दिल भी टूटें तो फिर से जुड़ा नहीं करते

वफ़ा की आँच सुख़न का तपाक दो इन को

दिलों के चाक रफ़ू से सिला नहीं करते

जहाँ हो प्यार ग़लत-फ़हमियाँ भी होती हैं

सो बात बात पे यूँ दिल बुरा नहीं करते

हमें हमारी अनाएँ तबाह कर देंगी

मुकालमे का अगर सिलसिला नहीं करते

जो हम पे गुज़री है जानाँ वो तुम पे भी गुज़रे

जो दिल भी चाहे तो ऐसी दुआ नहीं करते

हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है

तमाम ग़ुंचे तो 'अमजद' खिला नहीं करते .
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