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जन्मदिन विशेष: महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपनी यात्रा संस्मरण कृतियों से आज भी जीवित, घुमक्कड़ के नाम से थे मशहूर

News18Hindi
Updated: April 9, 2020, 1:57 PM IST
जन्मदिन विशेष: महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपनी यात्रा संस्मरण कृतियों से आज भी जीवित, घुमक्कड़ के नाम से थे मशहूर
सांकृत्यायन का मानना था कि सामंतवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ को तोड़े बिना किसानों की दशा नहीं सुधारी जा सकती.

हिंदी साहित्य को अपनी कृतियों से समृद्ध करने वाले राहुल सांकृत्यायन ने सृजन के साथ-साथ प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य चिंतन को पूर्ण रूप से आत्मसात कर मौलिक दृष्टि देने का प्रयास किया.

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हिंदी के मशहूर साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन का आज जन्मदिन है. उनका असली नाम केदार पांडेय था. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पन्दहा ग्राम में 9 अप्रैल, 1893 को हुआ था. हिंदी साहित्य में विशेष योगदान के लिए उन्हें महापंडित की भी उपाधि प्रदान की गई थी. उन्हें हिंदी, संस्कृत, पाली, भोजपुरी, उर्दू, पर्शियन, अरेबिक, तमिल, कन्नड़, तिब्बयन, सिंहलेसे और रशियन भाषाओं सहित 36 भाषाओं की जानकारी थी. इसके बाद भी सांकृत्यायन वास्तविक ज्ञान के लिए गहरे अंसतोष में थे. इसी अंसतोष को पूरा करने के लिए वह हमेशा तत्पर रहे.

हिंदी साहित्य को अपनी कृतियों से समृद्ध करने वाले राहुल सांकृत्यायन ने सृजन के साथ-साथ प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य चिंतन को पूर्ण रूप से आत्मसात कर मौलिक दृष्टि देने का प्रयास किया. 15 साल की उम्र में उर्दू माध्यम से मिडिल परीक्षा पास कर वह आजमगढ़ से काशी आ गए. यहां उन्होंने संस्कृत और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया और वेदान्त के अध्ययन के लिए अयोध्या पहुंच गए. अरबी की पढ़ाई के लिए वह आगरा गए तो फारसी की पढ़ाई के लिए लाहौर की यात्रा की.

उनके उपन्यास और कहानियों के साथ ही उनकी यात्रा संस्मरण कृतियों ने नए दृष्टिकोण को सामने रखा. यायावर के रूप में उनके यात्रा काल में उन्होंने हजारों ग्रंथों को पुर्नजन्म दिया और संग्रहित किया. वह स्वतंत्रता आंदोलन के सिपाही के रूप में सक्रिय रहे. उन्होंने किसान सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके अलावा उन्होंने जनसंघर्षों का भी नेतृत्व किया. वह इसके लिए जेल भी गए.



सांकृत्यायन का मानना था कि सामंतवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ को तोड़े बिना किसानों की दशा नहीं सुधारी जा सकती. 1921 में वह महात्मा गांधी के साथ जुड़ गए. इस बीच उन्होंने अपने व्याख्यानों, लेखों और पुस्तकों से पूरी दुनिया को भारत से बाहर बिखरे बौद्ध साहित्य से परिचित कराया. 1927-28 तक श्रीलंका में उन्होंने संस्कृत शिक्षण का कार्य किया.



किसान उन्हें इतने प्रिय थे कि जब भी वह स्वदेश में होते किसान आंदोलन में भाग लेना नहीं भूलते थे. हालांकि साल 1931 में वे एक बौद्ध मिशन के साथ वह यूरोप की यात्रा पर चले गए. 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा छेड़े गए 'भारत छोड़ो आंदोलन' में शामिल होने के लिए वह स्वदेश लौट आए लेकिन उन्हें पकड़ कर जेल भेज दिया गया. घुमक्कड़ पंथ के महान समर्थक सांकृत्यायन 1959 में दर्शनशास्त्र के महाचार्य के नाते एक बार फिर श्रीलंका गए, पर 1961 में उनकी स्मृति खो गई. इसी दशा में 14 अप्रैल, 1963 को उनका देहांत हो गया.

राहुल सांकृत्यायन की प्रमुख कृतियां
साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण, त्रिपिटिकाचार्य, महापंडित उपाधि प्राप्त राहुल सांकृत्यायन ने अपने जीवनकाल में धर्म, दर्शन, लोकसाहित्य, यात्रा साहित्य, इतिहास, राजनीति, जीवनी कोष आदि विषयों पर कृतियों की रचना कर प्राचीन ग्रंथों का संपादन किया. उनकी प्रमुख कृतियां है- वोल्गा से गंगा, जय यौद्धेय, भागो नहीं दुनियां को बदलो, मधुर स्वप्न, राजस्थान निवास, विस्मृत यात्री, दिवोदास, मेरी जीवन यात्रा, सरदार पृथ्वीसिंह, नए भारत के नए नेता, बचपन की स्मृतियां, अतीत से वर्तमान, स्तालिन, लेनिन, मेरे असहयोग के साथी, किन्नर देश की ओर, चीन में क्या देखा, मेरी तिब्बत यात्रा, घुमक्कड़ शास्त्र आदि.

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First published: April 9, 2020, 1:53 PM IST
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