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Umair Najmi Ghazal: 'निकाल लाया हूं एक पिंजरे से इक परिंदा...' पढ़ें उमैर नजमी की बेहतरीन ग़ज़लें

उमैर नजमी की ग़ज़लें

उमैर नजमी की ग़ज़लें

Umair Najmi Special: बेहतरीन शायरों में से एक उमैर नजमी की ग़ज़लें पढ़ कर आपको शायद यही लगने लगे कि अब तक आप अपने जिन हालातों को बयान नहीं कर पा रहे थे, उनके लिए सटीक शब्द मिल गए हैं.

  • News18Hindi
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    Umair Najmi Ghazal Collection: बहुत सारे लोगों को ग़ज़ल (Ghazal) पढ़ने, लिखने या सुनने का बहुत शौक होता है. कई बार ऐसे हालातों से हम गुजर रहे होते हैं कि अपनी भावनाएं बयान नहीं कर पाते. ऐसे में हम अक्सर उनके ही ईर्द-गिर्द घूमने वाले शब्दों से बनी शायरियां, नज़्म और शेर ढूंढते हैं ताकि हमारे मन को थोड़ी देर के लिए सुकून और दर्द से राहत मिल सके.

    ‘निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा
    अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है’

    इस शेर को लिखने वाले उमैर नजमी (Umair Najmi) की रचनाओं को पढ़ कर आपको शायद यही लगने लगे कि शायद आप इन्ही लफ़्ज़ों की तलाश में थे. आइए, पढ़ते हैं बेहतरीन शायरों में से एक उमैर नजमी की चुनिंदा ग़ज़लें

    बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है
    बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है
    बचा है जो तुझ में मेरा हिस्सा निकालना है

    ये रूह बरसों से दफ़्न है तुम मदद करोगे
    बदन के मलबे से इस को ज़िंदा निकालना है

    नज़र में रखना कहीं कोई ग़म-शनास गाहक
    मुझे सुख़न बेचना है ख़र्चा निकालना है

    निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा
    अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है

    ये तीस बरसों से कुछ बरस पीछे चल रही है
    मुझे घड़ी का ख़राब पुर्ज़ा निकालना है

    ख़याल है ख़ानदान को इत्तिलाअ दे दूँ
    जो कट गया उस शजर का शजरा निकालना है

    मैं एक किरदार से बड़ा तंग हूँ क़लमकार
    मुझे कहानी में डाल ग़ुस्सा निकालना है

    खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े

    खेल दोनों का चले तीन का दाना न पड़े
    सीढ़ियाँ आती रहें साँप का ख़ाना न पड़े

    देख मे’मार परिंदे भी रहें घर भी बने
    नक़्शा ऐसा हो कोई पेड़ गिराना न पड़े

    मेरे होंटों पे किसी लम्स की ख़्वाहिश है शदीद
    ऐसा कुछ कर मुझे सिगरेट को जलाना न पड़े

    इस तअल्लुक़ से निकलने का कोई रास्ता दे
    इस पहाड़ी पे भी बारूद लगाना न पड़े

    नम की तर्सील से आँखों की हरारत कम हो
    सर्द-ख़ानों में कोई ख़्वाब पुराना न पड़े

    रब्त की ख़ैर है बस तेरी अना बच जाए
    इस तरह जा कि तुझे लौट के आना न पड़े

    हिज्र ऐसा हो कि चेहरे पे नज़र आ जाए
    ज़ख़्म ऐसा हो कि दिख जाए दिखाना न पड़े

    जहान भर की तमाम आँखें निचोड़ कर

    जहान भर की तमाम आँखें निचोड़ कर जितना नम बनेगा
    ये कुल मिला कर भी हिज्र की रात मेरे गिर्ये से कम बनेगा

    मैं दश्त हूँ ये मुग़ालता है न शाइ’राना मुबालग़ा है
    मिरे बदन पर कहीं क़दम रख के देख नक़्श-ए-क़दम बनेगा

    हमारा लाशा बहाओ वर्ना लहद मुक़द्दस मज़ार होगी
    ये सुर्ख़ कुर्ता जलाओ वर्ना बग़ावतों का अलम बनेगा

    तो क्यूँ न हम पाँच सात दिन तक मज़ीद सोचें बनाने से क़ब्ल
    मिरी छटी हिस बता रही है ये रिश्ता टूटेगा ग़म बनेगा

    मुझ ऐसे लोगों का टेढ़-पन क़ुदरती है सो ए’तिराज़ कैसा
    शदीद नम ख़ाक से जो पैकर बनेगा ये तय है ख़म बनेगा

    सुना हुआ है जहाँ में बे-कार कुछ नहीं है सो जी रहे हैं
    बना हुआ है यक़ीं कि इस राएगानी से कुछ अहम बनेगा

    कि शाहज़ादे की आदतें देख कर सभी इस पर मुत्तफ़िक़ हैं
    ये जूँ ही हाकिम बना महल का वसीअ’ रक़्बा हरम बनेगा

    मैं एक तरतीब से लगाता रहा हूँ अब तक सुकूत अपना
    सदा के वक़्फ़े निकाल इस को शुरूअ’ से सुन रिधम बनेगा

    सफ़ेद रूमाल जब कबूतर नहीं बना तो वो शो’बदा-बाज़
    पलटने वालों से कह रहा था रुको ख़ुदा की क़सम बनेगा

    (साभार- रेख़्ता)

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