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पुस्तक अंश- अरे यायावर रहेगा याद- यात्रा सिर्फ व्यक्ति की नहीं रास्ते की भी होती है

News18Hindi
Updated: April 1, 2020, 1:09 PM IST
पुस्तक अंश- अरे यायावर रहेगा याद- यात्रा सिर्फ व्यक्ति की नहीं रास्ते की भी होती है
क्या सोच कर तुम ने अपने मरण-स्वर्ग के लिए वह स्थल चुना था, औरंगज़ेब!

कोई भी यात्रा मात्र व्यक्ति की यात्रा नहीं होती. अगर वह जिस रास्ते पर चल रहा है वह रास्ता भी यात्रा में शामिल है तो और रास्ते शामिल हैं तो क्या कुछ नहीं शामिल. ‘अरे यायावर रहेगा याद’ अज्ञेय का एक ऐसा ही यात्रा-संस्मारत है जिसमें रास्ते शामिल हैं.

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देश के लॉकडाउन होने के कारण ज्यादातर लोग घर पर ही रहे हैं. ऐसे में आपको बोरियत महसूस न हो इसके लिए हम आपके लिए लेकर आए हैं कुछ खास कहानियों का संग्रह. इस संग्रह की कड़ी में आज पढ़िए किताब- शेखरः एक जीवनी का एक हिस्सा...

 

किताब के बारे में –



कोई भी यात्रा मात्र व्यक्ति की यात्रा नहीं होती. अगर वह जिस रास्ते पर चल रहा है वह रास्ता भी यात्रा में शामिल है तो और रास्ते शामिल हैं तो क्या कुछ नहीं शामिल. ‘अरे यायावर रहेगा याद’ अज्ञेय का एक ऐसा ही यात्रा-संस्मारत है जिसमें रास्ते शामिल हैं. इसलिए यह पुस्तक अपने काल के भीतर और बहार एक प्रक्रिया, एक विचार और एक विमर्श भी है. बगैर उद्घोष की यात्रा प्रकृति और भूगोल से गुजरती हुई संस्कृति, समाज और सभ्यता से भी गुजर रही होती है. अज्ञेय की यह पुस्तक इस मायने में एक कालातीत मिसाल लगती है कि इसके बहाने द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर पूरे हिंदुस्तान की आजादी तक का वह भूगोल और कालखंड सामने आते हैं जहां जितने अधिक सपने थे उतने ही यातनाओं के मंजर भिया. यह पुस्तक एक व्यक्ति के विपरीत नहीं, बल्कि समक्ष एक नागरिक और उसके एक मनुष्य होने की भी यात्रा-पुस्तक है. अज्ञेय अपने यात्रा में लाहौर, कश्मीर, पंजाब, औरंगाबाद, बंगाल, असम आदि प्रदेशों की प्रकृति और भूमि से गुजरते हुए अपनी कथात्मक शैली और भाषा की ताजगी से सिर्फ सौंदर्य को ही नहीं रचते बल्कि सदियों हम जिनके गुलाम रहे उनके इतिहास के पन्ने भी पलटते हैं.



वैज्ञानिकता और आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में उनके विकास, विस्तार और विध्वंस के गणित को हल करने का द्वन्द और अकथ उद्यम इस पुस्तक को वायरल कृति बनाते हैं. पुस्तक में एलुर, अलिफंता, कन्याकुमारी, हिमालय आदि की यात्रा करते मिथकों, प्रतीकों और मूर्तियों की रचान को अपने यथार्थ और यथार्थ के केंद्र में देखा-परखा गया हैं जहां लेखक को पुराणों और इतिहास की वह सच्चाई नजर आती है जो युगों तक गाढे रंगों के पीछे रही. अनदेखे और अछूते को यात्रा की अभिव्यक्ति और उसकी कला में मूर्त करना कोई सीखे तो अज्ञेय से सीखे. अज्ञेय की यह दृष्टि ही थी कि यात्रा, भ्रमण के बजाय एक ऐसी घटना बन सकी जिसकी क्रिया-प्रतिक्रिया में अपना कुछ अगर खो जाता है तो बहुत कुछ मिल भी जाता है. अपना बहुत कुछ खोने, पाने और सृजन करने का नाम है-‘अरे यायावर रहेगा याद ?!

पुस्तक अंश

औरंगाबाद से उत्तर-पूर्व, चौदह-पन्द्रह मील दूर, दौलताबाद के दुर्ग के नीचे से हो कर जाती हुई सड़क से, खुल्दाबाद की छोटी-सी बस्ती पड़ती है. एक सफ़ेद मेहराब के नीचे से हो कर सड़क गुज़रती है, दोनों ओर सफ़ेद चूना-पुती इमारतें हैं, जिन की चक-चक सफ़ेदी में से एक बीहड़ सुनसान चीत्कार कर उठता है. वह नई-नई सफ़ेदी और इस आवरण के भीतर समाधियां—समाधियां नहीं क्योंकि इस नाम से तो शान्ति से भरे हुए व्यक्ति के अन्तिम विश्राम की ध्वनि होती है. केवल क़ब्रें, लड़ते-झगड़ते, धर्म-मद, सत्ता-मद, राज्य-लोलुपता से डसे हुए, ईर्ष्या और प्रतिहिंसा से सुलगते, धोखे, षड्यंत्र और दुष्चक्रों से खोखले हो गए मनुष्यों की क़ब्रें! मेहराब के आगे सड़क एक मोड़ लेती है, फिर सहसा एक फाटक पर जा कर समाप्त हो जाती है. फाटक के आगे एक ओर राज्य का डाक-बंगला है, दूसरी ओर राज्य की अतिथिशाला, जो रियासती ज़माने में किसी वाइसराय के आने के समय बनाई गई थी. और तब से इतर व्यक्तियों को ठहराने के काम में भी आती है.

औरंगाबाद—जैसा कि नाम से ही प्रकट है—औरंगज़ेब ने बसाया था. खुल्दाबाद भी उसी की कृति है. खुल्दाबाद के अर्थ हैं 'स्वर्ग की बस्ती’. न जाने क्या सोच कर औरंगज़ेब ने इस स्थल को यह नाम दिया होगा, पर इतिहास ने उसे एक नई व्यंग्य सार्थकता दे दी है. औरंगज़ेब और उसके सारे परिवार को वहीं मदफ़न मिला. औरंगज़ेब के जराजीर्ण और दूसरों के हिंसा-प्रतिहिंसा-जर्जर शरीरों को वहीं मिट्टी मिली. अपने ही रचे हुए स्वर्ग में सब मिट्टी हो गए.

और खुल्दाबाद उस उच्च समतल भूमि की छत पर बसा है, जिस की पश्चिमी ढाल पर एलुरा की गुफाएं हैं : दक्षिण से उत्तर खड़ी एक भव्य प्राकृतिक दीवार में, कोई सवा मील के प्रासाद में छोटी-बड़ी पैंतीस कन्दराएं हैं. बौद्ध, ब्राह्मण और जैन; बीचोबीच में कैलास है जो न केवल इस समूह की वरन भारतवर्ष की भास्कर्य-कला की किरीट-मणि है और कदाचित संसार में उस प्रकार के शिल्प में अद्वितीय है. वास्तव में, गुफा कहने से कैलास के सौन्दर्य की या उसके रचना-कौशल की कोई भी कल्पना नहीं हो सकती; वह एक विशाल शिलाखंड को काट कर बनाया गया गुफाओं से घिरा हुआ मन्दिर है. वह यों घिरा न होता, दूर से खुले परिपार्श्व में हम उसे देख सकते, तो उसकी सुघर भव्यता का दूसरे प्रकार का चित्र हमारे मन में उभरता. हिन्दू मन्दिर कभी भी खुले परिपार्श्व में नहीं रखे जाते और कदाचित जन-संकुल में से ही अन्तरिक्ष की ओर उठी हुई मानव को श्रद्धापूर्ण जिज्ञासा को मूर्त्त करना ही हिन्दू भास्कर्य कला का परम्परानुगत आदर्श रहा है. जीवात्मा की परमात्मा में लीन हो जाने की उत्कंठा ही मुमुक्षा है, मन्दिर और देवालय उसके मूर्त प्रतीक हैं, और उनकी प्रतीकमयता तब तक पूरी कैसे हो सकती है जब तक कि वे असंख्यों की एकोन्मुखता को भी सूचित न करें; कैलास भी ऐसा ही प्रतीक है, वह गुफाओं से घिरा है जो उसी पत्थर से कोर कर निकाली गई हैं जिससे कि कैलास, और उतनी ही ऊंची हैं; पर गुफाओं की एक-एक मंजि़ल, चढ़ कर उनके चिकने अंधेरे में से कैलास का आलोक-मंडित उभार देखते जाइए, उसका ऊर्ध्व इंगित वैसा ही प्रेरणा भरा है, एक-से-एक सुन्दर असंख्य अलंकृतियों के बीच से भी पुराने कलाकारों की श्रद्धा-विनत साधना कहती है, ''यह नहीं, इससे जो सूचित होता है, वह हम नहीं हम में जो प्राण फूंकता है, वह!’’

जिस पहाड़ी के पार्श्व में गुफाएं बनी हैं, उसके बाद घाट समाप्त हो जाता है; आगे खुली समतल भूमि है जिसमें कहीं-कहीं कोई टीला अवश्य दीख जाता है. गुफाओं के सामने कुछ दूर पर अहल्याबाई का मन्दिर है, और उसके पास एक ताल जो सांझ के प्रकाश से चमक उठता है. एलुरा की गुफाएं तीन श्रेणियों में सहज ही बंट जाती हैं. पहली श्रेणी में बौद्ध गुफाएं हैं. दक्षिण से आरम्भ करके पहली बारह गुफाएं बौद्ध हैं. इनमें संख्या 2, 3, 10, 11, 12 विशेष उल्लेखनीय हैं. अधिकतर गुफाएं विहार हैं, पर 10, जो 'विश्वकर्मा’ के नाम से प्रसिद्ध है, चैत्य है. कार्ले की चैत्य-गुफा-सी विशाल न होने पर भी यह गुफा भव्य है, और उसके भीतर प्रकांड बुद्धमूर्ति इसे एक अद्वितीय गौरव प्रदान करती है. मूर्ति-शिल्प में शिल्पी केवल मूर्ति के अवयवों को नहीं देखता, यह भी ध्यान रखता है कि मूर्ति पर पड़ने वाला प्रकाश किस अंग को प्रकाशित करेगा, किसे छाया से धुंधला कर देगा; मूर्ति-रचना में पत्थर के साथ-साथ आलोक-छाया का यह उपयोग मूर्तिकला का एक सूक्ष्म अंग है. चैत्य-द्वार पर खड़े हो कर बुद्ध मूर्ति पर स्तूप, और स्तम्भों पर पड़ते ही प्रकाश को देख कर क्रमश: स्पष्ट होता जाता है, कि चैत्य बनाने वालों ने उसका कितना कुशल उपयोग किया है; अन्धकार में से उभर कर सामने आती हुई विशाल बुद्ध-मूर्ति और भी विशाल हो उठती है; जड़ पत्थर एक श्रद्धा-भावना को जगाता है कि जिसका प्रस्पन्द-विस्पन्द एक प्रहर्ष बन कर दर्शक के रोम-कूपों में समा जाता है.
दूसरी श्रेणी में सत्रह ब्राह्मण गुफाएं संख्या 13 से ले कर संख्या 29 तक. इनमें विशेष उल्लेखनीय हैं सं. 14 (रावण-क्षय), 15 (दशावतार), 16 ('कैलास’ अथवा 'रंगमहल’), 21 (रामेश्वर) और 29 (सीता की नहानी). कैलास का उल्लेख हमने ऊपर किया है. वस्तुत:, कोई भी वर्णन उसके विशिष्ट सौन्दर्य का आभास नहीं दे सकता. उससे प्राचीनतर हम जानते हैं उससे बड़े की कल्पना हो सकती है, उससे अधिक कौशलपूर्ण, अधिक भव्य, अधिक सुन्दर, सभी कुछ कल्पना में आ सकता है, पर गुणों का ठीक वही अनुपात, ठीक वैसा ही सम्पुजन, और ठीक उसी परिपार्श्व में स्थापित कला-वस्तु का वैशिष्ट्य वह और चीज़ है, उसे देख कर ही जाना जा सकता है.

मन्दिर का, उसके शिल्प का, उसकी मूर्तियों का ब्यौरा यहां देना अनावश्यक भी है, असम्भव भी. वर्णन के लिए जेम्स की 'गाइड टु एलुरा केव टेंपल्स’ देखी जा सकती है और तत्कालीन कलाकार की मूल प्रेरणाओं और आदर्शों को समझने के लिए हैवेल के एकाधिक ग्रन्थों की सहानुभूति और उत्साह से पूर्ण चर्चा उपयोगी हो सकती है. कैलास के आस-पास की गुफाओं में कोरे गए भित्ति-चित्रों और मूर्तियों में भारतीय मूर्तिकला के अनेक सुन्दर उदाहरण मिलते हैं. पूर्वी बरामदे में शिव-पार्वती के विवाह का चित्र विशेष उल्लेखनीय है, उत्तरी बरामदे में शिव-पार्वती के चौसर खेलने का दृश्य भी सुन्दर है. यों इन गुफाओं में, उपर्युक्त दोनों, और रावण का कैलास-धारण, भैरव, तांडव-नृत्य प्रभृति प्रसंग बार-बार चित्रित हुए हैं; मूर्तिकार को सर्वदा एक-सी सफलता नहीं मिली. किसी गुफा में एक दृश्य सुन्दर हुआ है तो अन्यत्र दूसरा. 'कैलास’ में पार्वती-विवाह और रावण के कैलास-धारण के दृश्य विशेष उल्लेखनीय हैं, 'दशावतार गुफा’ (सं. 15) में नृसिंह अवतार, 'रामेश्वर गुफा’ (सं. 21) में तांडव-नृत्य, और 'सीता की नहानी’ (सं. 29) में भैरव. सीता की नहानी कैलास-सी विराट् नहीं है, पर उसका अपना एक मृदुतर सौन्दर्य है. इसमें उपर्युक्त सभी दृश्य अंकित हैं. भैरव का उल्लेख हुआ ही, इस के सामने रावण का कैलास-धारण है; पूर्व की ओर चौसर वाला दृश्य भी है, पार्वती-विवाह है; उत्तर में योगीश्वर शिव और तांडव शिव. गुफा के दक्षिण में सीढ़ियां एक ताल की ओर उतरती हैं जो एक जल-प्रताप के नीचे का थाला है; उत्तर की ओर एक खुला आंगन और है, जिसके पूर्व की दीवार पर एक भव्य देवी मूर्ति है. कछुए पर खड़ी और एक परिचारिका तथा गन्धर्वों से घिरी हुई कदाचित कोई नदी-देवी है. यह आंगन ऐसा उसकी निर्मिति से जान पड़ता है. एक उथला कुंड रहा होगा, और पूर्वी भिर्त्ति पर उसे अवलोकती हुई नदी देवी की मूर्ति का होना स्वाभाविक ही है. गुफा से सीढ़ियां नीचे उतरती हैं; नीचे दोनों ओर सिंह बैठे हैं. न मालूम इस गुफा का नाम 'सीता की नहानी’ क्यों पड़ा, लेकिन एक ओर यह छोटा कुंड और दूसरी ओर जल-प्रपात-सेवित ताल को जाती हुई सीढ़ियां उसे सार्थकता तो देती हैं.

शेष गुफाएं- संख्या 31, 32, 33 का गुफा-समूह जैन है. अन्तिम समूह की मुख्य गुफा 'इन्द्र-सभा' कहलाती है; यही उल्लेख्य है. इसमें इन्द्र और इन्द्राणी की विशाल मूर्तियां हैं; इधर-उधर तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं.

गुफाएं सब पश्चिम-मुखी दीवार पर बनी होने के कारण तीसरे पहर से संध्या तक ही उनका आभ्यन्तर ठीक देखा जा सकता है, यद्यपि भीतर के कोष्ठ अलग-अलग दिशाओं में खुलते हैं और कहीं-कहीं जगह तंग होने के करण दोपहर की सीधी बरसने वाली किरणों का नीचे से प्रतिवर्तित प्रकाश ही अधिक उपयोगी होता है. सब गुफाएं देख कर, घाट के पश्चिम मुख को घेर कर लौटती हुई सड़क पर सांझ को चलता हुआ पथिक, धुंधलके में चट्टान की हर आकस्मिक दरार में भी छेनी की सोद्देश्य कोर देखने लगता है, घाट का समूचा पार्श्व अधूरी कोरी हुई, या कोरने के बाद फिर धुंधली पड़ गई असंख्य आकृतियों से सजीव हो उठता है; ये कल्पना-प्रसूत मूर्तियां यात्री को घेर कर उसके मानस पर छा जाती हैं, उसके साथ-साथ चलने लगती हैं, उससे बातें करने लगती हैं. मानो एक अपर लोक की भावनाओं, आशा-आकांक्षाओं से भरा, पुराकाल के कलाकारों की आदर्श-साधना से आविष्ट बटोही, सहसा देश-काल के बन्धनों से मुक्त हो जाता है. घिरते अंधेरे में जब वह लम्बा चक्कर काट कर फिर खुल्दाबाद की ओर मुड़ता है, तो सड़क पर फाटक की वही मेहराब सामने पा कर मानो चौंक उठता; वह मेहराब वास्तविक नहीं जान पड़ती, बल्कि किसी पुरानी मेहराब की प्रेत-छाया; और उसके भीतर से गुज़रती हुई सड़क भी, आज की ठोस और सपाट पक्की सड़क न हो कर किसी प्रेत-लोक का मार्ग बन जाती है. एलुरा के कलाकार की भावना से अब भी आविष्ट राही को लगता है, वही सत्य है, और यह पक्की सड़क एक भ्रान्ति, और औरंगज़ेब का खुल्दाबाद एक मिथ्या आभास, एक प्रेत बस्ती, वह मेहराब जिसका फाटक है...

 

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क्या सोच कर तुम ने अपने मरण-स्वर्ग के लिए वह स्थल चुना था, औरंगज़ेब!

प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण? सौन्दर्य वहां है, नि:सन्देह; लेकिन तुम्हारे बुजुर्ग कश्मीर गए थे; कश्मीर जा कर भी उन्होंने अपनी विलासिता के ही साधन रचे, पर प्राकृतिक सौन्दर्य तो वहां था! क्या ज़ेबुन्निसा की अचूक कवि-दृष्टि जो सौन्दर्य देख सकी थी उसके प्रति तुम बिलकुल ही अन्धे थे? या कि विलासिता का विरोध करने के लिए ही तुम बुजुर्गों की लीक को छोड़ कर दक्षिण गए?

बटोही को लगता है मानो इस अभाषित प्रश्न से आहूत, औरंगज़ेब की छाया, प्रेत-स्वर्ग से आगे आ कर मेहराब के सहारे खड़ी हो जाती है, और उत्तर देती है. पूर्वजों की महत्त्वाकांक्षा औरंगज़ेब में भी थी; आसेतु साम्राज्य की कल्पना के कोड़े उसे भी दौड़ाते रहे थे. औरंगाबाद उसके साम्राज्य-प्रसार की दक्षिणी सीमा थी; साम्राज्य-दुर्ग की दीवारें उसे कांपती हुई दीखीं तो एक नया धुस्स खड़ा करने के लिए ही उसने खुल्दाबाद का निर्माण किया होगा. पर जो भीतरी दुर्बलता से गिरता है, उसे बाहरी सहारे और ठूमने नहीं खड़ा रख सकते; और औरंगज़ेब के आकांक्षा-दुर्ग का धुस्स आज उसी की मिट्टी पर खड़ा है.

बटोही फिर पूछता है, क्या सोच कर तुम ने यहां अपनी समाधि बनवाने की सोची, सम्राट औरंगज़ेब? अपनी समाधि पहले से बनवा रखने की बात औरों को भी सूझती रही, ठीक है, मृत्युपूजक और भी रहे पर तुम ने यह स्थल क्यों चुना? ठीक यही स्थल, एलुरा की गुफाओं की छत का यह समतल, तुम्हारे शासितों का जो उच्चतम आदर्श हो सकता है. कैलास उससे भी कुछ बालिश्त ऊंचा अपना स्वर्ग बनाने की भावना क्यों तुम्हारे मन में रही? एलुरा की गुफाओं और मूर्तियों पर भी पलस्तर और रंग का लेप होता था; आज वह नहीं होता और भीतर के पत्थर निकल आए हैं. तुम्हारी और तुम्हारे भ्रातृघाती, पितृघाती अपत्यघाती कुलद्रोही कुनबे की $कब्रें आज भी चक-चक लिपी-पुती हैं. लेकिन एलुरा आज भी एक अचरज है बल्कि रंग न होने से उसका मूल सौन्दर्य और उभर आया है; और तुम तुम्हारी समाधियां? क्यों तुम सोच सके कि एक व्यक्ति का दर्प भले ही शासानुशास का दर्प एक समूची जाति की श्रद्धा-विनत साधना से अधिक समर्थ हो सकता है?

आस्था तुम में भी थी धर्मात्मा तुम भी थे शारीरिक परिश्रम से अपना भरण करने की साधना भी तुम ने की थी. पर क्या तुम नहीं जानते थे कि साधना का एक अहंकार भी होता है जो साधना को ले डूबता है क्योंकि जहां अहंकार का विसर्जन नहीं है वहां विनय नहीं है, और जहां विनय नहीं है वहां साधना कैसे हो सकती है? ईश्वर के आगे झुकने से ही तुम अपने समकक्ष मानव-प्राणी से अपने को ऊंचा समझने के अधिकारी बनते थे, जो आध्यात्मिक दर्प है, जो अहंकार का सबसे विघातक रूप है. ईश्वर की क्षुद्रतम रचना के आगे विनयी होना ही ईश्वर के आगे विनयी होना है. और इसी से, तुम्हारे मृत स्वर्ग के स्तम्भ-रूप इन एलुरा के गुफा-चैत्यों और मन्दिरों के निर्माता, नाम विहीन कलाकार अमर हैं, और उनकी छत पर टिके हुए अपने इन मरण-मंडपों में बैठे-बैठे पचित, जीर्ण होते हुए तुम एक प्रेत, केवल प्रेत...

यद्यपि कोरे वर्णन के लिए ही, क्योंकि एक कला-समीक्षक के रूप में बर्जेस की दृष्टि अनेक पूर्वग्रहों से दूषित थी, जिनमें ईसाइयत और अंग्रेजि़यत के पूर्वग्रह उल्लेखनीय हैं. पहले प्रकार के पूर्वग्रह का एक नमूना देखिए. कैलास का वर्णन करते हुए वह लिखता है : ''इस की मूर्तियां स्मार्त्त मत के प्रचलन को, और उस नैतिक पतन को सूचित करती हैं जिस ने दक्षिण में लिंगायत सम्प्रदाय को जन्म दिया और जिसके कारण यह आवश्यक हो गया कि कोई बाहरी प्रभाव आ कर मूर्ति-पूजा के नशे में डूबी हुई, और उससे उत्पन्न होने वाले पापाचार से क्षीण हो गई जाति को उबारे. अपनी सम्पन्न कल्पना के बावजूद हिन्दू कलाकार के स्वभाव की मूल विकृति प्रकट होने से न रही. ईसाई धर्म के आलोक से वंचित अन्य जातियों मेें भी यही होता रहा. इस्लाम की तलवार ने यदि मूर्ति-पूजा बन्द नहीं की तो भी प्रजा को और उसी के शासकों को उत्सवों और मन्दिरों-नृत्यों का भ्रष्टाचार और अर्थहीन मंत्रों का जाप छोड़ दूसरे कामों की ओर प्रवृत्त होने को बाध्य किया. उन निष्करुण सैनिकों ने यह दीखा दिया कि सच्चे वीर, यद्यपि क्रूर, सैनिकों के सामने देवता भी उतने ही असहाय हैं जितने उनके क्लीव उपासक.’’

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First published: March 31, 2020, 5:06 PM IST
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