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मैं तुझे फिर मिलूंगी, पढ़ें अमृता प्रीतम की कविताएं

अमृता प्रीतम की कविताएं

अमृता प्रीतम की कविताएं

अमृता प्रीतम की कविताएं ( Amrita Pritam Poem): मेरी सेज हाज़िर है पर जूते और कमीज़ की तरह, तू अपना बदन भी उतार दे...

    अमृता प्रीतम की कविताएं ( Amrita Pritam Poem): अमृता प्रीतम साहित्य की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं. अमृता प्रीतम का जन्म पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के गुजरांवाला शहर में हुआ था. अमृता की कविता में प्रेम की कसक, विरह की व्यथा, प्रेमी से अलगे जन्म में मिलने की कामना और ऐसे तमाम एहसास मिलते हैं. उनकी कविताओं में प्यार की धूप छांव के एहसास देखने को मिलते हैं. साहित्य के क्षेत्र में अमृता के अबूत्पूर्व योगदान के लिए उन्हें 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत, 1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार और 1981 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया. आज कविताकोश के साभार से हम आपके लिए लाए हैं अमृता प्रीतम की कुछ ख़ास कविताएं...

    मैं तुझे फिर मिलूंगी...

    मैं तुझे फिर मिलूँगी
    कहाँ कैसे पता नहीं
    शायद तेरे कल्पनाओं
    की प्रेरणा बन
    तेरे केनवास पर उतरुँगी
    या तेरे केनवास पर
    एक रहस्यमयी लकीर बन
    ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
    मैं तुझे फिर मिलूँगी
    कहाँ कैसे पता नहीं

    या सूरज की लौ बन कर
    तेरे रंगो में घुलती रहूँगी
    या रंगो की बाँहों में बैठ कर
    तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी
    पता नहीं कहाँ किस तरह
    पर तुझे ज़रुर मिलूँगी

    या फिर एक चश्मा बनी
    जैसे झरने से पानी उड़ता है
    मैं पानी की बूंदें
    तेरे बदन पर मलूँगी
    और एक शीतल अहसास बन कर
    तेरे सीने से लगूँगी

    मैं और तो कुछ नहीं जानती
    पर इतना जानती हूँ
    कि वक्त जो भी करेगा
    यह जनम मेरे साथ चलेगा
    यह जिस्म ख़त्म होता है
    तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है

    पर यादों के धागे
    कायनात के लम्हें की तरह होते हैं
    मैं उन लम्हों को चुनूँगी
    उन धागों को समेट लूंगी
    मैं तुझे फिर मिलूँगी
    कहाँ कैसे पता नहीं

    मैं तुझे फिर मिलूँगी!!



    आत्ममिलन...

    मेरी सेज हाज़िर है
    पर जूते और कमीज़ की तरह
    तू अपना बदन भी उतार दे
    उधर मूढ़े पर रख दे
    कोई खास बात नहीं
    बस अपने अपने देश का रिवाज़ है……

    पहचान...

    तुम मिले
    तो कई जन्म
    मेरी नब्ज़ में धड़के
    तो मेरी साँसों ने तुम्हारी साँसों का घूँट पिया
    तब मस्तक में कई काल पलट गए--

    एक गुफा हुआ करती थी
    जहाँ मैं थी और एक योगी
    योगी ने जब बाजुओं में लेकर
    मेरी साँसों को छुआ
    तब अल्लाह क़सम!
    यही महक थी जो उसके होठों से आई थी--
    यह कैसी माया कैसी लीला
    कि शायद तुम ही कभी वह योगी थे
    या वही योगी है--
    जो तुम्हारी सूरत में मेरे पास आया है
    और वही मैं हूँ... और वही महक है...



    सिगरेट...

    यह आग की बात है
    तूने यह बात सुनाई है
    यह ज़िंदगी की वो ही सिगरेट है
    जो तूने कभी सुलगाई थी

    चिंगारी तूने दे थी
    यह दिल सदा जलता रहा
    वक़्त कलम पकड़ कर
    कोई हिसाब लिखता रहा

    चौदह मिनिट हुए हैं
    इसका ख़ाता देखो
    चौदह साल ही हैं
    इस कलम से पूछो

    मेरे इस जिस्म में
    तेरा साँस चलता रहा
    धरती गवाही देगी
    धुआं निकलता रहा

    उमर की सिगरेट जल गयी
    मेरे इश्के की महक
    कुछ तेरी सान्सों में
    कुछ हवा में मिल गयी,

    देखो यह आखरी टुकड़ा है
    ऊँगलीयों में से छोड़ दो
    कही मेरे इश्कुए की आँच
    तुम्हारी ऊँगली ना छू ले

    ज़िंदगी का अब गम नही
    इस आग को संभाल ले
    तेरे हाथ की खेर मांगती हूँ
    अब और सिगरेट जला ले !!

    Tags: Book, Corona Days, Lifestyle

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