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AIIMS की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, सबसे 'असरदार' एंटीबायॉटिक्स भी हो रहीं फेल

News18Hindi
Updated: October 22, 2019, 4:00 PM IST
AIIMS की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, सबसे 'असरदार' एंटीबायॉटिक्स भी हो रहीं फेल
1959 में कोलिस्टि एंटीबायॉटिक की खोज की गई थी. यह ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया के प्रति बहुत कारगर मानी जाती थी.

रिसर्च में यह बात सामने आई कि 22 में से 10 मरीज यानी करीब 45 फीसदी रोगियों की मौत अस्पताल में एडमिट होने के 15 दिनों के अंदर ही हो गई थी.

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  • Last Updated: October 22, 2019, 4:00 PM IST
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एम्स के ट्रॉमा सेंटर में जनवरी 2016 से अक्टूबर 2017 के बीच करीब 22 मरीजों को आखिरी विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होने वाली एंटीबायॉटिक्स कोलिस्टिन देने के बाद भी वह असर नहीं कर रहे थे. ये सभी मरीज, मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट इन्फेक्शन से पीड़ित थे, जो कि ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया के निमोनिया की वजह से फैलता है. टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार एम्स, सीएमसी वेल्लोर और अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के वैज्ञानिकों की तरफ से करवाई गई रिसर्च में यह बात सामने आई कि 22 में से 10 मरीज यानी करीब 45 फीसदी रोगियों की मौत अस्पताल में एडमिट होने के 15 दिनों के अंदर ही हो गई थी. वहीं बाकी के 12 मरीजों को बचा तो लिया गया लेकिन करीब 23 दिनों तक उन्हें अस्पताल में ही भर्ती रहना पड़ा. उन्हें बेहद पावरफुल दवाइयों के डोसेज दिए गए.

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1959 में कोलिस्टिन एंटीबायॉटिक की हुई थी खोज

1959 में कोलिस्टि एंटीबायॉटिक की खोज की गई थी. यह ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया के प्रति बहुत कारगर मानी जाती थी. हालांकि इस दवा के कुछ साइड इफेक्ट्स भी थे जिनमें किडनी फेलियर सबसे अहम था. यही कारण है कि इस दवा का इस्तेमाल बाद में बंद कर दिया गया था. इसकी जगह और ज्यादा सुरक्षित एंटीबायॉटिक्स का यूज होने लगा. हाल ही में इस दवा को दोबारा शुरू किया गया क्योंकि इन्फेक्शन का इलाज करने में कोई भी नई एंटीबायॉटिक सफल नहीं हो पा रही थी.

2 साल में कोलिस्टिन रेजिस्टेंस के 22 मामले

क्रिटिकल केयर के एक्सपर्ट डॉ. सुमित रे ने बताया कि एक ही अस्पताल में 2 साल में कोलिस्टिन रेजिस्टेंस के 22 केस साफ दर्शाते हैं कि यह मामला बहुत गंभीर बन गया है. पहले भी कई बार कोलिस्टिन रेजिस्टेंस के एक-दो मामले सामने आए थे लेकिन इतनी अधिक संख्या में मरीजों का सामने आना भारत में बढ़ते मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस की समस्या को उजागर करता है. यह बेहद चिंताजनक मामला बन गया है.

मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट इंफेक्शन को रोकने की जरूरत
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एम्स की इस स्टडी में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि सभी 22 मरीज सिर्फ एंटीबायॉटिक्स ही नहीं बल्कि कई दूसरी हाई एंड ड्रग्स जैसे- कैरबेपेनम्स, एक्सटेंडेड स्पेक्ट्रम सीफालोस्पोरिन्स और पीनिसिलिन बी लैक्टामेज के प्रति भी रेजिस्टेंट थे. इन्फेक्शन कंट्रोल एंड हॉस्पिटल एपिडोमोलॉजी नाम के जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि डॉक्टर्स, माइक्रोबायॉलिजिस्ट और पब्लिक हेल्थ ऑफिशियल्स सभी को मिलकर कार्रवाई करने की जरूरत है. ऐसा करने से ही इस मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट के इस इंफेक्शन को फैलने से रोका जा सकेगा.

एंटीबायॉटिक्स के इस्तेमाल पर हो नियंत्रण

आपको बता दें कि इंसानों के साथ-साथ जानवरों में भी एंटीबायॉटिक्स का काफी अधिक मात्रा में इस्तेमाल, इन्फेक्शन को रोकने के लिए हेल्थकेयर फेसिलिटी की कमी, साफ और सुरक्षित पेय जल की कमी और साफ-सफाई की सुविधाएं न होने की वजह से इस तरह की मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बीमारियां बहुत तेजी से फैल रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस AMR को दुनियाभर के 10 सबसे बड़े खतरों में से एक माना है. WHO ने चेतावनी दी है कि अगर हर तरह के एंटीबायॉटिक्स के इस्तेमाल पर नियंत्रण नहीं किया गया तो लोग खतरे में पड़े जाएंगे. इससे आम लोग एक बार फिर उस हालत में पहुंच जाएंगे जहां निमोनिया, टीबी और गोनिरिया जैसे इन्फेक्शन का इलाज कभी नहीं हो
पाएगा.

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खुद दवा लेकर न खाएं

वैसे तो भारत सरकार एंटीबायॉटिक्स के मिसयूज को लेकर जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रही है लेकिन देशभर में लोगों द्वारा डॉक्टर से पूछे बिना खुद दवा लेकर खाने की आदत तेजी से बढ़ रही है. कई बार डॉक्टर भी हद से ज्यादा एंटीबायॉटिक प्रिस्क्राइब कर देते हैं. देखा जाए तो कई बार डॉक्टर सीजनल सर्दी खांसी के इलाज के लिए भी हाई पावर वाली एंटीबायॉटिक प्रिस्क्राइब कर देते हैं जबकि यह बीमारी नॉर्मल वायरस से होती है.

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First published: October 22, 2019, 3:56 PM IST
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