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एहसास के शायर बशीर बद्र : उनकी ख़ामोशियों में भी जैसे ग़ज़ल गुनगुनाती है

Naaz Khan | News18Hindi
Updated: February 14, 2020, 9:41 PM IST
एहसास के शायर बशीर बद्र : उनकी ख़ामोशियों में भी जैसे ग़ज़ल गुनगुनाती है
आज भले ही बशीर साहब तन्‍हा हों मगर उनकी शरीके-हयात डॉ. राहत बद्र हर लम्‍हा उनके साथ हैं.

बशीर बद्र शायद पहले शायर हैं जिनका कलाम ख़ुद उनके कोर्स मे था. जब वह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए, तो एमए के कोर्स में वह पहले से पढ़ाए जा रहे थे. ऐसे में जब इम्‍तेहान का वक्‍़त आया तो उनके लिए ग़ज़ल की जगह कोई दूसरा पेपर बनाया गया था.

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(15 फ़रवरी, जन्‍मदिवस पर विशेष) 

कभी एक दौर था कि मुहब्बतों, एहसासों के शायर बशीर बद्र से सुख़न की महफि़लों की रौनक हुआ करती थी. मगर आज उनके अल्‍फ़ाज़ कहीं गुम हैं. ग़ज़ल जैसे उनकी ज़बां पर तो है मगर उसे ख़ामोशियां गुनगुना रही हैं. हालांकि एक वह भी दौर था जब वह मुशायरों की जान हुआ करते थे मगर अब उनकी बीमारी ने उन्‍हें सुख़न की महफिलों से उन्‍हें दूर कर दिया है.

अब उनकी याददाश्त के धागे इतने कमजोर पड़ गए हैं कि ख़ुद उनकी ग़ज़ल भी उन्‍हें याद दिलाने से याद आती है. हालांकि इस तन्‍हा सफ़र में भी उनकी शरीके-हयात डॉ.राहत बद्र हर लम्‍हा उनके साथ हैं. वह उनकी ख़ामोशियों को इस तरह समझती हैं जैसे मुहब्‍बत की ग़ज़ल पर कोई धीमा-सा साज़ दे रहा हो. वह कहती हैं, 'वह जब अपनी ग़ज़ल के चाहने वालों के बीच हुआ करते थे, हम तब भी उनके साथ थे और आज भी उनके साथ हैं. आज बशीर साहब की ग़ज़ल सियासत और मुहब्‍बत हर मौक़े पर गुनगुनाई जाती है. यह वक्‍़त का सितम है या किस्‍मत का लिखा, जो भी है मगर आज फूलों से एहसास का शायर ख़ामोश है. इतना ज़रूर है कि अब भी अगर कोई उनकी ग़ज़ल छेड़ दे, तो मुस्‍कुराहट उनके होंटों पर आ ही जाती है.

1987 के साम्प्रदायिक दंगों में जब उनका आशियाना खाक हुआ, तो उसकी तपिश उनके जज्‍़बात, एहसास तक भी पह़ंची.
1987 के साम्प्रदायिक दंगों में जब उनका आशियाना खाक हुआ, तो उसकी तपिश उनके जज्‍़बात, एहसास तक भी पह़ंची.


बशीर बद्र की पैदाइश अयोध्या में हुई. उनका बचपन कानपुर में बीता. उनकी तालीम अलीगढ़ में मुकम्मल हुई. वहीं मेरठ से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा है. शायद यही वजह है कि 1987 के साम्प्रदायिक दंगों में जब उनका आशियाना खाक हुआ, तो उसकी तपिश उनके जज्‍़बात, एहसास तक भी पह़ंची. इसी पर उनका एक शेर बहुत मशहूर है कि 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.' हालांकि इसके बाद वह ज्‍़यादा वक्‍़त तक मेरठ में नहीं रहे और अपना ढाई कमरों का मकान
छोड़ कर वह भोपाल में बस गए. 'दुश्मनी जम के करो लेकिन यह गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों.' उनका यह शेर इतना मशहूर हुआ कि अक्‍सर सियासत के गलियारों में इसकी गूंज सुनाई देती है.

15 फ़रवरी, 1935 को जन्‍मे बशीर साहब के बारे में उनकी हमसफ़र डॉ. राहत बद्र कहती हैं कि 'वह अब 85 साल के हो जाएंगे माशा अल्‍लाह. उनके चाहने वाले ही मनाते हैं उनका जन्‍मदिन. हमें कुछ करना ही नहीं पड़ता. हमारे यहां वैसे जन्‍म दिन मनाया नहीं जाता, लेकिन हम उन मुहब्‍बत करने वालों की क़द्र करते हैं जो आते हैं मुबाकरबाद देते हैं. यह बशीर साहब के चाहने वालों की मुहब्‍बत है जिसे वह जताने का मौक़ा ढूंढ़ते हैं.' उनकी तबियत का जि़क्र करते हुए वह कहती हैं, 'उनका बोलना ऐसा है कि वह कम सुनने लगे हैं. नज़र भी कमज़ोर हो गई है. उनकी याददाश्‍त भी कमज़ोर हो गई है. यह सब बीमारी की वजह से है. इसलिए बात करना, सुनना ये सब अब नहीं हो पाता. बात करते हैं मगर इस तरह कि पूछो कि तबियत कैसी है, खाना खा लीजिए. मगर इससे ज्‍़यादा कुछ नहीं बोलते.'
डाॅॅ. राहत कहती हैं, हमारे यहां जन्‍म दिन मनाया नहीं जाता, लेकिन हम उनकी क़द्र करते हैं जो आते हैं मुबाकरबाद देते हैं.
डाॅॅ. राहत कहती हैं, हमारे यहां जन्‍म दिन मनाया नहीं जाता, लेकिन हम उनकी क़द्र करते हैं जो आते हैं मुबाकरबाद देते हैं.


आज के दौर का सबसे बड़ा शायर आज बीमारी के सबब मजबूर ज़रूर हैं, मगर उनके अल्‍फ़ाज़, उनकी शायरी आज, कल और आने वाले कल का फ़साना है. वह क़रीब तीन-चार साल से कुछ भी नहीं लिख रहे. एक शायर के तौर पर दुनिया जिन्‍हें पलकों पर बिठाती है वह असल जिंदगी में इंसान कैसे हैं इस सवाल के जवाब में उनकी शरीके-हयात कहती हैं, 'हमारे बीच कभी हल्‍की-सी भी नोक-झोंक की नौबत नहीं आई. हमारा बेटा जब नहीं हुआ था तब तक मैं इनके साथ मुशायरों में जाती थी. यह मुझे भी अच्‍छा लगता था. तो ऐसा मौक़ा कभी आया ही नहीं कि हम कभी लड़ें या झगड़ें, बल्कि यह होता था कि इनके साथ के शायर यह कहते थे कि तुम इनको मुशायरों में लाकर परेशान क्‍यों करते हो. तब बशीर साहब का जवाब होता था, 'नहीं, इन्‍हें तो बहुत अच्‍छा लगता है मुशायरे में आकर.' यहां तक कि कोई नया शेर कहते थे तो सबसे पहले मुझ ही को सुनाते थे और मुझसे कहा करते थे कि तुम शायरी की समझ रखती हो.'

पत्‍थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूं उसने मुझे छू कर नहीं देखा

जहां तक उनके रहन-सहन और खाने की बात है तो मीठे अल्‍फ़ाज़ के माहिर बशीर साहब को मीठा इतना पसंद है कि अक्‍सर नमकीन में भी मीठा मिला कर खा लिया करते थे. बशीर बद्र तालीम के मामले में हमेशा अव्वल रहे. उन्हें सर मॉरेस विलियम स्कॉलरशिप, डॉ. राधाकृष्ण जैसी स्कॉलरशिप भी मिलीं थीं. एक बड़ी ख़ासियत बशीर साहब की यह रही कि वह एएमयू के गोल्‍ड मे‍डलिस्‍ट होने के साथ ही ऐसे शायद पहले शायर हैं जिनका कलाम ख़ुद उनके कोर्स मे था. जब वह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए, तो एमए के कोर्स में वह पहले से पढ़ाए जा रहे थे. ऐसे में जब इम्‍तेहान का वक्‍़त आया तो उनके लिए ग़ज़ल की जगह कोई दूसरा पेपर बनाया गया था.
सुलगती धूप, घनी चांदनी सी होती है,
तुम्‍हारे साथ यह दुनिया नई सी होती है

बशीर साहब कुछ जुदा ही तबियत के इंसान रहे. उन पर ख़ुद अपनी ही तारीफ़ करने की बातें कही जाती रही हैं. अपनी चार सौ पन्‍नों की एक किताब में चार जुमले उन्‍होंने अपनी तारीफ़ में भी लिखे हैं. हालांकि मिसाल के तौर पर अपने शेर भी दर्ज किए हैं. उनकी तीसरी किताब 'आमद' 1985 में छपी. इसमें उन्‍होंने अपने पढ़ने वालों के नाम एक ख़त भी लिखा है. इस ख़त में उन्‍होंने अपनी शायरी और अपनी मक़बूलियत और शोहरत का जि़क्र इस तरह किया है. वह लिखते हैं. 'आज 1985 की ग़ज़ल में मुझसे ज्‍़यादा मक़बूल और महबूब शायर बा क़ैद हयात नहीं है. हिंदुस्‍तान की 75 करोड़ आबादी पाकिस्‍तान के अदबी मरकज़, टोरंटो, शिकागो, न्‍यूयॉर्क और लंदन के अदबी हलक़ों में कितने लोग मुझे पसंद करते हैं इसका अंदाज़ा लगाना दुश्‍वार है.' हालांकि फिर वह अपनी इस ग़ैर मामूली मक़बूलियत की वजह भी बताते हैं और कहते हैं, 'यह मक़बूलियत मेरी नहीं, बल्कि नए ज़रियों यानी टीवी, रेडियो वग़ैरह की है.' बशीर बद्र उन शायरों में शुमार हैं जिनकी शायरी अलग से पहचानी जा सकती है.

सियासत और मुहब्‍बत की ग़ज़ल कहने वाले बशीर साहब को पद्मश्री समेत कई पुरस्‍कारों से नवाज़ा जा चुका है.
सियासत और मुहब्‍बत की ग़ज़ल कहने वाले बशीर साहब को पद्मश्री समेत कई पुरस्‍कारों से नवाज़ा जा चुका है.


बशीर बद्र वह धूप हैं, जो नई ग़ज़ल के नए सफ़र के साथ निकली है. वह जि़ंदगी की धूप से वाकिफ़ और एहसास के फूलों के शायर हैं. वह कहते रहे हैं, 'मैं ग़ज़ल का आदमी हूं, ग़ज़ल से मेरा जन्म-जन्म का साथ है. मेरा तजुर्बा ग़ज़ल का तजुर्बा है.' बीते क़रीब तीन-चार बरसों में अल्‍फ़ाज़ के जादूगर ने क़लम नहीं उठाई. मगर इसके बावजूद लगता है उनकी ख़ामोशियों में भी जैसे ग़ज़ल गुनगुनाती है. उनकी तन्‍हाई में जैसे अल्‍फ़ाज़ थिरक उठते हों और एहसास की कहानी कह रहे हों.

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए

 

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First published: February 14, 2020, 9:14 PM IST
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