‘थप्‍पड़ को प्‍यार’ कहने वाले फिल्‍म कबीर सिंह के डायरेक्‍टर के लिए प्‍यार की ये 5 कहानियां

संदीप रेड्डी जी, फिल्‍में तो आप देखते ही होंगे. दो-चार डॉक्‍यूमेंट्री भी देख लीजिए. एक तो नेटफ्लिक्‍स पर ही है- बिहाइंड क्‍लोज्‍ड डोर्स. मुहब्‍बत के नाम पर बंद दरवाजों के अंदर पिटती, मतलब कि प्‍यार की जाती औरतों की कहानी.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 2:26 PM IST
‘थप्‍पड़ को प्‍यार’ कहने वाले फिल्‍म कबीर सिंह के डायरेक्‍टर के लिए प्‍यार की ये 5 कहानियां
फिल्‍म कबीर सिंह के डायरेक्‍टर संदीप रेड्डी
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 2:26 PM IST
डियर संदीप रेड्डी, ये कहानी खासतौर पर आपके लिए.

हाल ही में आपने अपने इंटरव्‍यू में जो बात बात कही, मैं उस पर कोई कॉलम या ओपिनियन पीस नहीं लिख रही. न उस बयान की खाल उधेड़ रही हूं, न उसका विश्‍लेषण कर रही हूं. मैं तो बस कुछ कहानियां सुनाना चाहती हूं और चाहती हूं कि आप वो कहानियां सुनें. वैसे आपकी दी परिभाषा में फिट करके देखूं तो ये प्रेम कहानियां हैं. आप ही ने तो कहा था, वो मुहब्‍बत कैसी जिसमें मर्द अपनी औरत को जब चाहे तब दो तमाचे न जड़ सके. आपके मुताबिक पीटने का मतलब है प्‍यार करना और प्‍यार करने का मतलब है पीटना.



तो ये सच्‍ची वॉयलेंस (प्रेम) की कहानियां खास आपके लिए. ये कहानियां अलग-अलग औरतों ने बहुत सारे मौकों पर सुनाई हैं. कुछ कहानियों की तो मैं खुद गवाह रही हूं. कुछ इस भरोसे के साथ औरतों ने साझा की कि उनकी निजता हमेशा सुर‍क्षित रहेगी. इसलिए इस कहानी में उन औरतों का नाम और पहचान जाहिर नहीं कर रही हूं.

प्रेम कहानी – 1

ये प्रेम कहानी मेरे बचपन की है. हमारे पड़ोस में एक नई-नवेली बहू आई थी. मुंह दिखाई में मां के साथ मैं भी गई. जब वो लोग उसे धीरे से पकड़कर ला रहे थे तो वो सिर से लेकर पांव तक लाल कपड़ों में थी. चेहरे पर लंबा घूंघट. सिर्फ उसके गोरे नाजुक पैर दिखाई दे रहे थे. पैरों को लाल आलता से रंगा गया था. नाजुक उंगलियों में बिछिया और घुंघरुओं वाली पायल. वो पांव इतने खूबसूरत थे कि मेरे अवचेतन में कहीं उसकी स्‍मृति हमेशा के लिए दर्ज हो गई. वो दिन है और आज का दिन, आलता वाले पैर देखकर मन अनायास ही एक अनकही खुशी से भर जाता है. नई बहू को सबने प्‍यार दिया, आशीष दिया. सबने कामना की कि उसकी गोदी में जल्‍दी से कन्‍हैया खेले. एक अनजान घर में ये उसकी नई जिंदगी की शुरुआत थी.
फिर कई साल गुजर गए. नई बहू पुरानी हो गई लेकिन उसका घूंघट नहीं हटा. उस मुंह दिखाई के बाद से पड़ोस, मुहल्‍ले में किसी ने कभी उसकी शक्‍ल नहीं देखी. फिर एक दिन उसके मरने की खबर आई. उसके प्रेमी पति ने उसे क्रिकेट वाले बैट से इतना पीटा कि वो मर गई. जरूर ज्‍यादा प्रेम रहा होगा, इसलिए पिटाई भी ज्‍यादा हुई. ये सब कहानियां बाद में पता चलीं कि शादी के दूसरे हफ्ते से ही पिटना तो उसका रोज काम था. उसके चेहरे पर हमेशा नील पड़े रहते. माथा फूटा रहता. कभी किसी ने देखा नहीं क्‍योंकि आखिरी सांस तक उसका घूंघट सिर से नहीं उतरा था.


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प्रेम कहानी – 2
ये तो मेरे खुद के घर की प्रेम कहानी है. पहचान छिपा रही हूं. एक औरत थी. हमारी करीबी रिश्‍तेदार. उसका पति भी आए दिन उस पर यूं ही प्रेम बरसाया करता था. थप्‍पड़ तो मानो दाल-भात था. दाल में नमक ज्‍यादा हो जाए तो भी जड़ देता. एक से दूसरी बार आवाज लगानी पड़े तो जड़ देता. जब वो सात महीने की प्रेग्‍नेंट थी तो एक बार गुस्‍से में उसने औरत के पेट पर लात मार दी. दो महीने बाद प्रीमैच्‍योर बच्‍चा पैदा हुआ. वो मेंटली रिटार्डेड था. सिर्फ 13 साल जिया और मर गया. वो औरत अब पचास पार है. अब भी उसका पति उस पर ऐसे ही प्‍यार बरसाता है. लेकिन हाल ही में एक घटना हुई. एक दिन पति ने थप्‍पड़ मारा तो शादी के 27 साल बाद उसने भी पलटकर पति को थप्‍पड़ जड़ दिया. मतलब औरत ने प्‍यार के बदले पहली बार प्‍यार जताया. छह महीने हो गए. उस दिन के बाद से आदमी ने हाथ नहीं उठाया है. लेकिन पति की लात खाते जिंदगी के जो 27 साल गारत हुए, जो बच्‍चा मर गया, वो तो वापस नहीं आ सकता.

प्रेम कहानी – 3
ये प्रेम कहानी मुंबई हाईकोर्ट की एक नामी वकील की है. लेबर लॉ की एक्‍सपर्ट थीं. वकालत इतनी अच्‍छी चलती थी कि बांद्रा के पास अकेले अपने बूते दो बेडरूम का फ्लैट खरीदने की औकात रखती थीं. बॉर्डर वाली कलफ लगी सफेद साड़ी, बालों को कसकर बनाया गया जूड़ा, बड़ी लाल बिंदी और कोर्टरूम में जज के सामने आत्‍मविश्‍वास से चमकता चेहरा. ऊंची एड़ी के जूतों में सिर उठाकर टक-टक चलने वाली वो औरत कई बार कोर्ट में ढेर सारा फाउंडेशन और पाउडर लगाकर आती. सब ऐसे दिखाते जैसे उन्‍होंने कुछ देखा ही नहीं. लेकिन जानने वाले जानते थे कि ये क्रीम-पाउडर चेहरे पर पड़े कल रात की पिटाई के निशान छिपाने के लिए है. पति जब भी मारता, वो हमेशा अपना चेहरा बचाने की कोशिश करती. बंद गले के ब्‍लाउज में शरीर के बाकी निशान छिपाए जा सकते थे. चेहरा तो भरे कोर्ट में नजर आता. फिर भी कई बार आंखों के नीचे काला पड़ा होता था.
ये उस कॉन्फिडेंट, इंडीपेंडेंट औरत की प्रेम कहानी थी.



प्रेम कहानी – 4
आपने वो फिल्‍म देखी है, जूलिया रॉबर्ट्स वाली- ‘स्‍लीपिंग दि द एनेमी.’ बिलकुल वैसी ही कहानी है ये मेरी उस सहेली की, जिसका पति जिस भी रात उसे पीटता, अगले दिन उसे तोहफों से लाद देता था. बाहर डिनर पर ले जाता, फिल्‍म दिखाता, कपड़े दिलाता, सॉरी बोलता, प्‍यार जताता. अगली दफे फिर यही कहानी दोहराई जाती. लेकिन मेरी उस दोस्‍त ने ये सोचकर संतोष कर लिया था कि मारने के बाद इतने उपहार तो देता है. और दूसरे मेरा पति पैसे वाला है. इतनी ऐशोआराम की जिंदगी और कहां मिलेगी. उपहारों के बदले उसने लात खाना स्‍वीकार किया.

प्रेम कहानी – 5
ये आखिरी कहानी तो शादी की नहीं, सचमुच की मुहब्‍बत वाली कहानी है. महानगर में एक आजादख्‍याल लड़की, एक जेंडर सेंसिटिव सा मालूम पड़ता लड़का. दोनों लिव इन में रहते थे. उन्‍हें लगता था कि जाति, धर्म, समाज, नियम, कानून सब बेकार है. परिवार संस्‍था सामंती है. साथ रहने की बस एक ही शर्त है- मुहब्‍बत. दोनों सिर से लेकर पांव तक मुहब्‍बत में थे. लड़की को गुमान था, रिश्‍ते में बुनी आजादी और बराबरी का. लेकिन ये गुमान उस दिन जाता रहा, जब एक बार किसी बात पर बहस होने पर जब लड़के के पास मुंह से बोलने को कुछ न रहा तो उसने हाथ से बात की और लड़की को एक तेज थप्‍पड़ जड़ दिया. लड़की के सफेद, नाजुक गालों पर पूरी पांच उंगलियां छप गईं. तीन दिन दफ्तर से छुट्टी लेकर घर बैठी. ये निशान लेकर कैसे जाती.

आपकी फिल्‍म में तो कबीर और प्रीती दोनों एक-दूसरे को थप्‍पड़ लगाते हैं. लेकिन क्‍या खुद आपने सुनी उन दोनों थप्‍पड़ों की आवाज. प्रीती लड़के के सख्‍त गालों पर ऐसे अपनी हथेली छुआती है, जैसे पेड़ से टूटकर जामुन गिरा हो- छप से. और कबीर, क्रिकेट की झन्‍नाटेदार बॉल की तरह आता है उसका हाथ और लड़की का सिर घूम जाता है. ऐसे ही हुआ था उस दिन. सिर्फ एक थप्‍पड़ मारा था. दर्द और निशान तीन दिन रहा. बाकी बकौल आपके मुहब्‍बत तो थी ही.



इनमें से कोई कहानी काल्‍पनिक नहीं है. वो उतनी ही सच है, जितना कि आपका होना. आपका सांस लेना. आपका फिल्‍म बनाना. और ये हर कहानी एकतरफा पिटाई यानी एकतरफा मुहब्‍बत की कहानी है. सारे थप्‍पड़ मर्दों ने ही लुटाए हैं, औरत ने मुट्ठी भींचें, आंखें मींचे सिर्फ खाए हैं, खिलाए नहीं.

आर्टिकल की अपनी सीमा है. ऐसी पांच नहीं, पांच सौ कहानियां हैं मेरे पास. लेकिन कितनी सुनाऊंगी और कितनी तो सुनेंगे आप. इसीलिए जाते हुए सिर्फ कुछ आंकड़े बताना चाहती हूं. यूएन की एक रिपोर्ट कहती है कि पूरी दुनिया में 55 फीसदी औरतें घरेलू हिंसा के कारण गंभीर शारीरिक चोटों का शिकार होती हैं. नेशनल फैमिली हेल्‍थ सर्वे कहता है कि भारत में 37 फीसदी औरतें घरेलू हिंसा की शिकार हैं. पिछले साल की थॉमसन रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक हमारा देश औरतों के लिए सबसे खतरनाक देश है. और जिस थप्‍पड़बाजी को आपने मुहब्‍बत का नाम दिया है, भारतीय दंड संहिता उसे एक दंडनीय अपराध मानती है. घरेलू हिंसा इतनी बड़ी समस्‍या है कि सरकार ने 2005 में इसके लिए बाकायदा कानून बनाया- प्रोटेक्‍शन ऑफ वुमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्‍ट, 2005.

और अंत में इतना ही कि आप तो फिल्‍ममेकर हैं. फीचर फिल्‍में तो देखते ही हैं, दो-चार डॉक्‍यूमेंट्री भी देख लीजिए. एक तो नेटफ्लिक्‍स पर ही है- बिहाइंड क्‍लोज्‍ड डोर्स. मुहब्‍बत के नाम पर बंद दरवाजों के अंदर पिटती, मतलब कि प्‍यार की जाती औरतों की कहानी.

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