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#100WOMEN: बीबीसी 100 वीमेन 2019- इस सूची में 7 भारतीय महिलाओं ने बनाई जगह

News18Hindi
Updated: October 16, 2019, 12:29 PM IST
#100WOMEN: बीबीसी 100 वीमेन 2019- इस सूची में 7 भारतीय महिलाओं ने बनाई जगह
साल 2019 में दुनिया भर की जिन 100 महिलाओं ने इस सूची में जगह पाई, उनमें सात भारतीय महिलाएं हैं.

साल 2019 में दुनिया भर की जिन 100 महिलाओं ने इस सूची में जगह पाई, उनमें सात भारतीय महिलाएं हैं.

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  • Last Updated: October 16, 2019, 12:29 PM IST
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पिछले सालों में बीबीसी ने असाधारण महिलाओं के विविधतापूर्ण ग्रुप को सम्मानित किया है, जिसमें मेकअप उद्यमी बॉबी ब्राउन, संयुक्त राष्ट्र की डिप्टी सेक्रेटरी जनरल अमीना मोहम्मद, सामाजिक कार्यकर्ता मलाला यूसुफ़ज़ई, एथलीट सिमोन बाइल्स, सुपर मॉडल एलेक वेक, संगीतकार एलिशिया कीज़ और ओलंपिक चैंपियन बॉक्स निकोला एडम्स शामिल हैं. इस साल बीबीसी की ये पुरस्कार विजेताओं की सीरिज अपने छठे साल में प्रवेश कर रही है. साल 2019 में बीबीसी 100 वीमेन फीमेल फ़्यूचर के बारे में होगी. साल 2019 में दुनिया भर की जिन 100 महिलाओं ने इस सूची में जगह पाई, उनमें सात भारतीय महिलाएं हैं. आइए जानते हैं कौन हैं वो महिलाएं.

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अरण्या जौहर (Aranya Johar), कवयित्री

अरण्या जौहर लैंगिक गैरबराबरी, मानसिक सेहत और अपने शरीर को लेकर सकारात्मक सोच जैसे मुद्दों को अपनी कविता के माध्यम से लोगों तक पहुंचाती हैं. उनके 'अ ब्राउन गर्ल्स गाइड टू ब्यूटी' वीडियो को यूट्यूब में 30 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है. उनकी भविष्य की परिकल्पना है कि अगर महिलाएं कार्यबल में शामिल हो जाएं तो वैश्विक जीडीपी 28 ट्रिलियन डॉलर हो सकती है. लोग क्यों दुनिया की आधी आबादी और उनकी संभावना को सीमित कर रहे हैं. लैंगिक बराबरी वाली दुनिया कैसी दिखेगी? और लोग इससे कितनी दूर हैं?

सुस्मिता मोहंती (Susmita Mohanty), अंतरिक्ष उद्यमी

भारत की स्पेस वीमेन के रूप में इनकी ख्याति है. स्पेसशिप डिजाइनर सुस्मिता ने भारत के पहले स्पेस स्टार्टअप की स्थापना की. पर्यावरण बचाने को लेकर संवेदनशील सुस्मिता अपने बिजनेस का इस्तेमाल अंतरिक्ष से जलवायु परिवर्तन को समझने और निगरानी करने में मदद के लिए करती हैं. उन्हें डर है कि तीन से चार पीढ़ियों में पृथ्वी रहने लायक नहीं रह जाएगा. इंसानियत पर्यावरण बचाने के लिए आपात कार्रवाई की जरूरत महसूस करेगी.

वंदना शिवा (Vandana Shiva), पर्यावरणविद
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1970 के दशक में वह महिलाओं के एक आंदोलन का हिस्सा थीं, जिन्होंने पेड़ काटे जाने के खिलाफ चिपको आंदोलन चलाया था. दुनिया में अब वो जानी मानी प्रतिष्ठित पर्यावरण नेत्री हैं और इकोफेमिनिस्ट पुरस्कार की विजेता हैं, जिसे दूसरा नोबल पीस प्राइज भी कहा जाता है. वह महिलाओं को प्रकृति की रक्षक के रूप में देखती हैं.

नताशा नोएल (Natasha Noel), योग विशेषज्ञ

नताशा एक योगिनी, योग की प्रशिक्षक और वेलनेस कोच हैं. अपने शरीर के प्रति सकारात्मकता के प्रति सचेत करने वाली नताशा अक्सर सोशल मीडिया पर अपने बचपन के सदमे वाले दिनों का अनुभव साझा करती रहती हैं. तीन साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां को खोया और वह बाल शोषण की शिकार भी हुईं. उनका कहना है कि भविष्य के प्रति उनकी उम्मीदें हैं कि हम हरेक इंसान के लिए सशक्त दुनिया में रहें. बराबरी का मौका और बराबरी की बुनियादी आज़ादी सबको मिले.

प्रगति सिंह (Pragati Singh), डॉक्टर

जब काबिल डॉक्टर प्रगति सिंह ने एसेक्शुअलिटी पर शोध करना शुरू किया, तो उन्हें उन महिलाओं से संदेश आने लगे जो अरेंज मैरिज की समस्याओं से जूझ रही थीं और सेक्स नहीं करना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने ऐसे लोगों को एक जगह मिलाने का काम शुरू किया जो बिना सेक्स वाले संबंध की तलाश में थे. वो अब एसेक्शुअल लोगों के लिए एक ऑनलाइन कम्युनिटी- इंडियन एसेज़, चलाती हैं. उनका कहना है कि अब समय आ गया है कि हमें अपने फ़ेमिनिज़्म में अधिक से अधिक नारीवादी चीजों को ध्यान में बिठाना होगा.

सुभालक्ष्मी नंदी (Subhalakshmi Nandi), लैंगिक बराबरी विशेषज्ञ

इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन से जुड़ीं सुभालक्ष्मी ने एशिया में लैंगिक समानता में सुधार के लिए 15 साल गुजारे. महिला किसानों के अधिकार, महिलाओं के खिलाफ हिंसा खत्म करने और महिलाओं की शिक्षा में सुधार पर उनका खास काम रहा है. उनका कहना है कि भविष्य के प्रति मेरी उम्मीद है कि महिलाएं अब और अदृश्य और नज़रअंदाज नहीं रहेंगी. खेतों, जंगलों, फैक्टरियों, सड़कों और घरों में वे जो काम करती हैं, उन्हें पहचान मिलेगी और वो सक्षम होंगी.

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परवीना अहंगर (Parveena Ahanger), भारत प्रशासित कश्मीर, मानवाधिकार कार्यकर्ता

परवीना कश्मीर की आयरन लेडी के रूप में जानी जाती हैं. कश्मीर में भारत के खिलाफ बगावत के चरम दिनों में उनका किशोरवय बेटा 1990 में लापता हो गया था. वह कश्मीर में एक हजार लापता में से एक था. इसकी वजह से परवीना ने लापता लोगों के परिजनों का एक संगठन एसोसिएशन ऑफ डिसैपियर्ड पर्सन्स (एपीडीपी) बनाया. वो कहती हैं कि उन्होंने अपने बेटे को देखने की उम्मीद नहीं छोड़ी है, अगले साल उसे लापता हुए तीन दशक हो जाएंगे.

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First published: October 16, 2019, 12:03 PM IST
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