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किस्सागोई: कभी दोस्त ने की थी मशहूर होने की भविष्यवाणी, आज जाने माने एक्टर हैं अनु कपूर

News18Hindi
Updated: December 28, 2019, 12:31 PM IST
किस्सागोई: कभी दोस्त ने की थी मशहूर होने की भविष्यवाणी, आज जाने माने एक्टर हैं अनु कपूर
एक्टर अनू कपूर देश के जाने माने कलाकारों में से एक हैं.

अनू कपूर के जीवन में आर्थिक कमी के चलते एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें अपनी पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी. लेकिन उसी समय दोस्त ने उन्हें हिम्मत देते हुए कहा कि...

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घुंघराले बाल, औसत कद, सामान्य सा चेहरा लेकिन बेहतरीन अभिनय, जबरदस्त ऊर्जा और विविधता वाले उस कलाकार के लिए उर्दू के बड़े शायर मुनव्वर राना साहब का वो शेर याद आता है-

उन घरों में जहां मिट्टी के घड़े होते हैं
कद में छोटे हों लेकिन लोग बड़े होते हैं

जिस कलाकार के बचपन को आज हम टटोलने जा रहे हैं वो कलाकार हैं अनु कपूर. बचपन में उनका नाम अनिल रखा गया था यानी वो भी अनिल कपूर थे. लेकिन बाद में वो अनु कपूर हो गए. पिता जी जिस परिवार से आते थे वहां किसी को नाटक का शौक तो दूर की बात थी. बल्कि नाटक को बकवास कामों की श्रेणी में रखा जाता था. लेकिन बावजूद इसके अनु कपूर के पिता एक थिएटर कंपनी चलाते थे. कहते हैं कि इसी शौक की वजह से अनु कपूर के पिता को उनकी मां ने घर से बाहर निकाल दिया था. जाहिर है ये संघर्ष भरे दिन रहे होंगे? अनु कपूर बताते हैं- “उस जमाने में नाटक-वाटक वालों को अच्छा नहीं समझा जाता था. लिहाजा बचपन कई तरह की समस्याओं से गुजरा. इतने संघर्षों के बावजूद, भूख सहने के बावजूद मां-पिता जी ने कभी भी गलत रास्ते पर चलने की सीख नहीं दी और ना ही जाने दिया. मेरी मां ब्राहमण थीं. पिता जी ने उन्हें उर्दू सीखने के लिए प्रेरित किया. बढ़ावा दिया. जिसका नतीजा ये हुआ कि मेरी मां ने उर्दू, परसियन और अरबी भाषाएं सीखीं. लिहाजा वो भाषाविद बन गईं. वो जितनी अच्छी उर्दू बोलती थीं उतनी ही अच्छी पंजाबी, मराठी या मारवाड़ी बोलती थीं”.

पिता की थिएटर कंपनी और मां भाषाविद, क्या ये कॉम्बिनेशन ही था जो अनु कपूर के बचपन को थोड़ा अलग करता है, अनु जी कहते हैं-“मेरे अंदर भी कुछ गुण जरूर आए. मां को अलग अलग धर्मों को जानने-समझने का बहुत शौक था. उन्होंने हमें भी प्रेरित किया कि पढ़ो. उन्हें साहित्य का शौक था तो उन्होंने हमें भी पढ़ते रहने को कहा, इसीलिए मैंने ना सिर्फ वेद बल्कि उपनिषदों का भी अध्ययन किया. कुरान पढ़ी. बाइबिल पढ़ी. साहित्य में हमने मीर को भी पढ़ा, गालिब को भी पढ़ा, सूर, तुलसी, संत ज्ञानेश्वर से लेकर चार्ल्स डिकेंस तक को पढ़ा. इस बात का श्रेय मेरी मां को जाता है. अच्छी बात ये थी कि पिता जी ने इन बातों को हमेशा बढ़ावा दिया”. लेकिन संघर्ष की कहानियों के बीच बचपन की शरारत थोड़े ना खत्म होती हैं, अनु जी कहते हैं-

पिता जी से तो कभी मार नहीं पड़ी सिवाय एक बार के, दरअसल उन्होंने 29 का पहाड़ा सुनाने को कहा और मैं नहीं सुना पाया तो उन्होंने गाल पर हल्की सी चपत लगाते हुए कहाकि ओए, सीख इसको. बस इतना. बल्कि मां ‘स्ट्रिक्ट’ थीं, अनुशासित थीं. मुझे याद है उन दिनों एक फिल्म आई थी धरती- उस फिल्म में राजेंद्र कुमार थे, वहीदा रहमान थीं और बलराज साहनी, अजीत जैसे कलाकार भी थे. धरती टाइटल बड़ा ‘पैट्रियॉटिक’ लगा उनको. उस वक्त का समाज अलग था. माता पिता का बच्चों के लिए दृष्टिकोण अलग था. मैंने मां से कहाकि ‘धरती’ अच्छी फिल्म है, देशभक्ति की फिल्म है. तो वो देखने चली गईं. उसमें हुआ यूं कि एक गाना था- खुदा भी आसमां से जब जमी पर देखता होगा मेरे महबूब को किसने बनाया सोचता होगा, इस गाने का ‘पिक्चराइजेशन’ कुछ यूं था मां को पसंद नहीं आया. वो मेरी मां की संवेदना से ‘मैच’ नहीं खाया. उनको वो अश्लील लगा. घर आईं और उस रोज मेरी जबरदस्त पिटाई हुई. इस बात पर पिटाई हुई कि उनकी ‘सेंसिबिलिटी’ के हिसाब से वो फिल्म ठीक नहीं थी. पुराने जमाने के लोग थे. उसूलों नैतिकता सिद्धांतों के बहुत पक्के थे. समझौता नहीं करते थे. ऐसे ही 1964 में ‘संगम’ फिल्म आई थी, मां ने सिर्फ इतना कहाकि ये फिल्म तुम्हारे लिए नहीं है. वो फिल्म मैंने आजतक नहीं देखी. हमेशा दिमाग के एक कोने में ये बात रही कि इस फिल्म को देखने के लिए मां ने मना किया था. मेरी जेनरेशन के लोगों को आप बेवकूफ बोल सकते हैं लेकिन यही संस्कार हैं जिसके बीच हमारी परवरिश हुई”.

अनू कपूर
अनू कपूर
मां की और कौन सी छवियां हैं जो अनु कपूर के जेहन में हमेशा ताजा रहती हैं- “मेरी मां ने चालीस रूपये में नौकरी की है. साढ़े सात किलोमीटर पैदल जाती थीं, साढ़े सात किलोमीटर पैदल आती थीं. बालवाड़ी जाती थीं. मेरी मां के पास दो साड़ियां थीं. एक चप्पल, दो साडियां. हम बच्चों के लिए खाना भी बनाकर जाती थीं. क्योंकि पिता जी का प्रोफेशन यानी उनकी नाटक मंडली का काम कभी चलता था कभी नहीं चलता था. एक परिवार को चलाने के लिए एक नियमित आय़ जरूरी होती है. इन चुनौतियों के बावजूद मैंने अपने माता-पिता को कभी लड़ते नहीं देखा. मेरी मां ने कभी शिकायत नहीं की. इतना प्रेम था दोनों के बीच में, इतना आदर-सम्मान था दोनों के बीच में एक दूसरे के प्रति”.

29 का पहाड़ा तो खैर एक घटना भर है, अनु जी के बचपन का न्यूटन के नियम से भी गहरा रिश्ता है. ये किस्सा जैसे ही पूछा. वो बोले- ये कहानी फिजिक्स की क्लास की है. क्लास में आइजक न्यूटन के ‘लॉज ऑफ मोशन’ पूछे गए. सभी ने पहला और तीसरा नियम बताया. हम हिंदी मीडियम में पढ़ने वाले लोग थे. हमारे सर ने सभी बच्चों को खड़ा कर दिया. करीब पैंतीस बच्चे थे क्लास में सभी ख़ड़े कर दिए गए. सिर्फ मैं बैठा हुआ था. उसके बाद उन्होंने बड़े विश्वास के साथ कहा- अब अनिल बताएगा. स्कूल में मेरा नाम अनिल ही था. मैं खड़ा हुआ और ये दुर्भाग्य था कि मैंने भी पहला और तीसरा नियम ही बताया. दूसरा नियम मैं भी नहीं बता पाया. सर इतना गुस्सा हो गए कि आगे बढ़कर आए और उन्होंने मुझे तमाचा जड़ दिया. सारे बच्चों के सामने मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े. लेकिन वो गुरु का तमाचा ऐसा काम कर गया. मुझे याद है कि उन्होंने गुस्से में दो दिन तक मुझसे बात तक नहीं की. फिर तीसरे दिन जाकर मैंने गुरू जी का पैर छुआ. उन्होंने कहा- तूने मेरा विश्वास तोड़ दिया है. मुझे कितना विश्वास था तुम्हारे ऊपर. मैंने सारे बच्चों के सामने कहाकि अब अनिल बताएगा और तूने मेरा विश्वास तोड़ दिया. ये करीब पचास साल पुरानी बात होगी, आप लोग ताज्जुब करेंगे कि तब से लेकर अब तक मुझे न्यूटन का नियम नहीं भूला. 


फिर अनु कपूर के जीवन में वो वक्त भी आया जब उन्हें आर्थिक मुश्किलों में पढ़ाई छोड़नी पड़ी. उन्हें तो जो अफसोस था वो था ही उनके टीचरों को भी बहुत अफसोस हुआ. उनके कुछ दोस्त थे जो दुखी हुए. उसी समय एक दोस्त ने ऐसी बात कही जो अनु कपूर को अब तक नहीं भूली, अनु कपूर बताते हैं- “उस दोस्त ने कहा था आज तुझसे भगवान शिक्षा छीन रहा है लेकिन आने वाले समय में सारी दुनिया तुम्हें जानेगी. इसके बाद मैंने पिता जी की थिएटर कंपनी ज्वाइन कर ली. उसी बीच मैंने लॉटरी के टिकट बेंचे. चूरन वाले नोट बेंचे. उसके बाद मैंने भी चाय की दुकान चलाई. मैं बहुत बढ़िया चाय बनाता था. ऊपर से मलाई डाल कर देता था. शुद्ध दूध की चाय. ये 1972-73 के आस पास की बात है. उसके बाद मैंने 1974 से पिता जी की थिएटर कंपनी ‘रेग्यूलर' ज्वाइन कर ली थी. मध्यप्रदेश के अशोकनगर में मैंने पहली बार स्टेज के ऊपर परफॉर्मेंस दी थी. पहली परफॉर्मेंस पर ही मुझे पांच रूपये का इनाम भी मिला था. वहां से जीवन की गाड़ी चलती जा रही है. सत्तर के दशक में की गई दोस्त की भविष्यवाणी अब सोलह आने सच साबित हो चुकी है.

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First published: December 28, 2019, 6:11 AM IST
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