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शहीद दिवस: जेल से भगत सिंह ने सुखदेव को लिखा था खत...

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Updated: March 23, 2020, 5:23 PM IST
शहीद दिवस: जेल से भगत सिंह ने सुखदेव को लिखा था खत...
सुखदेव और भगत सिंह में काफी घनिष्ठता थी और बम कांड में जानेवाले व्यक्ति को लेकर दोनों में कुछ गलतफहमी भी हुई.

सुखदेव और भगत सिंह में काफी घनिष्ठता थी और बम कांड में जानेवाले व्यक्ति को लेकर दोनों में कुछ गलतफहमी भी हुई. उसी गलतफहमी को दूर करने के लिए भगत सिंह ने सुखदेव को एक पत्र लिखा.

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  • Last Updated: March 23, 2020, 5:23 PM IST
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भारत के इतिहास में 23 मार्च की तारीख पर कई महत्वपूर्ण घटनाएं दर्ज हैं, लेकिन भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिया जाना भारतीय इतिहास में दर्ज सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है. 1931 में आज ही के दिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई थी. इस दिन को शहीद दिवस (Shaheed Diwas) के रूप में भी जाना जाता है. स्वतंत्रता आंदोलन के सिपाही भगत सिंह का जिक्र जब-जब आता है तब-तब सिर गर्व से ऊंचा हो उठता है. अपने मन में देशभक्ति की भावना जगाने और जज्बे को भरने के लिए भगत सिंह का नाम ही काफी है.

इतिहास के पन्ने आज भी इस बात की गवाही देते हैं कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु अच्छे दोस्त थे. पर सुखदेव और भगत सिंह के बीच कुछ गलतफहमी भी थी. भगत सिंह फांसी से पहले इस गलतफहमी को दूर करना चाहते थे. इसके लिए भगत सिंह ने सुखदेव को खत लिखा था. शहीद दिवस पर आइए जानते हैं आखिरकार क्या था उस खत में और क्या वजह थी सुखदेव और भगत सिंह के बीच गलतफमी की ?

विचारों की सान पर क्रांति की तलवार

सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह कलकत्ता चले गए. शहीद भगवतीचरण वोहरा की विधवा दुर्गा भाभी ने अपने छोटे बच्चे के साथ खतरे मोल लेकर भगत सिंह की कलकत्ता पहुंचने में मदद की.



इसके बाद पार्टी की दिल्ली में बैठक हुई. पब्लिक सेफ्टी बिल को असेम्बली में भारतीय सदस्यों के रद्द करने पर मार्च, 1929 में दोबारा लाया गया. यद्यपि बिल मतगणना से पास नहीं हो सकता था, तो भी वायसराय उसे आर्डिनेंस द्वारा लागू करना चाहते थे. राष्ट्रीय नेता एक बार फिर ब्रिटिश सरकार की ताकत के सामने लाचारी और अप्रभावी होने की स्थिति में पेश कर रहे थे. ऐसे समय पर लोगों की जरूरत को स्वीकारते हुए भगत सिंह ने सुझाव दिया कि असेम्बली हॉल में बम का धमाका किया जाए और क्रान्तिकारी पार्टी के विचारों से जनता को शिक्षित किया जाए. इसके लिए दो साथियों- शिव वर्मा और जयदेव कपूर को चुना गया. सुखदेव उस मीटिंग में नहीं थे. जब उन्हें इस फैसले की जानकारी हुई तो उन्होंने भगत सिंह से कुछ ऐसे सवाल किए कि पार्टी की मीटिंग दोबारा बुलाई गई. इस मीटिंग में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को असेम्बली हॉल में बम का धमाका करने के लिए चुना गया. 8 अप्रैल, 1929 को हॉल में बम का धमाका किया गया.

डॉ.जगमोहन सिंह द्वारा लिखी गई किताब भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज में छपी कहानी के मुताबिक, सुखदेव और भगत सिंह में काफी घनिष्ठता थी और बम कांड में जानेवाले व्यक्ति को लेकर दोनों में कुछ गलतफहमी भी हुई. उसी गलतफहमी को दूर करने के लिए भगत सिंह ने सुखदेव को एक पत्र लिखा. नीचे उद्धृत यह पत्र 11 अप्रैल, 1929 को सुखदेव की गिरफ्तारी के समय उनसे बरामद हुआ और मुकदमे की कार्रवाई का हिस्सा बन गया.

प्यार और बलिदान-जैसे सूक्ष्म विषयों पर भगत सिंह के विचार इस पत्र से प्रकट हुए हैं और क्रान्तिकारियों के दिलों में कितनी गहरी मानवीय भावनाएँ थीं, यह पत्र इसका भी प्रमाण है.- सं.)

सुखदेव के नाम पत्र
प्रिय भाई,

जब तक तुम्हें यह खत मिलेगा, मैं दूर मंजिल की ओर जा चुका होऊंगा. मेरा यकीन कर, आजकल मैं बहुत प्रसन्नचित्त अपने आखिरी सफर के लिए तैयार हूं. अपनी जिन्दगी की सारी खुशियों और मधुर यादों के बावजूद मेरे दिल में एक बात आज तक चुभती रही. वह यह कि मुझे अपने भाई ने गलत समझा और मुझ पर कमजोरी का बहुत ही गम्भीर आरोप लगाया. आज मैं पहले से कहीं ज्यादा पूरी तरह से सन्तुष्ट हूं. मैं आज भी महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं, बस गलतफहमी थी. गलत शक था. मेरे खुले व्यवहार के कारण मुझे बातूनी समझा गया और मेरे द्वारा सबकुछ स्वीकार कर लेने को कमजोरी माना गया. लेकिन आज मैं महसूस कर रहा हूं कि कोई गलतफहमी नहीं, मैं कमजोर नहीं, अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं.

भाई मेरे, मैं साफ दिल से विदा लूंगा और तुम्हारी शंका भी दूर करूंगा. इसमें तुम्हारी बहुत कृपालुता होगी. ध्यान रहे, तुम्हें जल्दबाजी से कोई कदम नहीं उठाना चाहिए. सोच-समझकर और शान्ति से काम को आगे बढ़ाना. अवसर पा लेने की जल्दबाजी न करना. जनता के प्रति जो तुम्हारा फर्ज है उसे निभाते हुए काम को सावधानीपूर्वक करते रहना. सलाह के तौर पर मैं कहना चाहता हूं कि शास्त्री मुझे पहले से अधिक अच्छा लग रहा है. मैं उसे सामने लाने की कोशिश करता, बशर्ते कि वह साफगोई से अपने आपको एक अंधेरे भविष्य के लिए अर्पित करने के लिए सहमत हो. उसे साथियों के नजदीक आने दो ताकि वह उनके आचार-विचार का अध्ययन कर सके. यदि वह अर्पित भाव से काम करेगा तो काफी लाभदायक और मूल्यवान सिद्ध होगा. लेकिन जल्दबाजी न करना. तुम स्वयं अच्छे पारखी हो. जिस तरह जँचे, देख लेना. आ मेरे भाई, अब हम खुशियां मना लें.

खैर, मैं कह सकता हूं कि बहस के मामले में मुझसे अपने पक्ष पेश किए बिना नहीं रहा जाता. मैं पुरजोर कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर जीवन की समस्त रंगीनियों से ओतप्रोत हूं, लेकिन वक्त आने पर मैं सबकुछ कुर्बान कर दूंगा. सही अर्थों में यही बलिदान है. यह वस्तुएं मनुष्य की राह में कभी भी अवरोध नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह इंसान हो. जल्द ही तुम्हें इसका प्रमाण मिल जाएगा. किसी के चरित्र के सन्दर्भ में विचार करते समय एक बात विचारणीय होनी चाहिए कि क्या प्यार किसी इनसान के लिए मददगार साबित हुआ है? इसका जवाब मैं आज देता हूं- हां, वह मेजिनी था. तुमने अवश्य पढ़ा होगा कि अपने पहले नाकाम विद्रोह, मन को कुचल डालने वाली हार का दुख और दिवंगत साथियों की याद- यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था. वह पागल हो जाता या खुदकशी कर लेता. लेकिन प्रेमिका के एक पत्र से वह दूसरों जितना ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया.

जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का सम्बन्ध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में एक भावना से अधिक कुछ भी नहीं और यह पशुवृत्ति नहीं बल्कि मधुर मानवीय भावना है. प्यार सदैव मानवचरित्र को ऊंचा करता है, कभी भी नीचा नहीं दिखाता, बशर्ते कि प्यार प्यार हो. इन लड़कियों (प्रेमिकाओं) को कभी भी पागल नहीं कहा जा सकता है जैसा कि हम फिल्मों में देखते हैं- वे सदैव पाशविक वृत्ति के हाथों में खेलती हैं. सच्चा प्यार कभी भी सृजित नहीं किया जा सकता. यह अपने ही आप आता है- कब, कोई कह नहीं सकता?

मैं यह कह सकता हूं कि नौजवान युवक-युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं. अपनी पवित्रता कायम रखे रह सकते हैं. मैं यहां स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि जब मैंने प्यार को मानवीय कमजोरी कहा था तो यह किसी सामान्य व्यक्ति को लेकर नहीं कहा था, जहां तक कि बौद्धिक स्तर पर सामान्य व्यक्ति होते हैं पर वह सबसे उच्च आदर्श स्थिति होगी जब मनुष्य प्यार, घृणा और अन्य सभी भावनाओं पर नियन्त्रण पा लेगा. जब मनुष्य कर्म के आधार पर अपना पक्ष अपनाएगा. एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति से प्यार की मैंने निन्दा की है, वह भी एक आदर्श स्थिति होने पर. मनुष्य के पास प्यार की एक गहरी भावना होनी चाहिए जिसे वह एक व्यक्ति विशेष तक सीमित न करके सर्वव्यापी बना दे.

मेरे विचार से मैंने अपने पक्ष को काफी स्पष्ट कर दिया है. हां, एक बात मैं तुम्हें खासतौर पर बताना चाहता हूं कि बावजूद क्रान्तिकारी विचारों के हम नैतिकता सम्बन्धी सभी सामाजिक धारणाओं को नहीं अपना सके. क्रान्तिकारी बातें करके इस कमजोरी को बहुत सरलता से छिपाया जा सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में हम तुरन्त ही थर-थर कांपना शुरू कर देते हैं.

मैं तुमसे अर्ज करूंगा कि यह कमजोरी त्याग दो. अपने मन में बिना कोई गलत भावना लाए अत्यन्त नम्रतापूर्वक क्या मैं तुमसे आग्रह कर सकता हूं कि तुममें जो अति आदर्शवाद है उसे थोड़ा-सा कम कर दो. जो पीछे रहेंगे और मेरी-जैसी बीमारी का शिकार होंगे, उनसे बेरुखी का व्यवहार न करना, झिड़ककर उनके दुख-दर्दों को न बढ़ाना, क्योंकि उनको तुम्हारी हमदर्दी की जरूरत है. क्या मैं यह आशा रखूं कि तुम किसी विशेष व्यक्ति के प्रति खुन्दक रखने के बजाय उनसे हमदर्दी रखोगे, उनको इसकी बहुत जरूरत है. तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक कि स्वयं इस चीज़ का शिकार न बनो. लेकिन मैं यह सबकुछ क्यों लिख रहा हूं? दरअसल मैं अपनी बातें स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूं. मैंने अपना दिल खोल दिया है.

तुम्हारी सफलताओं और जीवन के लिए शुभकामनाओं के साथ.
तुम्हारा,
भगत सिंह

भूख हड़ताल शुरू होने के बाद भारतीय जनता की चेतना में भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त गहरे उतरते गए. भगत सिंह के शब्दों में 'हमारा कष्ट सहना फलीभूत हुआ. सारे देश में एक जन-आन्दोलन छिड़ गया. हम अपने लक्ष्य में सफल रहे.' 13 सितम्बर, 1929 को यतीन्द्रनाथ दास 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद हो गए. जब उनका पार्थिव शरीर लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था तो हर बड़े शहर के स्टेशन पर लाखों की भीड़ उनके अन्तिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी थी. कलकत्ता में 4 लाख लोग उनके अन्तिम संस्कार में शामिल हुए.

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First published: March 23, 2020, 4:27 PM IST
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