12 सालों से साइकिल पंक्चर बना परिवार का पेट पाल रही हैं फूलमती

असम की फूलमती साइकिल मरम्मत का काम करती हैं ताकि अपने तीन बच्चों और पति को संभाल सकें. वे कहती हैं कि दूसरी औरतों की तरह मेरे हाथ नाजुक नहीं लेकिन ऐसी नाजुकी भी किस काम की, जिसमें मैं अपने बच्चों का पेट न भर सकूं!

News18Hindi
Updated: February 15, 2018, 1:13 PM IST
12 सालों से साइकिल पंक्चर बना परिवार का पेट पाल रही हैं फूलमती
फूलमती राभा
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Updated: February 15, 2018, 1:13 PM IST
पहले-पहले जब साइकिल रिपेयर की दुकान शुरू की तो कोई भी मेरे पास नहीं आता था. आते भी थे तो सिर्फ मुझे देखने के लिए. शुरुआत के कई दिनों तक साइकिल बनाने की प्रैक्टिस घर लौटकर करती, डर लगता था कि काम भूल न जाऊं. अब दिन में तकरीबन 15 साइकिलें बनने के लिए आ जाती हैं. दूसरी औरतों की तरह मेरे हाथ नाजुक नहीं लेकिन ऐसी नाजुकी भी किस काम की, जिसमें मैं अपने बच्चों का पेट न भर सकूं!

फूलमती राभा शब्दों की कमी को सवालों से भर देती हैं. साइकिल बनाते हुए उनके हाथ तेजी से चलते रहते हैं और बीच-बीच में वो ग्राहकों से बात भी करती रहती हैं.

दरम्यानी उम्र की फूलमती को अपनी असल उम्र का अंदाजा नहीं. वे साइकिल मरम्मत का काम करती हैं ताकि अपने तीन बच्चों और पति को पाल सकें. पढ़िए, उनकी कहानी.



बचपन में खूब शैतानियां कीं. घरवालों की तरफ से किसी तरह की कोई रोकटोक नहीं थी. शायद ऊपरवाले ने मेरे भविष्य को ध्यान में रखकर ही ये इंतजाम किया था.

हम बच्चे टोला बनाकर जंगल में जाते. जंगल मेरे साथी थे. दूर-दूर तक जाती, हमेशा सिर्फ मुझे पता होता कि ताज़ी मछलियां किस पोखर में मिलेंगी, कहां ज्यादा मीठे नारियल मिलेंगे. शाम को इधर-उधर भटककर घर आती और खाना खाकर लंबलेट हो जाती. इतना सुख कि अब लगता है वो किसी दूसरे जन्म की बात हो.

शादी हुई. पति दिनभर घर में रहता. सब मजाक करते कि नई पत्नी के प्यार में काम नहीं करना चाहता लेकिन धीरे-धीरे मैं पुरानी होती गई और साथ में उसकी आदत भी. वो पढ़ा-लिखा नहीं है, मजदूरी का काम मिलता लेकिन लड़-भिड़कर हर जगह काम छोड़ देता.

खाली बैठे आदमी को औरत की देह ज्यादा लुभाती है. हमारे जल्दी-जल्दी एक-एक करके तीन बच्चे आ गए. मेरे सारे गहने बिक गए. अब क्या!

अब मुझे काम करना था लेकिन कौन सा काम. खाना पकाना आता है लेकिन ये काम गांव की सारी औरतों को आता है, कपड़े कांचने, सफाई जैसे कामों के लिए कोई वहां ऊपर से आदमी नहीं रखता. मैंने बहुत सोचा और पक्का किया कि मुझे साइकिल की मरम्मत का काम करना चाहिए. गांव में गाड़ियां कम ही घरों में हैं, सभी साइकिल पर आते-जाते हैं. मरम्मत की एक दुकान थी जो बंद हो चुकी थी.



साइकिल की हवा भी निकल जाए तो लोग पैदल दूसरे गांव तक उसे सुधारने जाते. मैंने पति से कहा और वो राजी हो गया.

दूसरे गांव जाकर मैंने एक पूरी दोपहर लगाकर साइकिल रिपेयर करने का सामान खरीदा. इस काम के लिए बाहर निकलने की वजह चाहे जो थी लेकिन मैं बच्चों की तरह खुश थी. इसी बहाने मुझे मेरा बचपन मिलेगा. मैं नहीं जानती थी कि आगे कितने दिन मुझे इंतजार में बिताने होंगे.

शुरू-शुरू में सड़क पर बैठती तो सब मुझे अजीब तरीके से देखते हुए निकलते. कुछ दिनों तक कई लड़के सड़क पर वहीं खड़े रहने लगे और मुझे देखते रहते. मैं रोने को होती, फिर घर पर बच्चों को याद कर चुप रह जाती. पति से किसी बात का जिक्र नहीं किया वरना वो काम छुड़वा देता.

मर्द की नाक के नीचे जो मूंछें होती हैं, वही उनका सबकुछ हैं, भले बच्चे भूखों मरे.

धीरे-धीरे लोग साइकिल लेकर आने लगे. लाकर पूछते कि क्या मैं इसे सुधार पाउंगी. वो साइकिल बनवाने के लिए नहीं, बल्कि ये देखने के लिए आते कि क्या मैं सच में साइकिल बना सकती हूं. पहले किसी पंचर बनाती औरत को किसी ने देखा नहीं था. अब सबको मेरी आदत हो गई है. साइकिल खराब होते ही मेरे पास आते हैं. अब महीनेभर में 5 से 6 हजार कमा लेती हूं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और घर के दूसरे खर्चे निकल जाते हैं.

ये काम करते-करते 12 साल हो गए. धीरे-धीरे मैं भी सड़क का पेड़ हो गई हूं, फर्क इतना है कि दिन उगने के साथ उगती और ढलने के साथ अपनी जगह से हट जाती हूं.
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