Birth Anniversary: वे मुस्कराते फूल नहीं जिनको आता है मुरझाना, पढ़ें महादेवी वर्मा की कविताएं

महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की 'मीरा' भी कहा जाता है.

महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की 'मीरा' भी कहा जाता है.

On Birth Anniversary Of Mahadevi Verma Read Her Famous Poem- महादेवी वर्मा ने बचपन से ही मीराबाई, सूरदास और तुलसीदास जैसे महान साहित्यकारों की रचनाओं को गुनगुनाना शुरू कर दिया था. केवल 7 साल की कच्ची उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं.

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  • Last Updated: March 26, 2021, 6:51 AM IST
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On Birth Anniversary Of Mahadevi Verma Read Her Famous Poem- आज 26 मार्च को मशहूर कवियत्री महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) का जन्मदिन है. महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की 'मीरा' भी कहा जाता है. महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च साल 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था. उन्हें हिंदी छायावाद कविता जगत के प्रमुख चार स्तंभों में से एक माना जाता है. उन्होंने बचपन से ही मीराबाई, सूरदास और तुलसीदास जैसे महान साहित्यकारों की रचनाओं को गुनगुनाना शुरू कर दिया था. केवल 7 साल की कच्ची उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी हायर एजुकेशन पूरी की. महाकवि निराला उन्हें सरस्वती कहा करते हैं. आज महादेवी वर्मा के जन्मदिन पर हम रेख्ता के साभार से लेकर आए हैं उनकी कुछ मशहूर कविताएं...

1. वे मुस्कराते फूल नहीं

जिनको आता है मुरझाना

वे तारों के दीप नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना

वे नीलम के मेघ नहीं

जिनको है घुल जाने की चाह



वह अनंत ऋतुराज नहीं

जिसने देखी जाने की राह

वे सूने से नयन नहीं

जिनमें बनते आँसू मोती

यह प्राणों की सेज नहीं

जिसमें बेसुध पीड़ा सोती

ऐसा तेरा लोक वेदना

नहीं नहीं जिसमें अवसाद

जलना जाना नहीं नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद

क्या अमारों का लोक मिलेगा

तेरी करुणा का उपहार

रहने दो हे देव अरे

यह मेरा मिटने का अधिकार.

2. दीप मेरे जल अकम्पित,

घुल अचंचल!

सिन्धु का उच्छवास घन है,

तड़ित, तम का विकल मन है,

भीति क्या नभ है व्यथा का

आँसुओं से सिक्त अंचल!

स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,

मीड़, सब भू की शिरायें,

गा रहे आंधी-प्रलय

तेरे लिये ही आज मंगल

मोह क्या निशि के वरों का,

शलभ के झुलसे परों का

साथ अक्षय ज्वाल का

तू ले चला अनमोल सम्बल!

पथ न भूले, एक पग भी,

घर न खोये, लघु विहग भी,

स्निग्ध लौ की तूलिका से

आँक सबकी छाँह उज्ज्वल

हो लिये सब साथ अपने,

मृदुल आहटहीन सपने,

तू इन्हें पाथेय बिन, चिर

प्यास के मरु में न खो, चल!

धूम में अब बोलना क्या,

क्षार में अब तोलना क्या!

प्रात हंस रोकर गिनेगा,

स्वर्ण कितने हो चुके पल!

दीप रे तू गल अकम्पित,

चल अंचल!
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