पुस्तक अंश: 'उसने गांधी को क्यों मारा'- देश के विभाजन और गांधी की हत्या की दास्तान है ये किताब

अशोक कुमार पांडेय की किताब 'उसने गांधी को क्यों मारा को पुस्तक अंश
अशोक कुमार पांडेय की किताब 'उसने गांधी को क्यों मारा को पुस्तक अंश

हम आपके लिए लेकर आए हैं मशहूर लेखक अशोक कुमार पांडेय की किताब 'उसने गांधी को क्यों मारा' (Usne Gandhi Ko Kyu Mara) का पुस्तक अंश...

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  • Last Updated: October 7, 2020, 8:46 PM IST
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'उसने गांधी को क्यों मारा' लेखक अशोक कुमार पांडेय की किताब कई ज्वलंत तथ्यों को सामने लाती है. यह किताब आज़ादी की लड़ाई में विकसित हुए अहिंसा और हिंसा के दर्शन के बीच कशमकश की सामाजिक-राजनैतिक वजहों की तलाश करते हुए उन कारणों को सामने लाती है जो गांधी की हत्या के ज़िम्मेदार बने. साथ ही, गांधी हत्या को सही ठहराने वाले आरोपों की तह में जाकर उनकी तथ्यपरक पड़ताल करते हुए न केवल उस गहरी साज़िश के अनछुए पहलुओं का पर्दाफ़ाश करती है बल्कि उस वैचारिक षड्यंत्र को भी खोलकर रख देती है जो अंतत: गांधी की हत्या का कारण बना.

किताब का अंश...

गांधी नहीं थे विभाजन के ज़िम्मेदार
इस समय का जनसंघ और हिन्दुत्व के ग़ैर-हिन्दू विचार वाले उसके पुरखे जिन्होंने सबसे ऊंची आवाज़ में अखंड भारत का नारा लगाया, उन्होंने अंग्रेज़ों और मुस्लिम लीग की देश के विभाजन में मदद की. उन्होंने एक देश के भीतर मुसलमानों को हिन्दुओं के क़रीब लाने की कोई कोशिश नहीं की. उन्होंने दोनों को दूर करने की लगभग हर कोशिश की. यह मनमुटाव ही विभाजन का मूल कारण है. अगर यह मान लिया जाए कि वे ईमानदार लोग हैं तो भी एक तरफ़ मनमुटाव के दर्शन को बढ़ावा देना और दूसरी तरफ़ अखंड भारत की बात करना ख़ुद को धोखा देना है...भारत में मुसलमानों के दुश्मन पाकिस्तान के दोस्त हैं. जनसंघी और अखंड भारत का नारा देने वाले सभी पाकिस्तान के दोस्त हैं.
—राममनोहर लोहिया



थोड़ी देर शान्त दिमाग़ से सोचें कि विभाजन क्यों हुआ? कोई भी बंटवारा कब होता है? जब घर में दो भाइयों के बीच तनाव उस हद तक पहुंच जाता है कि उन्हें लगने लगता है कि अब साथ रहना सम्भव नहीं तो वे अलग हो जाते हैं. साथ रहने के लिए सबसे ज़रूरी क्या है? यही न कि इस तनाव को उस हद तक कम किया जाए कि दोनों अलग रहने का ख़याल मन से निकाल दें, साथ रहना उन्हें अलग रहने से बेहतर लगने लगे. अगर तनाव कम किए बिना डंडे के ज़ोर पर एक भाई दूसरे को साथ रखने की कोशिश करेगा तो दूसरा उसका प्रतिकार करेगा और एक दिन वे अलग हो ही जाएंगे.

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देशों के लिए भी यही सही है. भारत की एकता और अखंडता के लिए तब भी यही ज़रूरी था और अब भी यही ज़रूरी है कि इसमें रहने वाले विभिन्न धार्मिक, भाषाई और दूसरे समूहों के बीच बराबरी के आधार पर पारस्परिक सम्मान का रिश्ता क़ायम हो. 1857 का महान जनविद्रोह इसी भावना पर आधारित था जब हिन्दू और मुसलमान साथ मिलकर अंग्रेज़ी साम्राज्य के ख़िलाफ़ लड़े थे. बाक़ियों की छोड़िए 1857 का स्वातंत्र्य समर में सावरकर ने इस एकता की खुले शब्दों में तारीफ़ की है—

किस प्रकार फिरंगी शासन छिन्न-भिन्न हो गया था और हिन्दुओं-मुसलमानों की आम सहमति से स्वदेशी सिंहासन स्थापित हो गए थे...किस प्रकार अपने शत्रुओं को यह कहने पर बाध्य कर दिया था कि इतिहासकारों और प्रशासकों को भारतीय सैन्य क्रान्ति द्वारा सिखाए गए अनेक पाठों में कोई भी इस चेतावनी से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है—अब ऐसी क्रान्ति सम्भव है जिसमें ब्राह्मण और शूद्र तथा हिन्दू और मुसलमान सभी हमारे विरुद्ध एक साथ संगठित हों और यह मानना सुरक्षित नहीं है कि हमारे आधिपत्य की शान्ति और स्थिरता बहुत सीमा तक उस महाद्वीप पर निर्भर है, जिसमें विभिन्न धर्मों वाली विभिन्न जातियां निवास करती हैं, क्योंकि वे एक-दूसरे को समझती हैं और एक-दूसरे की गतिविधियों का सम्मान करती हैं.

गांधी जी के पार्थिव शरीर को देखने उमड़ा जन सैलाब (pic credit: pinterest)
गांधी जी के पार्थिव शरीर को देखने उमड़ा जन सैलाब (pic credit: pinterest)


ज़ाहिर है इस सबक को सीखकर अंग्रेज़ों ने 1857 के जनविद्रोह की विफलता के बाद लगातार इस एकता को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया. जैसा कि पहले भी लिखा है बम्बई के तत्कालीन गवर्नर लार्ड एल्फिन्स्टाइन ने 14 मई, 1859 को एक बैठक में नोट किया था—'बाँटो और राज करो' (Divide et Impeta) एक पुरानी रोमन कहावत है, यह अब हमारी नीति होनी चाहिए.3 अंग्रेज़ों की इस कोशिश को इतिहास पढ़ने वाला हर कोई जानता है और यह समझना मुश्किल नहीं कि इस कोशिश में उनका साथ साम्प्रदायिक हिन्दुओं और मुसलमानों के संगठनों ने ही दिया.

1888 में अपने निर्माण के समय से कांग्रेस ने सेक्युलर नीतियां अपनाई थीं और हिन्दू या मुसलमान की जगह भारतीय हितों का प्रतिनिधि संगठन बनकर उभरी थी. लेकिन दूसरी तरफ़ दोनों ही धर्मों में ऐसे संगठन धीरे-धीरे उभरे जिन्होंने अंग्रेज़ों के सहयोग से देश में साम्प्रदायिक बंटवारे की नींव गहरी करने में पूरी ताक़त लगाईं. मुस्लिम लीग हो या हिन्दू महासभा या फिर आर.एस.एस., आप देखेंगे कि अपने धार्मिक हितों की बात करने वाले ये संगठन दरअसल अपने समुदायों के उच्चवर्गों के हितों की रक्षा कर रहे थे और आज़ादी की लड़ाई से पूरी तरह दूर थे. यह महज़ संयोग नहीं है कि 1942 में जब पूरा देश भारत छोड़ो के नारे से गूंज रहा था तो सावरकर और जिन्ना, दोनों ही ब्रिटिश हुकूमत के साथ खड़े थे और बंगाल और सिंध जैसी जगहों पर साथ में सरकार चला रहे थे, संयोग यह भी नहीं है कि उसी दौर में हिन्दू महासभा के समर्थन से चल रही सिंध की सरकार ने जब पाकिस्तान का प्रस्ताव असेम्बली में लाया तो महासभा ने उसका मूक समर्थन किया और गांधी के हर क़दम का विरोध करने वाली मुस्लिम लीग सावरकर के डोमिनियन स्टेट्स स्वीकार करने वाले प्रस्ताव पर कुछ नहीं कहती थी. न सावरकर के शिष्यों ने कभी जिन्ना को मारने की कोशिश की न जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन में कभी सावरकर पर कोई हमला हुआ. सोचिएगा कभी इन दोनों साम्प्रदायिक संगठनों की गांधी से साझा दुश्मनी का कारण क्या था?

ब्रिटिश सत्ता ने बंगाल का विभाजन, मिंटो-मार्ले सुधार, मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार जैसे क़दमों से इस दरार को खाई में बदलने में पूरा सहयोग दिया. लोकमान्य तिलक ने 1916 में मुस्लिम लीग के साथ समझौता कर इसी खाई को पाटने की कोशिश की थी और हमने देखा है कि गांधी उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए लगातार हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशें कर रहे थे और एक क़दम आगे बढ़कर सामाजिक रूढ़ियों का भी विरोध कर रहे थे. विभाजन को रोकने का एक ही तरीक़ा था कि उत्तर से दक्षिण तथा पूरब से पश्चिम तक के सभी अल्पसंख्यकों, दलितों और भाषा-भाषियों को यह भरोसा दिलाया जाता कि आज़ाद भारत में वे उतनी ही सुरक्षा और सम्मान के हक़दार होंगे. तभी एक राष्ट्र के निर्माण में सारी जनता अपने पूर्वग्रहों से मुक्त होकर पूरे उत्साह से शामिल हो सकती थी.

सर्वधर्म समभाव, अस्पृश्यता के विरुद्ध सतत आन्दोलन, अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन, संस्कृतनिष्ठ तथा फ़ारसीनिष्ठ भाषा की जगह

सहज-सरल-सर्वसमावेशी हिन्दुस्तानी के प्रचार और अन्य भाषाओं को बराबरी का सम्मान दिलाने की मुहिम जैसे क़दमों से गांधी यही प्रयास कर रहे थे. इसीलिए नोआखली में उनकी चिन्ता का केन्द्र अल्पसंख्यक हिन्दू थे तो दिल्ली में उनकी चिन्ता के केन्द्र में अल्पसंख्यक मुसलमान थे. बंटवारे का समर्थन तो छोड़िए उन्होंने बंटवारे के बाद भी यह सपना देखना नहीं छोड़ा था कि एक दिन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान फिर से एक हो जाएंगे, उनके लिए तो कभी वे बंटे थे ही नहीं. इसीलिए तो वह एक तरफ़ दिल्ली में हिंसा रोकने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ़ लगातार पाकिस्तान में हो रही हिंसा की लानत-मलामत करते हुए वहां जाकर उसे रोकने की इच्छा जता रहे थे. इसीलिए गांधी दोनों तरफ़ के विभाजनकारी तत्त्वों के लिए एक असुविधा थे.

असल में देश के विभाजन के ज़िम्मेदार वो लोग हैं जिन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफ़रत के बीज को विषवृक्ष बनाने में अपनी ज़िन्दगियां लगा दीं. वे लोग जो एक तरफ़ मुसलमानों को निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा का सपना दिखा रहे थे और दूसरी तरफ़ हिन्दुओं को हिन्दू राष्ट्र का. सोचिए ज़रा, कोई हिन्दू इस्लामिक देश की अवधारणा के साथ या कोई मुसलमान हिन्दू राष्ट्र की उस अवधारणा के साथ कैसे खड़ा हो सकता था जिसमें अल्पसंख्यक समाज को दोयम दर्ज़े का नागरिक होना था? आज़ादी का मतलब अगर बहुसंख्या की ग़ुलामी थी तो उसे कोई क्यों स्वीकार करता?

गांधी ने 22 अक्टूबर, 1947 की प्रार्थना सभा में कहा था—
क्या आप साढ़े तीन-चार करोड़ मुसलमानों को मार डालेंगे? या उन्हें हिन्दू बनाना चाहते हैं? लेकिन वह भी एक तरह की हत्या होगी. सोचिए, अगर आपके ऊपर ऐसा दबाव पड़े तो आप मुसलमान बनने के लिए तैयार हो जाएंगे? मान लीजिए आपसे ज़बरदस्ती की जाए कलमा पढ़ने के लिए और मना करने पर मार डालने की धमकी दी जाए तो? मैं पहला आदमी होऊंगा जो कहेगा कि यह करने की जगह मेरा गला काट दो. हममें कम से कम इतना साहस तो होना ही चाहिए. मुसलमानों को ऐसे हिन्दू बनने के लिए कहना पागलपन है. मुझे नहीं चाहिए ऐसे हिन्दू. क्या मैं हिन्दू धर्म की रक्षा ऐसे हिन्दुओं के सहारे करूंगा? मुझे ऐसे हिन्दू चाहिए जिनमें संयम हो. मुझे ऐसा क्रूर और अहंकारी क्यों होना चाहिए? एक आततायी व्यक्ति धर्म का पालन नहीं कर सकता.

यह कहते हुए गांधी के अन्तस में शायद धर्म के लक्षणों की व्याख्या करने वाला यह श्लोक रहा होगा—

धृति: क्षमा दमो स्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:/धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्.
(धीरज, क्षमा, भीतरी और बाहरी सफ़ाई, बुद्धि को उत्तम विचारों में लगाना, सम्यक् ज्ञान का अर्जन, सत्य का पालन मन को बुरे कामों में प्रवृत्त न करना, चोरी न करना, इन्द्रिय लोलुपता से बचना, क्रोध न करना ये धर्म के दस लक्षण हैं.)

भगत सिंह ने भी धर्म की नैतिक शिक्षाओं को स्वीकार करने और आडम्बरों के प्रतिकार की बात की थी,5 गांधी भी मनुस्मृति के रूढ़िवादी तत्त्वों को ठुकराकर उसके इस श्लोक में वर्णित नैतिक पाठ को अपनाने की शिक्षा दे रहे थे. कबीर ने कहा था—सार-सार को गहि रह्यो/थोथा देइ उड़ाय. महात्मा सार को ग्रहण कर रहे थे धर्म के और जिन्हें धर्म के सहारे सत्ता की प्यास थी वे थोथे को बजा रहे थे. गोडसे का पूरा बयान थोथा चना बाजे घना का क्लासिकीय उदाहरण है.

विभाजन : कुछ तथ्य

अगर एक नज़र कोई विभाजन तक पहुंचने वाली घटनाओं और तथ्यों पर डाल ले तो भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि गांधी किस क़दर विभाजन के ख़िलाफ़ थे और कैसे अन्त में उन्होंने अगर भारी मन से विभाजन को स्वीकार किया भी तो इसलिए कि वह समझ चुके थे कि देश की जनता को धार्मिक आधार पर इतना बांट दिया गया है कि अब साथ मिलकर देश चलाने की कल्पना असम्भव सी हो गई है.
पाठकों को याद होगा कि कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों पर विचार करने के लिए जब 25 जून, 1946 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई थी तब गांधी ने कहा था—मैं हार स्वीकार करता हूं...आप लोगों को अपनी समझ के अनुसार काम करना चाहिए.* वह अन्तरिम सरकार स्थापना की अल्पकालिक योजना के बिना संविधान सभा की दीर्घकालिक योजना की सफलता को लेकर संशय में थे. लेकिन पटेल मिशन के सदस्यों के साथ 2 जून की बैठक में वादा कर आए थे कि वह कांग्रेस कार्यसमिति में उस '16 मई प्रस्तावों' को पास करा लेंगे जो अन्तरिम सरकार के गठन का रास्ता खोलती थी. नेहरू और मौलाना आज़ाद को भी उन्होंने राज़ी कर लिया था. जब गांधी से पूछा पटेल ने कि क्या आप संतुष्ट हैं तो गांधी ने जवाब दिया—उलटे मेरा संशय गहरा हो गया है.

लेकिन जब सरदार पटेल, नेहरू और कार्यसमिति के अन्य सदस्य राजी थे तो गांधी ने हार मान ली. हालांकि, जब भारी उठापठक के बाद लीग और कांग्रेस की संयुक्त सरकार बनी तो यह साबित हो गया कि गांधी के संशय सही थे. पटेल ने अपनी ज़िद से इस सरकार में गृहमंत्री का पद अपने पास रखा. मुस्लिम लीग के लियाक़त अली ख़ान को वित्त मंत्रालय मिला. यह निर्णय असल में उलटा पड़ा. लियाक़त ने वित्त मंत्री के रूप में कांग्रेसी मंत्रियों के हर प्रस्ताव की राह में रोड़े अटकाए. हालत ये कि चपरासी तक की नियुक्ति में उन्हें वित्त मंत्रालय के चक्कर लगाने पड़ते थे. असल में, पहले दिन से लीग के मंत्रियों ने प्रधानमंत्री नेहरू या पटेल को नेता मानने से इनकार किया और कैबिनेट के भीतर एक अलग कैबिनेट की तरह काम करते रहे. डायरेक्ट एक्शन के चलते मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के लिए जो दबाव बनाया था वह सरकार के भीतर रहकर और बढ़ाते गए. लीग के मंत्री राजा गज़नफ़र अली ख़ान ने खुलेआम कहा—हम सरकार में पाकिस्तान के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए हैं. उस मंत्रिमंडल के सदस्य रहे मौलाना आज़ाद लिखते हैं—वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के ख़िलाफ़ काम कर रहे थे...हालात ऐसे हुए कि लियाक़त ने बजट बनाया तो पटेल और राजगोपालाचारी पूरी तरह इसके ख़िलाफ़ हो गए. उन्होंनेआरोप लगाया कि यह बजट जानबूझकर भारतीय उद्योगपतियों के हितों के ख़िलाफ़ है.8 उधर अंग्रेज़ भीतर-भीतर लीग का समर्थन कर रहे थे और अन्तत: लन्दन में हुई एक बैठक में 'समूह से बाहर होने के अधिकार' को लेकर लीग के पक्ष में फ़ैसला दिया. 15 दिसम्बर को सरदार पटेल ने क्रिप्स को लिखा—

आप जानते हैं गांधी जी पूरी तरह से हमारे समझौते के ख़िलाफ़ थे, लेकिन मैंने अपना ज़ोर लगाया. आपने मेरे लिए एक बेहद प्रतिकूल स्थितियां बना दी हैं. हम सबको यहां लग रहा है कि धोखा हुआ है...

नेहरू भी यह ख़ूब समझ रहे थे. नवम्बर के अन्त में मेरठ की एक आमसभा में उन्होंने खुला आरोप लगाया था कि—मुस्लिम लीग और अंग्रेज़ अधिकारियों में एक मानसिक गठजोड़ है.

उधर साम्प्रदायिक घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही थीं. गांधी जब नोआखली में आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे तो बिहार में सात हज़ार और फिर गढ़मुक्तेश्वर में एक हज़ार मुसलमान मारे गए.

देश के दूसरे हिस्सों से भी हिंसा की ख़बरें लगातार आ रही थीं. इधर अन्तरिम सरकार के भीतर मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं और जिन्ना ने संविधान सभा का बहिष्कार किया हुआ था. हालात इतने बिगड़े कि पटेल और नेहरू ने वायसराय लॉर्ड वेवेल वेवेल से लीग के सदस्यों को मंत्रिमंडल से बाहर करने की अपील की. लेकिन पटेल की इस धमकी के बावजूद कि अगर लीग के लोग बाहर नहीं जाएंगे तो हम चले जाएंगे, वेवेल ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. जब एटली ने ब्रिटिश सरकार की विदाई के लिए जून 1948 की समय सीमा तय की तो कांग्रेस ने अपना निर्णय वापस ले लिया.

किताब का नाम – उसने गांधी को क्यों मारा / लेखक- अशोक कुमार पांडेय
प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन / विधा – इतिहास
कीमत – 299/- रुपए
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