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Birthday Special: लेखिका शिवानी की कहानी ‘ठाकुर का बेटा’

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Updated: September 17, 2019, 6:51 PM IST
Birthday Special: लेखिका शिवानी की कहानी ‘ठाकुर का बेटा’
विशाल दीवानखाने में मसनद लगाकर बैठे ठाकुर हयातसिंह ने सुवासित तम्बाकू का कश खींचकर, त्रिपुंडधारी पंडितजी से बड़े मीठे स्वर में कहा, डरो नहीं पांडेज्यू, जो लिखा है कुंडली में बतला दो एकदम।

विशाल दीवानखाने में मसनद लगाकर बैठे ठाकुर हयातसिंह ने सुवासित तम्बाकू का कश खींचकर, त्रिपुंडधारी पंडितजी से बड़े मीठे स्वर में कहा, ''डरो नहीं पांडेज्यू, जो लिखा है कुंडली में बतला दो एकदम।''

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  • Last Updated: September 17, 2019, 6:51 PM IST
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महिला कथाकारों में जितनी ख्याति और लोकप्रियता शिवानी ने प्राप्त की है, वह एक उदाहरण है श्रेष्ठ लेखन के लोकप्रिय होने का. शिवानी लोकप्रियता के शिखर को छू लेनेवाली ऐसी हस्ती हैं, जिनकी लेखनी से उपजी कहानियां कलात्मक और मर्मस्पर्शी होती हैं. अन्तर्मन की गहरी पर्तें उघाड़ने वाली ये मार्मिक कहानियां शिवानी की अपनी मौलिक पहचान है जिसके कारण उनका अपना एक व्यापक पाठक वर्ग तैयार हुआ.

कहानी : ठाकुर का बेटा

विशाल दीवानखाने में मसनद लगाकर बैठे ठाकुर हयातसिंह ने सुवासित तम्बाकू का कश खींचकर, त्रिपुंडधारी पंडितजी से बड़े मीठे स्वर में कहा, ''डरो नहीं पांडेज्यू, जो लिखा है कुंडली में बतला दो एकदम।'' "महाराज, कैसे कहूं, विचित्र जोग बना है कुंडली में.'' पंडितजी ने अनेक त्रिकोण-षट्कोणों के जाल में उलझकर कहा, ''पुत्र-योग प्रबल है; किन्तु..'' कहकर बेचारे ने विवश दृष्टि से चारों ओर देखा, जैसे उसे किसी की उपस्थिति का सा भय हो रहा था। ''कहो-कहो; पुरोहितजी, निश्चिन्त रहो। सिवाय दीवारों के यहाँ कोई नहीं है। '' हयातसिंह गुड़गुड़ी छोड़कर बैठ गए। ''महाराज, पुत्र होगा, किन्तु आपकी इन दोनों पत्नियों से नहीं, एक और विवाह करना होगा आपको, सुलक्षणी कन्या की गृहस्थिति विशेष रूप से देखनी होगी- एक बात और भी बड़ी विचित्र है...''कहकर पंडितजी गहरे ध्यान में डूब-से गए।

''क्या?'' कहकर ठाकुर ने उचककर पंडितजी के दोनों पैर पकड़ लिए। पुत्र-प्राप्ति की भविष्यवाणी से उनकी लटकी मूँछें तक सतर हो गईं. ''पुत्र आपका वन-विहारी ही रहेगा, महाराज। आपके राजमहल का सुख आप ही भोगेंगे, हरि इच्छा, हरि इच्छा.'' कहकर पंडितजी ने पोथी-पतरे एक ओर खिसका दिए।

थोड़ी देर को हयातसिंह कुछ सोच में डूब-से गए। सहसा जोर से हसकर उन्होंने पंडितजी की पीठ में कसकर थप्पड़ मारा, ''वन-विहारी नहीं बनेगा, तो काम कैसे चलेगा? हयातसिंह के कत्थे का ठेका, चीड़ का ठेका, फिर कुमाऊँ के ओर-छोर तक फैले चाय के बगीचों की माया को क्या राजमहल में बैठकर सम्हालेगा? क्या बात कह गए हो लाख की गुरु! देखो पंडित, तुम्हारी गणना सच निकली, तो तुम्हारी बामणी को सिर से पैर तक सोने से मढ़ दूँगा- समझे!'' अपनी नीलम की अँगूठी उन्होंने पंडितजी की अँगुली में पहना दी- ''लो गुरु, यह रहा तुम्हारा बयाना।''

आशीर्वाद देकर पंडितजी चले गए, तो हयातसिंह का समस्त उत्साह ठंडा पड़ गया। चौथेपन में तीसरी शादी! दुनिया क्या कहेगी, बेटियों के बेटे हो गये थे, दामादों से मुँह छिपाकर सेहरा कैसे बाँधेगा? फिर उसकी पतिव्रता पत्नियों का राधा-रुक्मनी का जोड़ा, जिन्होंने कभी सौतों का रिश्ता नहीं माना, सगी बहनों में भी ऐसा प्रेम नहीं होता। कौन कहता है एक मियान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं! छोटी ठकुरानी चन्द्रा कहती- ''खूब रह सकती हैं, बशर्ते मियान भी मखमली हो।'' सचमुच ही हयातसिंह के दिल की मियान मखमली ही थी, एक को वह पन्द्रह तोले का चन्द्रहार बनवा देते, तो दूसरी के लिए भी पन्द्रह ही तोले का हार बनता। राई-रत्ती कम नहीं। उनके हाथीदन्त छप्परखट के अगल-बगल, सोलह शृंगार किए दोनों ठकुरानियाँ ईर्ष्या-द्वेष के सारे हथियार डालकर, लेट रहतीं।

हयातसिंह को किसी से न तो अधिक दुराव था, न अधिक प्रेम। नाप-तौलकर दोनों को प्रेम की मदिरा ऐसी नियत मात्रा में देते थे कि दोनों छककर पड़ी रहतीं। ‘हयातकोट’ की छटा भी किसी राजप्रासाद से कम नहीं थी। कहते थे कि ठाकुर ने सीमेंट और गारे के स्थान पर उड़द की दाल पिसवाकर बिछवा दी थी, जयपुर के कारीगरों का बनाया वह अभेद्य दुर्ग, कुमाऊँ की वनस्थली का एक अनोखा शृंगार-मुकुट था। डूबते सूर्य की रक्तिम आभा में चारों ओर से गिरि-शिखरों से घिरी हयातसिंह की उस मायापुरी की शोभा वास्तव में दर्शनीय हो उठती। एक-से-एक आधुनिक कलाकृतियों के अतिरिक्त, उनके प्रवेश-द्वार पर एक वीनस की मूर्ति बना हाथी-दाँत का फौवारा था, जिसके कस्तूरीमिश्रित सुवासित जल का ही खर्चा चार सौ रुपये माह था, किन्तु ठाकुर हयातसिंह किस्मत के ही नहीं, दिल के भी बादशाह थे, रुपया उनके हाथ का मैल था, दौलत उनकी हाथ बाँधे खड़ी बाँदी थी।दोनों पत्नियों से उनकी चार लड़कियाँ हुईं, चारों को उन्होंने एक-से-एक अच्छे खाते-पीते घरों में ब्याह दिया था। आज तक वे चैन की नींद ही सोते थे, किन्तु पंडितजी की गणना ने उन्हें अशान्त कर दिया। दोनों ठकुरानियों ने पति की अशान्ति भाँप ली- ''सुनती हो, लक्षण ठीक नहीं हैं,'' छोटी ने कहा। ''क्यों नहीं बहन, सब समझती हूँ, आया था ना दाढ़ीजार पंडित, सिखा गया होगा कुछ।'' उधर बेचारे हयातसिंह के जीवन के पैंतालीस वर्षों में ऐसी विकट रातें कभी नहीं बीती थीं, इधर करवट लेते तो दिखती बड़ी पत्नी सावित्री, जिसके गोल-गोल चन्द्रमा के थाल-से मुँह पर निष्कपट प्रेम की आभा थी, छाती पर सौत बिठाने पर भी जिसने कभी पति का तिरस्कार नहीं किया था। उधर करवट बदलते तो दिखती पुष्ट यौवन से गदराई चन्द्रिका, जिसकी तिब्बती माँ के सौन्दर्य ने उसे मछली-सी आँखें उपहार में दी थीं, उन तिरछे कटाक्षों में वारांगना का विलास था, उसके सलीके से पहने गये मखमली घाघरे के आठ-आठ पाटों की मनमोहक घुरनियों ने हयातसिंह को बाँध लिया था।

दोनों पत्नियों के प्रेम के अमृत कलशों को क्या वह लात मारकर गिरा दें? किन्तु पितरों के प्रति भी उनका कुछ कर्त्तव्य है- कुमाऊँ के राजपूत के लिए पुत्र के बिना निरबंसिया जीने से मौत भली है, मन पक्का कर उन्हें विवाह करना ही होगा। पंडितजी ने गणना ही नहीं की, कन्या भी ढूँढ़ दी। मुक्तेश्वर की घाटी में एक आलू का ठेकेदार था रामसिंह। उसकी पहली पत्नी से एक पुत्री थी हंसा, विमाता उसे बैल की तरह काम में जोते रहती, किन्तु दिन-रात परिश्रम की अग्नि में झोंकने पर भी छोकरी का रूप फटा पड़ता था। रामसिंह भी पंडितजी का ही जजमान था और एक दिन बिना किसी आडम्बर के ही ठाकुर उसे ब्याह लाए। साबी और चन्द्रा ने डोली देखी और दोनों पिछवाड़े भागकर एक-दूसरे से लिपटकर घंटों रोती रहीं, जैसे उनका सुहाग उजड़ गया हो।

आलू के ठेकेदार की कन्या का सौन्दर्य देसी उस्तरे की धार की ही भाँति तीखा था। आते ही उसने अपना कमरा अलग कर लिया, हयातसिंह दिन-रात चाय के बगीचों में भटकते। अब वह भी साथ जाती। गहनों की तिजोरी की चाबी उसने अपनी पतली-सी कमर में लटका ली। दो नशीली आँखोंवाली नेपाली दासियाँ थीं- शिवकली और रामकली। दोनों ही ठाकुर साहब के बहुत मुँहलगी थीं, अकारण ही वे उनके कमरे के चक्कर लगातीं- कभी पान लेकर, कभी सिगरेट जलाने के बहाने उन पर गिरी पड़तीं। हंसा ने चौथे ही महीने दोनों को छुट्टी दे दी और अपने मायके से दो बूढ़ी बदसूरत ठकुरानियाँ ले आई। एक विधवा ताल्लुकेदारनी और उनकी सुन्दरी पति-परित्यक्ता पुत्री नीलम, ठाकुर साहब के क्लब की सहचरी थीं। उनकी जमी जड़ों को साबी और चन्द्रा के सतीत्व का तेज भी नहीं उखाड़ सका था पर हंसा ने अपनी एक ही आग्नेय दृष्टि से उन्हें भस्म कर दिया।

एक दिन दोनों आईं, तो हंसा ने पुत्री के कटे बालों को खींचकर, उसके लिपस्टिक-रंजित चेहरे पर कसकर तमाचा खींच दिया- ''खबरदार जो आज से यहाँ देखा, कोठे में क्यों नहीं बैठ जातीं?'' इस प्रकार हवा और तूफान से लड़ती हंसा पति के हृदय-प्रासाद के प्रत्येक कपाट पर सावधानी से अर्गला लगाकर स्वयं एकछत्र साम्राज्ञी बनकर बैठ गई। ठाकुर नयी ठकुरानी के चरणों के दास बन गये थे, फिर ईश्वर ने उनकी आशा की बेल हरी कर दी थी। हंसा के रसीले होंठों पर पपड़ियाँ जम गयी थीं; जिसकी एक-एक बोटी फड़कती थी, वह अब अलस होकर घंटों सोती रहती, खाने में उसे अरुचि हो गयी थी, कभी वह हिरन के भुने गोश्त खाने को मचलती, कभी कच्ची मूलियाँ ही चबा डालती।

विवाह को साल-भर हो गया था। इस एक वर्ष में साबी और चन्द्रा भी मुलायम पड़ गयी थीं। सौत ही क्यों न हो, थी तो छोरी अपनी ही बिटियाओं के उम्र की। एक कहती, ‘ऐसे मत उछल, नवाँ महीना लग गया है।’ दूसरी कहती, ‘हाय-हाय, ऐसे में शहद कौन चाटता है?’ सौतों के स्नेहपूर्ण प्रतिबन्धों में बँधकर हंसा निहाल हो गयी। विमाता की ताड़ना ने उसके सुनहरे बचपन में विष घोल दिया था, दोनों सौतों के अप्रत्याशित स्नेह से सब विष धुलकर बह गया। उन्हीं के प्रेम के विमल नीर में वह डुबकियाँ लगा रही थी कि पाँसा पलट गया। हयातसिंह के तराई के खेतों में जंगली हाथियों के एक दल ने महा उत्पात मचा दिया था। हंसा पूरे महीनों से थी, किन्तु उन्हें छोड़कर जाना ही पड़ा। साँझ हो गयी थी, तीनों फौव्वारे की छटा निहार रही थीं। ''दिज्यू, तबियत घबड़ा रही है, भीतर चलिए'' हंसा ने बड़ी सौत के गले में हाथ डालकर प्यार से कहा।

''चल मरी, तेरी तो एक दिन ही में तबियत घबरा गई, हमसे तो सालों बिछुडे़ रहे, फिर भी हमने एक लम्बी साँस भी नहीं खींची- क्यों री चन्द्रा...?'' सावित्री ने हँसकर कहा, ''और क्या!'' चन्द्रा फौव्वारे की धारा में हाथ डुबाकर खेल रही थी, ''पर ये ठहरीं पटरानी दिज्यू- है ना हंसी!'' ''नहीं दीदी, सच हल्का-हल्का दर्द उठ रहा है, आप दाई को बुलवा लीजिए'', हंसा का स्वर सचमुच रुँआसा हो गया- ''हाय-हाय, वे भी नहीं हैं,'' साबी ने घबराकर कहा, दूसरे ही क्षण उसने देखा, चन्द्रा का चेहरा जर्द पड़ गया था और वह उसे इशारे से कुछ दिखा रही थी। साबी भय से स्तब्ध रह गयी। न जाने कहाँ से घने अन्धकार को चीर एक महादानव की आकृति उनके बीच खड़ी थी। पूरे शरीर पर बड़े-बड़े काले बाल और छाती पर सफेद बालों का चौकोर धब्बा- भयानक भालू खड़ा था। सहसा बचपन में सुनी एक-एक कहानियाँ हंसा को याद हो आईं। कुमाऊँ का जंगली भालू, नासिका-लोलुप ही नहीं, नारी-लोलुप भी होता है।

अपनी अंगारे-सी आँख को घुमा-घुमाकर उसने तीनों के रूप-यौवन को परखा और फिर चीखती हंसा को बाँहों में भरकर कद्दावर डंगे भरता अन्धकार में खो गया। अर्द्धमूखच्छत-सी चन्द्रा और साबी भय से विक्षिप्त-सी हो गयी थीं। उन्हें चीखने का भी अवकाश नहीं मिल पाया था। ‘हयातकोट’ के सुरक्षित दुर्ग में, जहाँ प्रवेश-द्वार पर सदैव एक गुरखा चौकीदार दुनाली लिए खड़ा रहता था, न जाने वह भालू किस दीवार को फाँदकर आ गया था! रात ही को हयातसिंह अपनी जीप भगाकर आ गये। कुमाऊँ के इतिहास में ऐसी अनहोनी घटना कभी नहीं घटी थी। ठाकुर हयातसिंह ने कुमाऊँ के जंगल छनवा दिए, किन्तु गहन वनों की अभेद्य दुर्गमता को चीरना आसान नहीं था। हंसा कहीं नहीं मिली। कुछ माह पहले यह घटना घटी होती, तो उसकी दोनों सौतें, शायद घी के दीये जलातीं, किन्तु आज उसी सुन्दरी सौत का बिछोह उन्हें असहाय हो उठा।

धीरे-धीरे दस वर्ष एक व्यर्थ प्रतीक्षा में बीत गए। हयातसिंह ने सब शौक त्याग दिये। क्लब की माया छूट गई, कभी इक्के-दुक्के एक-आध पेग चढ़ा लेते। पहले बोटी के बिना गस्सा नहीं तोड़ते थे, अब उसी चौके में प्याज भी नहीं कटता। दस वर्षों में भी वे अपनी सुन्दरी पत्नी की स्मृति को भुला नहीं पाए थे। एक दिन वे बहुत दिनों से जंग-लगी अपनी दुनाली को साफ कर रहे थे, रात बहुत हो गयी थी। उनकी दोनों पत्नियाँ जब सो गयीं, तो वे चुपचाप बन्दूक लेकर गोल कमरे में आ गये थे। द्वार खटका, उन्होंने खोला तो देखा, गुमान खड़ा था। गुमानसिंह, हयातसिंह से वयस में बहुत छोटा होने पर भी उनका अंतरंग मित्र था। ठाकुर हयातसिंह के विवाह होने से पूर्व हंसा से उसके विवाह का प्रसंग भी चला था और उस प्रस्तावित रिश्ते को लेकर कभी-कभी दोनों मित्रों में रसिक छींटाकशी भी चलती थी; किन्तु हयातसिंह से हंसा का विवाह हो जाने पर भी दोनों की मैत्री सुदृढ़ थी।

हयात की दोनों पत्नियों को वह भौजी कहकर पुकारता, पर हंसा से कहता हंसी। ''कुछ भी कहो हयात, आलू के ढेर में पड़े इस हीरे को पहले मैंने ही देखा, पर झपट्टा मारकर तुम ले गए।'' हंसा लाल पड़ जाती। उसके गाँव में वह शिकार खेलने अक्सर आता था और कभी उस छैल-छबीले जवान ने उसकी भूख-प्यास ही हर ली थी। रिश्ते मे वह उसकी विमाता का चचेरा भाई था। वह प्रायः शिकार खेलने आता और उन्हीं के घर टिकता। हंसा कभी उससे खाली कारतूस माँगती, तो वह हँसकर कहता, ''मामा क्यों नहीं कहती मुझे? मामा कहेगी, तब दूँगा।'' कहूँ? तुम मामा होते, तो कहती भी।'' वह शैतानी से मुस्कराकर कहती। ''तो क्या हूँ री मैं तेरा?'' कहकर उसने एक दिन उसकी चोटी इतनी जोर से खींच दी कि वह खिंचती स्वयं उसकी छाती पर ही आ गिरी थी- ''मैं तुझे अपनी मंगेजे (सगाई) के लिए माँग लूँगा हंसा, विद्या कसम, इसी इतवार को आऊँगा।'' वह कह गया था। पर इतवार के पहले आता था शनि और शनीचर के दिन ही पांडेज्यू उसे ठाकुर हयातसिंह के लिए माँग ले गये।

हयातसिंह था लाखों का मालिक, गुमानसिंह था एक सामान्य-सा ठेकेदार। विवाह होने के पश्चात उसने गुमानसिंह को अपने यहाँ हयातसिंह से हँसते-बोलते देखा, तो भय हुआ कि कहीं ईर्ष्यावश वह उसकी कारतूस-याचना का भेद न खोल दे, पर उसकी अलमस्त हँसी सुनती, तो उसका भय बह जाता। अपने वैभव में भी वह उसके उदास चेहरे को भूल नहीं पाती। हंसा के खो जाने के बाद भी वह प्रायः तराई से चला आता था। पर आज इतनी रात को उसे देखकर ठाकुर अवाक् रह गये- ''गुमान, इतनी रात को कैसे चले आये?'' उन्होंने अपनी बन्दूक नीचे रख दी। ''मैंने आज एक अजब नजारा देखा हयात- सोचा, तुमसे नहीं कहूँगा, तो पागल हो जाऊँगा।'' उसके रूखे बाल बिखरे और चेहरा जरा-सा निकल आया था।
''क्या बात है गुमान, बैठो, लो थोड़ी-सी बै्रंडी लो।'' कहकर ठाकुर ने अपने शेल्फ से बोतल निकाली, एक साँस में ब्रांडी घुटककर गुमान ने हयात के कंधे पर हाथ रक्खा।

''हयात,'' बहुत धीमी आवाज में वह बोला, ”मैंने आज तुम्हारे बेटे को देखा।'' ''पागल हो गये हो क्या, या निरी जिन चढ़ाकर आये हो?'' हयातसिंह ने आश्चर्य से अपने मित्र की ओर देखा- ''नहीं हयात, गंगा की सौं, सिर से पैर तक तुम्हारा बेटा, पक्के ठाकुर का बेटा! आज देवलधार के जंगल से होकर आ रहा था। देखता क्या हूँ कि एक भयानक भालू चला आ रहा है। पीछे-पीछे चार हाथ-पैर टेकता राजकुमार-सा एक नौ-दस साल का बच्चा। हंसा को उसने मारकर फेंक दिया, पर इस चाँद के टुकड़े को नहीं मार सका...'' ''कैसे कह रहे हो कि हंसा को मार दिया?'' क्रोध और अविश्वास से ठाकुर का स्वर झुँझला उठा- जैसे अभी भी वह अपनी प्रेयसी की मृत्यु को अफवाह रूप में ही सुनना चाहते थे।

''तो सुनो हयात, आज नहीं, उसने हंसा को उसी दिन मार दिया था। कह नहीं सकता कि अभागिनी की मृत्यु उस दानव भालू के हाथों हुई या गहन अन्धकार से घिरे जंगल में प्रसव-वेदना ने उसके प्राण लिये। जब तुम कुमाऊँ के जंगल छनवा रहे थे, मैं भी स्वयं रात-रात मशाल लेकर कोना-कोना छान रहा था। तीसरे ही दिन देवलधार के जंगल खून से लथपथ उसकी लाश मुझे मिली थी। जंगल की लकड़ियाँ जुटाकर मैंने उस चन्दन-सी काया का दाह किया। तुमसे नहीं कहा हयात, इसलिए कि तुमसे पहले मैंने ही उसे प्यार किया था। जिसकी जीवित काया को पाने के लिए मैं तरसता रहा; उसकी निष्प्राण देह पर भी मेरा उतना ही मोह था, उसे छाती से लगाकर मैं रात-भर बैठा रहा। प्रातः होने से पूर्व ही एक तीव्र दुर्गन्ध से मैं तटस्थ हुआ। सूरज उगने से पहले ही मैंने उसकी चिता रचा दी। जिस अग्नि में मैं झुलसता आया था, उसी में तुम्हें भी झुलसाने का मेरा न जाने कैसे बचपना था। सुनो हयात, मन का पाप कह देने पर पाप नहीं रहता- मैंने उसे बहुत प्यार किया था और तुम हमारे बीच न आते, तो शायद वह भी मुझे बहुत प्यार करती। अब वह नहीं रही हयात, पर उसके बेटे को- तुम्हारे बेटे को छुड़ाकर लाना ही होगा।''

हयातसिंह फटी-फटी आँखों से उसे देख रहे थे, जैसे अनहोनी घटना को वे किसी प्रकार भी स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। ''चलो हयात, सोच क्या रहे हो, बड़ी चतुरता से ही गोली चलानी होगी। बच्चा उसके पीछे सटकर रहता है। उस दिन तेंदुए पर तुम्हारा निशाना काँप गया। तुम बच्चे को पकड़ना, मैं ही गोली चलाऊँगा-'' वह पागलों की तरह बकता जा रहा था- ''निशाना चूका, तो कहीं के नहीं रहेंगे हयात, बन्दूक छीन लेता है भालू, चलो-चलो, देर मत करो...'' चुपचाप दोनों बन्दूकें लेकर पिछवाड़े से दीवार फाँदकर चोरों की भाँति निकल गये। साबी-चन्द्रा जग जातीं, तो तूफान मचा देतीं- ‘इतनी रात को शिकार, वह भी भालू का...!’ ग्राम का थोकदार धरमदेव लुटिया लेकर दिशा-जंगल जा रहा था, सहसा वह धमककर खड़ा रह गया। देवलधार की जानलेवा चूने की चट्टान से दो टूटी चट्टानें-सी लुढ़कती चली आ रही थीं। पीछे-पीछे दो काली लकड़ियाँ। निकट आने पर उसने देखा, वे चट्टानें नहीं, गुमान और हयातसिंह की क्षत-विक्षत देह थीं और काली लकड़ियाँ थीं, निर्ममता से तार की भाँति तोड़ी-मरोड़ी दो बन्दूकें। गुमानसिंह का चेहरा नुचे मांस से बीभत्स बन गया था और उसमें प्राण के कोई चिन्ह नहीं थे, किन्तु ठाकुर हयातसिंह की साँस थोड़ी-थोड़ी चल रही थी। धरमदेव भागकर सबको बुला लाया। लादकर उन्हें हयातकोट ले गये। मुख में गंगाजल की बूँदें डालकर साबी और चन्द्रा ने उनके होंठों के पास कान सटा लिये। रक्त से सने, सूजे होंठ, बुदबुदाए, ''ठीक कह रहा था गुमान- ठाकुर का बेटा है, ठाकुर का।'' और लहूलुहान शरीर निष्प्राण पड़ गया।

पुस्तक : लाल हवेली
लेखिका : शिवानी
विधा : कहानी
प्रकाशन : राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्य : 125/-
पृष्ठ संख्या : 121

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First published: September 17, 2019, 6:51 PM IST
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