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अबे ! जो हमने सोच लिया वही सच है

News18Hindi
Updated: April 7, 2020, 9:36 AM IST
अबे ! जो हमने सोच लिया वही सच है
सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस को लेकर आ रही अफवाहों पर एक लेख

कोरोना वायरस (Coronavirus) को लेकर वॉट्सएप और सोशल मीडिया पर तमाम अफवाहें सामने आ रही हैं, ऐसे में किसी बात पर यकीन करने से पहले उसे क्रॉसचेक जरूर करना चाहिए

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अमिताभ बच्चन और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘संजोग’ में एक किरदार है, उसकी बातें इधर-उधर करने की आदत है. जिस दफ्तर में काम करता है वहां अमिताभ क्लर्क है औऱ नायिका यानि माला सिन्हा संजोग से उसी दफ्तर में कलेक्टर के तौर पर पोस्टेड होती हैं . इन दोने की जिंदगी का एक पिछला अध्याय भी है जिसमें दोनों के बीच प्रेम था. लेकिन अमिताभ कलेक्टर की तैयारी कर रहे होते हैं तो उनकी मां को लगता है कि मेरा बेटा तो कलेक्टर बनेगा ही औऱ वो इसी फंतासी के चलते माला सिन्हा के साथ उसकी शादी से इंकार कर देती है. खैर फिल्म के नाम के अऩुरूप संजोग बनता है औऱ दोनों फिर मिल जाते हैं. खास बात ये है कि इधर उधर करने वाला किरदार उन दोनों के बीच कुछ चल रहा है इस बात को हवा भी दे देता है और दफ्तर में दोनों के रिश्ते को लेकर बात भी होने लगती है.

जबकि सब कुछ हवा में है, कोई भी इस बारे में ठोस कुछ नहीं जानता है. कहानी में एक जगह पर नायक के जन्मदिन के दिन उसकी पत्नी पूजा के लिए उसके साथ मंदिर जाती है, यहां फिर एक संयोग जुड़ता है और नायिका भी अपने बेटे के साथ उसी मंदिर में पहुंचती है. दोनों का क्षण भर के लिए आमना सामना होता है या यूं कहिए कि एक आ रहा होता है और दूसरा जा रहा होता है तो एक दूसरे से नज़र मिल जाती है बस अफवाह फैलाने वाला किरदार क्षण भर के संयोग को घटना में बदलता है औऱ दफ्तर में अपने सहयोगी को बताता है कि किस तरह आज नायक और नायिका मंदिर में मिले औऱ दोनों एक दूसरे को देखकर ठिठके, एक दूसरे को देखा फिर निकल गए. दफ्तर का वो कर्मचारी दूसरे को यही बात बताता है कि किस तरह नायक नायिका मंदिर में एक दूसरे को देखकर ठिठके, फिर आगे बढ़े. इन बातों के साथ वो ये भी बात जोड़ देता है कि – दोनों फिर रुके एक दूसरे को पलट कर देखा और आगे बढ़ गए . वो कर्मचारी अगले से कहता है लेकिन फिर एक बदलाव के साथ - आज मंदिर में नायक नायिका मिले, एक दूसरे को देखकर ठिठके, आगे बढ़े, फिर रुक कर पलटे फिर एक दूसरे के करीब आने को हुए तो नायक की पत्नी और नायिका का बेटे उन्हे खींच कर दूर ले गया.

यही बात घूम फिर कर ( आज की भाषा में कहें तो वायरल होकर ) अफवाह फैलाने वाले किरदार के पास लौटती है. वो पूरी घटना सुनता है औऱ हंस कर बोलता है ‘कमाल है,मैने तुम्हें कच्चे चावल दाल दिये थे तुमने मसाला डाल कर मुझे ही खिचड़ी खिला दी.’ अफवाह फैलाने वाला किरदार जब अपने किसी साथी को कोई बात बताता है और सामने वाला पूछता है कि ये सच है तो वो यही बोलता है कि अबे जो हमने सोच लिया वही सच है .



दरअसल ये अफवाह फैलाने वाले स्कित्जोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों जैसा व्यवहार करते हैं जो एक हेल्यूसिनेशन यानि काल्पनिक विचार को सच मानता है. और खास बात ये होती है कि जब वो उसे फैला रहा होता है तो वो उसे सच मानकर ही फैला रहा होता है इसलिए वो इतनी शिद्दत के साथ उसे आगे बढ़ाता है. ये ठीक वैसे ही होते हैं जैसे दृश्यम फिल्म में अजय देवगन औऱ उसका परिवार है जो कोई झूठ बोलते नहीं है बल्कि एक झूठ को सच मानकर उसे जीते हैं. इसलिए कोई पुलिसवाला चाह कर भी उन्हें पकड़ नहीं पाता है.



सोशल मीडिया पर फॉरवर्ड की रस्म निभाने वाले ज्यादातर लोग ऐसी ही मानसिकता वाले होते हैं, वो इसी सोच के साथ कि जो उन्होंने देखा वो सच है, उसे आगे बढ़ाते रहते हैं. कुछ लोग इतने मासूम हैं कि उन्हें तकनीक का इस्तेमाल करना तो आ गया है लेकिन तकनीक समझ नहीं आई है वो ये मान कर चलते है कि जिस तरह अखबार या न्यूज चैनल कुछ गलत नहीं दिखाता है इसी तरह सोशल मीडिया पर जो आ रहा है वो सच ही है. दरअसल वो इस तकनीक के आगे आत्मसमर्पण किए हुए लोग हैं. ये इस खेल की कमज़ोर कड़ी हैं जो घबरा कर किसी भी संदेश को आगे बढ़ा देते हैं. वो ये मान कर चलते हैं कि इससे वो अपने जानने वाले को सचेत कर रहे हैं.

कोरोना वायरस के फैलने के बाद ही देख लीजिए, जिस तरह से अलग-अलग राय-मशविरों के संदेश सच बता कर फैलाए गए हैं, वो देखने लायक है. माननीय प्रधानमंत्री ने घोषणा करते हुए कहा कि देश की सेवा करने वाले योद्धाओं के सम्मान में ताली-थाली बजाना है तो लोगों ने उसे भी महामारी से जोड़ने वाले, वायरस भगाने के पुराने टोटके के साथ जोड़ कर इस तरह पेश किया गोया मोदी जी ने कहा हो कि ताली इसलिए बजाओ क्योंकि पुराने जमाने में महामारी आने पर ऐसा किया जाता था. एक मित्र ने तो इस पर पूरी शोध भी की और शोध के बारे में विस्तार से चर्चा भी की. ये बात और है कि जो शोध वो कर रहे थे उसका परिणाम पहले से ही उनके दिमाग में था.

आगे चलकर मोदी जी ने एकजुटता की मिसाल पेश करने के लिए रुपक के तौर पर दिया जलाने की बात कही तो लोगों ने इसे भी किसी टोटके की तरह लिया. और ये सोच कर पटाखे तक फोड़ डाले कि आज तो कोरोना का अंतिम संस्कार करके रहेंगे. वॉट्सएप नामक मीडिया संस्थान में एक वीडियो तैरता हुआ मिला, जिसमें एक भद्र महिला जो ज्योतिष थी, उनका कहना था कि मोदी जी ये घोषणा 4 को भी कर सकते थे लेकिन उन्होंनें 5 को इसलिए कहा क्योंकि इसके पीछे एक ज्योतिषीय गणित है. साथ ही उन्होंने बता दिया कि जब तेल जलाएं तो उसमें कुछ चीजे डाल कर दिया जलाएं फिर देखिये कोरोना किस तरह भागता फिरेगा. हमें वीडियो भेजने वाले साथी जो पहले ही दिए के अंदर बताई गई सामग्री डालने का फैसला कर चुके थे, पूछने लगे कि क्या ऐसा कर लें, जब उन्हें मना किया गया कि ये फालतू की बात है, मोदी जी के कहने का मकसद ये है तो उन्होंने पूरे तर्क के साथ उस महिला की बात को सच साबित करने पर जोर दिया और अपनी बात को ठोस बताते हुए ये कहा दिया जला ही रहे हैं तो इतना करने में क्या बुराई है.

फिर ये इतना करने में बुराई रात में 9 बजे पटाखों के शोर के रूप में बाहर आई. निज़ामुद्दीन से निकले कुछ गैरज़िम्मेदार जमातियों ने जो कांड किया उसके बाद वॉट्सएप पर सांप्रदायिक ज़हर फैलाते वीडियों और संदेशों की बाढ़ आ गई. किसी को कुछ बोलना मुश्किल हो गया क्योंकि वो अपने साथ वीडियो का सबूत लिए घूम रहा है. एक वीडियो आया जिसमें कोई आदमी पुलिस वालों पर थूक रहा है इसे जमातियों का वीडियो बता कर खूब प्रचारित किया गया. फिर बीबीसी ने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि वो 2018 का वीडियो है जिसमें वो अपराधी पुलिस वाले पर इसलिए थूक रहा है क्योंकि पुलिसवालों ने उसके घर से आया खाना उसे खाने नहीं दिया था.

हम अपनी बात को सही साबित करने की इतनी जल्दी में है कि हम किसी बात की पुष्टि करने के लिए तर्क का सहारा तक नहीं लेना चाहते हैं. वॉट्सएप पर संदेश आता है कि मेदांता के डॉक्टर ने क्या कहा है फिर किसी शख्स की आवाज आती है कि आज रात के 12 बजे से कोरोना तेजी से फैलेगा, जिस शख्स की आवाज़ है वो शुरुआत में कह रहा है कि उसकी, इटली, जर्मनी और यहां तक कि डब्ल्यू एच ओ से बात हुई है. फिर आगे वो कहता है कि बचना है तो गर्म पानी पीजिए, हल्दी का पानी पीजिए और नमक के गरारे कीजिए. अब रात में 12 बजे कोरोना क्या घड़ी देखकर निकलेगा, डब्ल्यू एच ओ कोई आदमी है जिससे बात हो गई, औऱ आयुष मंत्रालय होता तो भी ठीक मेदांता के डॉक्टर यानि त्रेहान ऐसी सलाह क्यों देंगे. बाद में खुद मेदांता से स्पष्टिकरण आया कि वो आवाज़ डॉक्टर त्रेहान की नहीं है. लेकिन तब तक तो आवाज़ पूरे भारत में भ्रमण कर चुकी थी. इसके कुछ दिनों बाद ही फिर एक आवाज़ वॉट्सएप पर फैलती है जिसमें कहा जाता है कि अमेरिका से कॉस्मिक रेज़ निकलने वाली है रात के 12 बजे के बाद अपने फोन को दूर रखिये नहीं तो कोरोना हो जाएगा. ये वही कॉस्मिक रेज है जो पिछले दो सालों से नासा के नाम पर अलग अलग तरह से हमला करने वाली है.

मैं कहता हूं आंखों देखी -- आंखों देखी को सच मानने वाली इस एक मानसिकता वाली भीड़ के पास जब एक वीडियो पहुंचता है जिसमे दिख रहा होता है बल्कि यूं कहे कि दिखाया जाता है कि फलां शख्स बच्चे को चुरा रहा है तो आंखन देखी को सच मानने वाले उस शख्स पर पिल पड़ते हैं औऱ तब तक नहीं छोड़ते हैं जब तक वो अपनी सांस लेना नहीं छोड़ देता है . इस तरह हमने अफवाह को खबर मान लिया है. और हम उसे फॉरवर्ड करते जा रहे हैं. अहम बात ये है कि हमारे पास इस अफवाह को खबर मानने और मनवाने के वाजिब तर्क भी हैं. जिसे हम सच मानकर ही आगे बढ़ा रहे हैं.

आज से कुछ साल पहले की बात है ये तब की बात है जब सोशल मीडिया शब्द की उत्पत्ति भी नहीं हुई थी . जब कंप्यूटर कुछ लोगों की पहंच तक था और फिल्मों में डांस की कमांड चला कर दर्शकों को अचंभित किया जाता था. जब घर में फोन हुआ करते थे जिसे उठाने पर पूछना होता था कि आप कौन बोल रहे हैं. उन दिनों हमारे मोहल्ले में एक आंटी जी ने जानकारी दी कि शहर में फलानी जगह पर एक भैंस ने आदमी के बच्चे को जन्म दिया है. उनकी बात को सुनकर कुछ लोगों ने इस बात को मानने से इंकार कर दिया. उनका कहना था कि भैंस इंसान के बच्चे को जन्म दे ही नहीं सकती. आंटी जी अपनी बात को सच साबित करने पर तुली हुई थी. जब उनके तरकश के सारे तर्क खत्म हो गए तो उन्होंने आखिरी तीर छोड़ते हुए कहा कि उन्होंने खुद अपनी आंखों से देखा है. उसके बाद मोहल्ले में सब शांत थे और भैंस के इंसान का बच्चा जनने की बात ‘हो सकता है’ के साथ छोड़ दी गई थी .

सोशल मीडिया ने इस मानसिकता को और प्रबल कर दिया है . यह इस हद तक जा पहुंचा है कि आखिर सरकार को भी पहल करनी पड़ी . देखा जाए तो अगर हम थोड़ा सा धैर्य के साथ काम करें औऱ तर्क की कसौटी पर रखें तो हमें बात समझ आ सकती है कि आने वाला वीडियो कितना सच है. मसलन अगर आपके पास कोई वीडियो या ऑडियो आया जिसमें कहा गया कि आज रात से ऐसा होने वाला है, या ऐसा करें तो ऐसा नहीं होगा, या माननीय प्रधानमंत्री जी के इस कदम के पीछे ये गणित है. तो सबसे पहले ये सोचिए कि क्या किसी आधिकारिक मीडिया संस्थान ने इस बात को चलाया, आपने किसी अखबार में ऐसा कुछ पढ़ा. अपने आप आपको पता चल जाएगा कि बात में कितनी सच्चाई है. तो कच्चे चावल की खिचड़ी बनाने की उतावली में ना रहें वैसे भी हमारे यहां बीरबल की खिचड़ी वाली कहावत चलती है. जो धीमी आंच पर पकने की बात बताती है.
First published: April 7, 2020, 9:36 AM IST
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