Balli Singh Cheema Birth Anniversary: 'तय करो किस ओर हो तुम, आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो'

Balli Singh Cheema Birth Anniversary: 'तय करो किस ओर हो तुम, आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो'
बल्ली सिंह चीमा की कविताएं

बल्ली सिंह चीमा की कविताएं (Balli Singh Cheema Poem): बड़ी शरीफ़ अहिंसक बन्दूक है उनकी, तू खुल के बोल, न उनसे ज़रा भी डर बल्ली ...

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  • Last Updated: September 2, 2020, 11:45 AM IST
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बल्ली सिंह चीमा की कविताएं (Balli Singh Cheema Poem): बल्ली सिंह चीमा हिंदी कविता के सुप्रसिद्ध कवि हैं. बल्ली सिंह चीमा की रचनाएं जमीन से जुड़ी हुई हैं. उनकी रचनाओं में बगावत, समाज को आईना दिखाने की बातें हैं. बदलते माहौल पर कविता लिखते हुए उन्होंने कहा- 'ख़ौफ़ दो रंग का मेरे गाँवों में है ,गंध बारूद की अब हवाओं में है. बल्ली सिंह चीमा का जन्म पंजाब के अमृतसर जिले के चीमा खुर्द गांव में हुआ था. आज हम कविताकोश के साभार से लेकर आए हैं बल्ली सिंह चीमा की कविताएं ...

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1.तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो .
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ..
ख़ुद को पसीने में भिगोना ही नहीं है ज़िन्दगी,


रेंग कर मर-मर कर जीना ही नहीं है ज़िन्दगी,
कुछ करो कि ज़िन्दगी की डोर न कमज़ोर हो .
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ..

खोलो आँखें फँस न जाना तुम सुनहरे जाल में,
भेड़िए भी घूमते हैं आदमी की खाल में,
ज़िन्दगी का गीत हो या मौत का कोई शोर हो .
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ..

सूट और लंगोटियों के बीच युद्ध होगा ज़रूर,
झोपड़ों और कोठियों के बीच युद्ध होगा ज़रूर,
इससे पहले युद्ध शुरू हो, तय करो किस ओर हो .
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ..

तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो .
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ..



2.कहे है दिल कि कोई फ़ैसला तो कर बल्ली .
लड़ाई सामने कर उनसे या उनसे डर बल्ली .

बड़ी शरीफ़ अहिंसक बन्दूक है उनकी,
तू खुल के बोल, न उनसे ज़रा भी डर बल्ली .

वो आदमी न मिला सिर्फ़ आदमी होता,
इसी तलाश में भटका हूँ दर-ब-दर बल्ली .

मेरी नज़र तो टिकी है सही निशाने पर,
मैं भूलकर भी क्यों देखूँ इधर-उधर बल्ली .

3.ख़ौफ़ दो रंग का मेरे गाँवों में है .
गंध बारूद की अब हवाओं में है .

ख़ूँ बहाने की लत पड़ गई है इन्हें,
एक हिंसक जुनूँ इन ख़ुदाओं में है .

खुल रही पगड़ियाँ, नुच रही दाढ़ियाँ,
अटपटा-सा ये मंज़र निगाहों में है .

वाह री ! जम्हूरियत जाऊँ सदके तेरे,
हिटलरी रंग तेरी अदाओं में है .

ये हक़ीक़त है 'बल्ली' अजूबा नहीं,
ज़िन्दगी दिल में है, मौत बाहों में है.

4.कुछ तो डरने लगे उनसे हम बेवजा .
कुछ वो करने लगे हैं सितम बेवजा .

दर्द से रो पड़ा क्योंकि घायल हूँ मैं,
हैं सितमगर की आँखें क्यों नम बेवजा .

मैंने उनको कभी भी बुलाया नहीं,
आ ही जाते हैं घर में भी ग़म बेवजा .

जाम पीकर कभी भी जो बहके नहीं,
डगमगाने लगे वो क़दम बेवजा .
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