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बेंगलुरु के मेडिकल इंजीनियर ने बनाया Cancer Device, यूएस ने दिया सक्सेसफुल का टैग

यह उपकरण, कोशिकाओं और टिश्यू के कार्य करने के तरीके को बदलने के लिए मेगनेटिक रेजोनेंस का उपयोग करता है.

ये उपकरण इन कोशिकाओं को इलाज के दौरान वसा कोशिकाओं में बदल देता है. सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने ही इस डिवाइस को डिजाइन किया है.

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    बेंगलुरु के एक मेडिकल इंजीनियर ने दावा किया है कि उनके द्वारा खोजे गए एक उपकरण को अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग (American Food and Drug Administration Department) ने सक्सेसफुल का टैग दिया है. de Scalene संस्थान के चेयरमैन डॉ. राजा विजय कुमार ने बताया कि साइटोट्रोन (Cytotron) वह उपकरण है जिसका उनके पास पेटेंट है और जो उनके निजी अनुसंधान संस्थान में विकसित किया गया है. इसी को सक्सेसफुल होने का टैग दिया गया है क्योंकि यह कैंसर कोशिकाओं के प्रसार को रोकने की क्षमता रखता है.

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    कैंसर के इलाज के तरीके को बदल सकता है
    सिर्फ इतना ही नहीं ये उपकरण इन कोशिकाओं को इलाज के दौरान वसा कोशिकाओं में बदल देता है. आपको बता दें कि सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने ही इस डिवाइस को डिजाइन किया है. उन्होंने ये भी बताया कि यह उपकरण कैंसर के इलाज के तरीके को बदल सकता है और भारत के विभिन्न अस्पतालों में जनवरी 2020 से इसका इस्तेमाल शुरू किया जा सकता है. डॉ. कुमार ने न्यूज 18 को बताया कि यह उपकरण कोशिकाओं और टिश्यू के कार्य करने के तरीके को बदलने के लिए मैग्नेटिक रेजोनेंस का उपयोग करता है.

    एक विशेष पी-53 प्रोटीन अनियमित हो जाता है
    हमारे शरीर में कोई भी कोशिका एक जीवन काल में 50 बार ही विभाजित हो सकती है और 50 विभाजन के बाद ये बंद हो जाता है. ट्यूमर सेल्स में ऐसा नहीं होता और ये लगातार विभाजित होते रहते हैं. इसलिए हम कृत्रिम रूप से एक सिग्नल देते हैं. इसके साथ ही एक विशेष पी-53 प्रोटीन अनियमित हो जाता है और कैंसर आगे बढ़ना बंद कर देता है. 30 वर्षों की रिसर्च के बाद विकसित यह उपकरण एमआरआई स्कैनर मशीन की तरह ही दिखता है. हालांकि इसमें रोटेशनल फील्ड क्वांटम न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस नामक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है.

    मरीजों के अनुसार उपकरण के प्रोग्रामिंग को तय किया जाता है
    इस तकनीक में रेडियो फ्रीक्वेंसी टूल का प्रयोग किया जाता है जो कि गोलाकार रूप से ध्रुवीकृत (polarised) होते हैं और 'fast-radio-bursts' देते हैं जो इंजीनियरिंग की मदद से विभिन्न टिश्यू के निर्माण कार्य में सहायक होता है. ये टिश्यू के अंदर मौजूद प्रोटीन के लिए काम करता है. ये कैंसर के मरीजों की जरूरत के अनुसार अपनी एक्टिविटी को सुधारता है या फिर बंद कर देता है. यदि कोई डॉक्टर कैंसर सेल्स के विकास को रोकना चाहता है या गतिविधि को बढ़ाना चाहता है, उसके अनुसार ही इस उपकरण के प्रोग्रामिंग को तय किया जाता है.  वहीं ये उपकरण ऑस्टियोआर्थराइटिस या रीढ़ की बीमारियों के रोगियों के लिए कुछ कोशिकाओं को दोबारा पैदा करता है.

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    उपचार का कोई दुष्प्रभाव नजर नहीं आया
    ये ट्रीटमेंट लगातार 28 दिनों की अवधि में किया जाता है और यह सभी ठोस कैंसर या फिर ट्यूमर के लिए प्रभावी है विशेष रूप से, लिवर, अग्न्याशय और ब्रेस्ट कैंसर (इसका इस्तेमाल ब्लड कैंसर के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि वह कोई सॉलिड ट्यूमर नहीं होता). डॉ. कुमार ने बताया कि इस उपकरण का प्रतिकूल प्रभाव देखने के लिए एक मार्केट पायलट किया गया जहां इसका कोई गलत इफेक्ट नजर नहीं आया. न तो अब तक कोई प्रतिकूल प्रभाव बताया गया है और न ही उपचार का कोई दुष्प्रभाव नजर आया है. नियामक अधिकारियों ने यूरोप, मेक्सिको, यूएस, मलेशिया और खाड़ी के कुछ देशों में इसके उपयोग को मंजूरी दे दी है. अब भारत में मंजूरी की प्रक्रिया शुरू हो गई है और संस्थान उन अस्पतालों के साथ बातचीत कर रहा है जो इस तकनीक का उपयोग करना चाहते हैं.
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