क्या आपके आसपास भी 'Bullshit' नौकरी करने वाले हैं

आमतौर पर देखा गया है कि नौकरी करने वाले अपनी नौकरी से कभी ख़ुश नहीं होते. कभी तनख्वाह कम तो कहीं काम ज़्यादा. लेकिन कुछ नौकरियां ऐसी होती हैं जो इनसे जुदा होती हैं और उन्हें एक ऐसी श्रेणी में रखा जाता है जिसे 'Bullshit Jobs' कहा जाता है.

News18Hindi
Updated: September 12, 2018, 2:54 PM IST
क्या आपके आसपास भी 'Bullshit' नौकरी करने वाले हैं
कमी नौकरियों की नहीं, अच्छी नौकरियों की है
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Updated: September 12, 2018, 2:54 PM IST
क्या आपके हिस्से ऐसी नौकरी लगी है जो किसी काम की नहीं. ऐसी नौकरी जिसे करते हुए लगता है कि इससे अच्छा तो नहीं ही करते. बेकाम, बेमानी सी नौकरियां जिसे मानवविज्ञानी डेविड ग्रेबर ने ‘Bullshit Jobs’ यानि बकवास नौकरी का टाइटल दिया है. आगे बढ़ने से पहले हम साफ कर दें कि यहां बुरी नौकरियों की बात नहीं हो रही है, बात बकवास नौकरियों की हो रही है. बुरी और बकवास दोनों में फर्क है जिसे ग्रेबर साहब ने अपनी किताब ‘Bullshit Jobs : A Theory’ में समझाया है.

ग्रेबर के मुताबिक बकवास नौकरियां वह होती है जिसके होने का स्पष्टिकरण उसे करने वाला भी नहीं दे पाता. उसे भी नहीं पता कि इस नौकरी के होने से समाज का क्या ‘भला’ हो पा रहा है. वहीं बुरी नौकरी वह होती है जो वैसे तो काम की होती है लेकिन उसे बुरा इसलिए कहा जाता है क्योंकि आपको तनख़्वाह अच्छी नहीं मिलती या काम के हालात काफी मुश्किल होते हैं. वहीं बुलशिट जॉब्स करने वालों को अक्सर पैसे अच्छे मिलते हैं लेकिन वो होती बेवजह की हैं. कमाल की बात यह है कि उसे करने वालों को भी यह बात पता होती है. हमें यकीन है आपके आसपास भी ऐसी नौकरी और उसे करने वाले ज़रूर होंगे ;)

उदाहरण के तौर पर ग्रेबर बताते हैं कि 'क्लर्किया काम, टेलीमार्केटर, कॉर्पोरेट वकील, कंसल्टेंट कुछ ऐसे रोज़गार हैं जो बिल्कुल ज़रूरी नहीं हैं. तकनीक उस पड़ाव पर पहुंच गई है जहां सबसे मुश्किल, मेहनत वाले काम भी मशीन कर लेती है लेकिन ख़ुद को हर हफ्ते किए जाने वाले 50 घंटे के काम से मुक्ति दिलाने के बजाय हम सब ऐसे बेमानी रोज़गार में फंसे हुए हैं जो पेशेवर तरीके से भी हमें संतुष्ट नहीं करते और हम ख़ुद में झांके तो भी हम नहीं समझ पाएंगे कि हम यह काम क्यों कर रहे हैं.


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सरकारे अक्सर नौकरियों को लेकर कटघरे में खड़ी रहती है


बुलशिट जॉब्स को ऐसे ही समझा जा सकता है - अगर हम शिक्षक, पुलिसकर्मी, सफाईकर्मी, मजदूर, वकील, जज जैसी नौकरियों को हटा दें तो सोचिए हमारा क्या होगा. वहीं, दफ्तर में किसी कुर्सी पर 10-7 बजे तक बैठे मैनेजर की नौकरी के हट जाने से शायद ही कंपनी के काम पर कोई फर्क पड़े. बहुत सारी बकवास नौकरियां मिडिल मैनेजमेंट ओहदों के लिए बनाई जाती हैं जिनका वैसा तो कोई औचित्य नहीं होता लेकिन वो होती है ताकि उसे करने वाले के करियर को उचित सिद्ध किया जा सके. अगर कल को वो नहीं हो तो कंपनी को या समाज को कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा. हालांकि ग्रेबर के मुताबिक दुनिया में ज़्यादातर लोग यह मानते हैं कि वह अपने हिस्से की नौकरी करके समाज में कुछ न कुछ योगदान कर रहे हैं और अगर आप उनसे कहेंगे कि ऐसा नहीं है तो उन्हें बुरा नहीं, बहुत बुरा लग सकता है.

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अक्सर मिडिल मैनेजमेंट में ऐसी नौकरियां तैयार की जाती हैं जिनकी जरूरत नहीं होती


यहां सवाल यह ज़रूर उठता है कि भारत जैसे देश में अगर इस नज़रिये से नौकरियों को देखेंगे तो कैसे चलेगा. बेरोज़गारी ने जिन देशों में पैर पसार रखा है, वहां नौकरी कैसी भी हो चल जाती हैं. ग्रेबर कहते हैं दुनिया भर की सरकारों पर नौकरी पैदा करने का राजनीतिक दबाव है. हम इस बात को मानकर चलते हैं कि अमीर लोग नौकरियां पैदा करते हैं और हमारे पास जितनी ज़्यादा नौकरियां होंगी, उतना बेहतर होगा. हमें फर्क नहीं पड़ता कि यह नौकरियां काम की है या नहीं, हम बस मानकर चलते हैं कि जितना ज़्यादा नौकरियों हो अच्छा है. लेकिन दरअसल हमने ऐसी अफसल कोशिश की है जिससे सिर्फ अमीर लोगों का भी भला हो पा रहा है. दफ्तर के चमकीले केबिनों में बैठा हर शख्स तो नहीं, लेकिन कुछ शख्स ऐसे ही हैं जो अमीरों के पैसों पर अमीरों की ही शान बढ़ाने के लिए और उनकी नज़र से दुनिया को देखने के लिए बैठे हैं.
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मजदूरी जैसे काम जितने अहम हैं, उतनी उन्हें अहमियत दी नहीं जाती


अंग्रेज़ी वेबसाइट वॉक्स को दिए एक इंटरव्यू में ग्रेबर ने कहा कि समाज में पैदा होने वाले मूल्य ज्यादातर बार उन लोगों के दिए होते हैं जिन्हें दरअसल ठीक से पैसा भी नहीं दिया जाता है. उन लोगों के बारे में सोचा जाए जो घर का ख्याल रखते हैं, खुद उठकर समाज कल्याण का काम करते हैं, जिन्हें मौजूदा आर्थिक ढांचे में शाबाशी तक नहीं मिलती. निश्चित ही पैसा कमाने की जरूरत है और उसके लिए इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे जरूरी पेशे बने रहेंगे लेकिन हमें अपने मूल्यों को भी फिर से समझने की जरूरत है क्योंकि बहुत सारा काम है जिसे करके समाज को योगदान दिया जा सकता है जिसे वर्तमान में 'काम' नहीं माना जाता.

आर्थिक ढांचे के तहत कई तरह की क्लास (मिडिल क्लास, अपर क्लास, आदि) बना दी गई है. वक्त है एक 'केयरिंग क्लास' बनाने का जिसमें वो लोग हो जो दूसरों के बारे में सोचें और ऐसा काम करें जो रोज़गार को लेकर हमारी मौजूदा सोच को बदल सके. जो यह बता सके कि ज़िंदगी और नौकरी का मतलब सिर्फ महीने के अंत में तनख्वाह आना और टीवी,फ्रिज खरीदना ही नहीं है. हालांकि भारत के परिप्रेक्ष्य में नौकरी को लेकर ग्रेबर के नज़रिये को समझना मुश्किल है. यह भी हो सकता है कि उनके रखे तर्कों से लोग फौरी तौर पर सहमत न हो लेकिन उनकी कही बात दूरदर्शिता में देखी जाने लायक है.
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