Baisakhi 2019: जानिए क्‍यों मनाई जाती है बैसाखी और क्‍या है इसका इतिहास ?

असम में इस पर्व को बिहू कहा जाता है, इस दौरान यहां फसल काटकर इसे मनाया जाता है.

News18Hindi
Updated: April 14, 2019, 12:32 PM IST
Baisakhi 2019: जानिए क्‍यों मनाई जाती है बैसाखी और क्‍या है इसका इतिहास ?
Baisakhi 2019: जानिए क्‍यों मनाई जाती है बैसाखी और क्‍या है इसका इतिहास ?
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Updated: April 14, 2019, 12:32 PM IST
बैसाखी का त्‍योहार पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है. यूं तो पूरे देश में इस त्‍योहार की रौनक देखते बनती है लेकिन पंजाब और हरियाणा में इसका एक अलग ही अंदाज देखने को मिलता है. यहां के लोग ढोल-नगाड़ों पर नाचते-गाते हैं. गुरुद्वारों को सजाया जाता है, भजन-कीर्तन कराए जाते हैं. लोग एक-दूसरे को नए साल की बधाई देते हें. घरों में कई तरह के पकवान बनते हैं और पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खाता है. इसके अलावा यहां इस दिन यहां मेले का आयोजन होता है. इसमे चंडीगढ़ के पास पिंजौर, परिसर में जम्‍मू शहर, कठुआ, उधमपुर रियासी जैसे अन्‍य स्‍थानों में बैसाखी के मेले का आयोजन होता है. आइए इस त्‍योहार के मौके पर जानते हैं क्‍यों मनाते हैं ये त्‍योहार और क्‍या है इसका महत्‍व?

बैसाखी का महत्व
पंजाब और हरियाणा के अलावा भी पूरे उत्तर भारत में बैसाखी मनाई जाती है, लेकिन ज्यादातर जगह इसका संबंध फसल से ही जुड़ा है. ऐसा माना जाता है कि सर्दियों की फसल कटने के बाद नए साल के आगमन के रूप में मनाते हैं.असम में इस पर्व को बिहू कहा जाता है, इस दौरान यहां फसल काटकर इसे मनाया जाता है. बंगाल में भी इसे पोइला बैसाख कहते हैं. पोइला बैसाख बंगालियों का नया साल होता है. केरल में यह त्‍योहार विशु कहलाता है. बैसाखी के दिन ही सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं.

हिंदुओं के लिए बैसाखी पर्व का बहुत महत्व है. मान्‍यता है कि हजारों सालों पहले गंगा इसी दिन धरती पर उतरी थीं. यही वजह है कि इस दिन धार्मिक नदियों में नहाया जाता है. इस दिन गंगा किनारे जाकर मां गंगा की आरती करना शुभ माना जाता है.

खालसा पंथ की स्थापना
साल 1699 में सिखों के 10वें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह ने बैसाखी के दिन ही आनंदपुर साहिब में खालसा पंत की नींव रखी थी. इस दौरान खालसा पंथ की स्‍थापना का मकसद लोगों को तत्‍कालीन मुगल शासकों के अत्‍याचारों से मुक्‍त करना था.
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