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आकांक्षा पारे काशिव की कहानी 'मणिकर्णिका'

आकांक्षा पारे हिन्दी की युवा और चर्चित रचनाकार हैं.

आकांक्षा पारे हिन्दी की युवा और चर्चित रचनाकार हैं.

आकांक्षा पारे के चार कहानी संग्रह 'सहेलियां तीन प्रेमी', 'बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान', 'पिघली हुई लड़की', 'मैं और मेर ...अधिक पढ़ें

    आकांक्षा पारे (Akanksha Pare) हिन्दी की युवा और चर्चित रचनाकार हैं. उनके चार कहानी संग्रह ‘सहेलियां तीन प्रेमी’, ‘बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान’, ‘पिघली हुई लड़की’, ‘मैं और मेरी कहानियां’ और एक कविता संग्रह ‘एक टुकड़ा आसमान’ प्रकाशित हो चुका है. आकांक्षा (Akanksha Pare Kashiv) की कहानियां वैसे तो समाज के तकरीबन हर वर्ग को छूती हैं, लेकिन स्त्रियों के मुद्दों पर ज्यादा फोकस रहता है. जिस समाज के संघर्ष और सपनों पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है, आकांक्षा ऐसे विषयों को बड़ी ही बारीकी तथा मार्मिक ढंग से उठाती हैं.

    ‘मणिकर्णिका’ (Manikarnika) कहानी भी समाज के उस वर्ग की लड़कियों की कहानी है जो अपने परिवार का पालन के लिए हाथों में टिफिन लिए सुबह सवेरे निकलती हैं और सड़क पर, बसों में, फैक्टरी में, दुकान पर यहां तक कि घरों में हर पल खुद को महफूज करते रहने के संघर्ष के बीच देर शाम घर पहुंचती हैं. लेकिन अपने घरों में भी तमाम दुश्वारियों के बीच अपने छोटे-छोटे सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष करती रहती हैं.

    मणिकर्णिका

    घूं…घूं की आवाज के साथ पहियों ने धूल उड़ाई. सड़क किनारे खड़ी सारी लड़कियों की आंखें वहां टिक गईं. लड़की ने अपनी आंखें सिकोड़ कर कीं और गाड़ी को रफ्तार देने के लिए कलाइयां के सहारे हैंडल को कस कर उमेठ दिया. हेलमेट में से उसकी छोटी आंखें लगभग गुम गई सी लग रही थीं. मोटर साइकिल पूरी रफ्तार के साथ दौड़ी और सामने रखे पटिए पर चढ़ कर एक बड़े गड़्डे को छलांगती हुई उस पार निकल गई. लड़की जब लौटी तो उसने देखा सभी की निगाह में तारीफ के छोटे-छोटे टुकड़े तैर रहे हैं, सिवाय उस नई लड़की के जो हाल ही में मुहल्ले में रहने आई है. लड़की ने हेलमेट उतारा और अपनी सहेलियों की ओर देखा. सब दौड़ कर उसके पास चली आईं.

    ‘मजा आया?’ लड़की ने गर्व के साथ सहेलियों से पूछा.
    ‘मेरी भैन भी ऐसा कर लेती है’ नई लड़की ने तारीफ के गुब्बारे में पिन चुभोने की कोशिश की. लड़की ने उसे घूरा तो उसने जल्दी से आगे जोड़ा, ‘जब उसकी सादी नी हुई थी तब करती थी.’
    लड़की खिलखिलाकर हंस दी. उसने दोबारा हेलमेट पहना तो उसकी सहेली ने रोक लिया.
    ‘घर चलते हैं सोभा, देख तो काम पे जाने का टेम हो गया है.’

    लड़की ने लापरवाही से अपनी बांह छुड़ाई और मोटरसाइकल पर ऐड़ लगा दी. इस बार उसने गाड़ी को तेज रफ्तार में एक पहिए पर बहुत दूर चलाया. फिर उसने अगला पहिया जमीन पर टिकाया और अपने दोनों हाथ छोड़ दिए. उसने एक तरफ पैर करके मैदान के कई चक्कर लगाए. जब वह लौटी तो इस बार नई लड़की का मुंह खुला हुआ था.

    ‘तेरी भैन ऐसा कर लेती थी’ लड़की ने उसकी आंखों में आंखें डालीं, ‘सादी से पहले’ और जोर से खिलखिलाकर हंस दी. लड़की अपना सा मुंह लेकर बहुत देर खड़ी रही. उसने मुंह में कुछ शब्द चुभलाए लेकिन बाहर नहीं निकाले. बाकी लड़कियों ने उसके कंधे पर सांत्वना का हाथ रखा और पलकें झपका दीं.

    लड़की इस समूह में नई थी फिर भी उसने आंखों में तैरते संदेश को तुरंत पकड़ लिया और समझ गई कि सौ बात से भली एक चुप होती है. उसने भले ही कह दिया था कि उसकी बहन भी गाड़ी चलाती है पर यहां के करतब देख कर वह समझ गई थी कि स्कूटी चलाने और हीरो होंडा चलाने में उतना ही फर्क है जितना दाल-भात में घी गिरा कर खाने में और घी के बारे में सोचने में होता है. उसने कई दफे अपनी मालकिन के यहां दाल-भात में घी खाया है इसलिए वह उस स्वाद और स्वाद की कल्पना के अंतर को बखूबी समझ गई.

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    अभी तो वह बस यह कल्पना करना चाहती थी कि वह भी ऐसी रफ्तार से गाड़ी चला कर सबको चौंका दे. वह यह भी जानती थी कि सांप निकलने के बाद लकीर पीटने के बजाय अवसरों को सामने से पकड़ना चाहिए. पांच मिनट की टुच्ची सी बहस के कारण वह रफ्तार से गाड़ी चलाने के अपने सपने पर पानी नहीं फेर सकती थी. उसने अपने चेहरे पर बाकी लड़कियों के मुकाबले प्रशंसा के अतिरिक्त भाव लाए और अपनी आंखों में कौतूहल के लंबे धागे ले आई. लड़की ने उन धागे के सिरे झूलते छोड़ दिए जिसे करतब वाली लड़की जिसका नाम शोभा था, ने तुरंत थाम लिया. आंखो ही आंखों में एक अनकहा समझौता हो गया. यह संदेश इतनी बारीक तरंगों पर सवार होकर एक-दूसरे तक पहुंचा कि किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. चारों लड़कियां मोटरसाइकिल पर जैसे तैसे लद गईं और चल पड़ीं.

    मुहल्ला आने से पहले ही लड़कियां गाड़ी से उतरीं और गलियों में ऐसे समा गईं जैसे हवा. सुबह का सूरज अलसाता हुआ सा पृथ्वी की सीढ़ी चढ़ रहा था. शोभा ने धीरे से गाड़ी को गली के मुंहाने पर रखा और बिना आवाज किए उसे जंजीर से बांध कर पतली गली में गुम हो गई. लड़कियों के आते ही मकान घर में तब्दील हो गए. चूल्हे जल उठे, चाय की भाप उठने लगी, सौंधे छौंक से चौका गमक गया और नारंगी आंच पर रोटियां फूल गईं. हर घर से स्टील के डिब्बों की टनटनाहट ऐसे उठी जैसे किसी आरकेस्ट्रा के साजिंदे अपनी मनमानी पर उतर आएं हों लेकिन फिर भी सुर-ताल बेसुरा न हुआ हो. डब्बों में रोटियां, सालन कैद हो कर किसी की साइकिल तो किसी के हाथ की थैलियों में समा गए.

    थोड़ी देर पहले बाइक में किक लगाती, गेयर बदलने की कोशिश करतीं, ताली पीट कर उत्साह से उछलती लड़कियों ने नई काया धर ली. ढीले शलवार-ऊंचे कुरते और बालों के बुल्लों से लड़कियों का कद और ऊंचा हो गया. सुबह का बासीपन काजल खिंची आंखों के आगे दुबक गया. सुबह को लापरवाह ढंग से हवा के संग अठखेलियां खाने वाले दुपट्टे करीने से छातियों पर सरक आए. सब एक-दूसरे को देख कर हंसी और जंजीर में बंधी मोटर साइकिल के पास से यूं गुजर गईं जैसे उसे पहचानती ही न हों.

    लड़कियां गलियों की भूल-भुलैया से निकल कर मेन रोड पर आ गईं. एक बार फिर उनका कायांतरण हो गया. उनकी तनी हुई गर्दनें फिर झुक गईं और उनकी चाल से लापरवाही जाती रही. उनके भाव इतने संतुलित हो गए कि किसी की नजर उन पर पड़ती तो वे लड़कियां न होकर चलते-फिरते पुतले लगतीं. लड़कियां बस के इंतजार में खड़ी हो गईं.

    इस बस्ती से उस शहर तक का सफर उनके लिए रोज परेशानी लेकर आता है. लेकिन बाप के कर्ज और घर के खर्च के आगे ये परेशानियां उन्हें कुछ भी नहीं लगतीं. कोई फैक्ट्री में काम करती है तो कोई किसी के यहां आया है. सब की अपनी दुनिया और अपनी जिंदगी. सबके अपने सपने और सबकी अपनी सच्चाइयां.

    धूप चढ़ती जा रही थी. सही वक्त पर काम पर न पहुंचने की घबराहट का पसीना गर्मी के पसीने से ज्यादा तेजी से माथे पर चमकने लगा. शोभा ग्लानि में आ गई. आज उसने नई लड़की को अपना करतब दिखाने के लिए पूरे दस मिनट सभी को देरी करा दी थी. अंदाजा था कि रोज वाली बस निकल गई है. अब अगली बस का इंतजार के सिवाय कुछ नहीं किया जा सकता. और अगर वह बस सीधी न हुई, तो सब लोग कम से कम आधा घंटा देर से अपने काम पर पहुंचेंगे. शोभा जानती है शीतल जिसके यहां बच्चे की देखभाल के लिए जाती है वो लोग बहुत सख्त हैं. ठीक साढ़े नौ बजे दोनों मियां-बीबी निकल जाते हैं. यदि पांच मिनट भी ऊपर हुआ तो बच्चे की मां हाय-तौबा मचा देती है. उसे सबसे ज्यादा फिक्र शीतल की ही है. वह ज्यादा बहस भी नहीं कर पाती. शोभा ने बातचीत को फिर सपने पर आकर टिका दिया.
    ‘सीतल तेरे को तन्खा कब मिलेगी.’
    ‘आज मिलेगी. आठ तारीख है न आज.’
    ‘हओ आठ ही है.’ शोभा ने तस्दीक की. ‘मेने इसलिए पूछा कि इस बार पेटरोल के पैसे तेरे को देने हैं.’
    ‘हओ, याद है मेरे को’ शीतल ने इतना कह कर मुंह उधर घुमा लिया जहां से बस आने की संभावना थी.

    ‘मेरे को भी देर हो गई है आज’ शोभा ने चिंता जताई. जबकि वह जानती है कि उसकी फैक्ट्री में तीन दिन देर से हाजिरी लगाई जा सकती है. और यदि उसे देरी होती है तो यह उसका पहला दिन ही होगा. वैसे भी वह इन सब लोगों से पहले ही पहुंच जाएगी. जहां बस उतारेगी वहां से उसकी फैक्ट्री मुश्किल से आधा किलोमीटर है.

    बस अभी भी नहीं आई थी और सूरज सिर पर चढ़ कर नाच रहा था. पसीना लड़कियों के माथे पर सैकड़ों बिंदियों की तरह टिमटिमाने लगा. रूपा ने अपना दुपट्टा सिर पर रख लिया. सब एक-दूसरे की तरफ देखने लगीं. और थोड़ी देर बस नहीं आई तो सबका गाली खाना तय है. शीतल की आंखों की कोर भीगने लगीं. वह बाकियों से हट कर खड़ी हो गई. शोभा का मन भर गया. शीतल के घर में वही अकेली कमाती है. भाई दिन भर मटरगश्ती करता है, दो छोटी बहनें घर में रहती हैं, मां खाट पर और पिता जेल में है. अगर उसकी नौकरी चली गई तो? इतना सोचते ही शोभा का दिल मुंह तक आ गया. उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह शीतल को सांत्वना में कुछ कहे. उसने अपनी हथेलियों को बार-बार रगड़ा. रूपाली थक कर पास की चाय की टपरी की बेंच पर बैठ गई. चाय वाले ने उसे हसरत भरी नजर से देखा और तुम तो ठहरे परदेसी जोर-जोर से गाने लगा.

    चाय वाला बदल-बदल कर गाना गा रहा था और बीच-बीच में रूपाली को कुछ न कुछ कह रहा था. रूपाली निरपेक्ष भाव से बैठी थी और कभी-कभी चायवाले को घूर कर देख लेती थी. नई लड़की निर्मला ने आंखों से इशारा किया जिसका अर्थ था, ‘वहां मत बैठ, यहीं चली आ.’ रूपाली ने निर्मला की अनदेखी की और वहीं टिकी रही. जब रूपाली उसके भद्दे तानों पर भी नहीं उठी तो शोभा ने टपरी की ओर लंबे डग बढ़ा दिए. निर्मला ने शोभा का रास्ता रोक लिया. शोभा ने उसे गुस्से में देखा तो शीतल गुस्से में आई और बोली, ‘सोभा, सुबह से पहले ही बहुत नाटक हो चुका है.’
    ‘नाटक का क्या मतलब है, बस नहीं आई तो मैं क्या करूं’ शोभा ने तमक कर बोला.
    ‘मैंने बस का नाम लिया क्या अभी. तू खुद से ही काय को बोल रही है.’ शीतल शायद पहली बार किसी बात का प्रतिवाद कर रही थी.
    ‘तो तू नाटक क्यों बोल रही है.’
    ‘नाटक नी तो क्या है, जब तय है कि हम लोग छै बजे तक लौट आएंगे तो तूने निर्मला को दिखाने के लिए काय को और गाड़ी चलाई. तभी देर हुई है.’

    ‘मैं…’ शीतल-शोभा की बहस बढ़ने लगी तो रूपाली खुद ही उठ कर चली आई और जोर से बोली, ‘तू खुद को मेरी काम समझती है क्या कि तूने एक मुक्का मारा और सब हार जाएंगे.’ रूपाली ने गुस्से से शीतल को डपटा.
    ‘मैं काय को मेरी काम समझूं, मैंने क्या किया जो तू भी मुझ पर चढ़ रही है.’
    ‘दो घड़ी बैठने भी मत दे. सुबह से पेट में दर्द है. चार दिन पहले महीना आ गया है. पीठ और पैर टूट रहे हैं. पर तेरे को क्या तू अपने आगे किसी को कुछ समझती है क्या.’ रूपाली बिफर गई.
    ‘अब मैंने क्या किया’ शोभा के हाथ में अचानक काल्पनिक सफेद झंडा आ गया.
    ‘तू बमकती हुई क्यों आ रही थी उस तरफ. गाना गा रहा है तो गाने दे. तेरा क्या जाता है. बस आएगी तो चले जाएंगे. रोज कौन सा हम इतनी देर यहां खड़े रहते हैं.’
    ‘तो क्या ऐसे ही गुंडई सहते रहें?’

    ‘नहीं मेरी मणिकर्णिका, जा. तू जा और जाके अभी उसकी नाक तोड़ दे, फिर पुलिस आएगी हम सब को ले जाएगी, हममें से कोई काम पे नी जाएगा और फिर अपन पुलिस के लफड़े झेलेंगे. अच्छा। खुश। अब जा उसको मार के आ जा.’ रूपाली का चेहरा तमक गया.
    ‘बाकी छोड़ ये बता मणिकर्णिका कौन हुई’ निर्मला ने बात हल्की करने के गरज से रूपाली को छेड़ा. रूपाली ने कोई जवाब नहीं दिया और गुस्से से शोभा को घूरती रही.
    ‘तुम सब ऐसे ही रहो. हमेशा दबे से. लड़की होने का अभिशाप भुगतो. कभी खड़े मत हो गुंडों के खिलाफ. तू खुद नहीं बोल सकती कि गाना क्यों गा रहे हो. बड़ी बनती है सिकोरिटी अफसर. मॉल में ऐसे सिकोरिटी करती है, किसी आंख तक दिखाना नी आती, हुंअ.’

    शोभा जब कड़वी होती है तो बस होती चली जाती है. उसकी कड़वाहट में शब्द नीम की पत्ती हो जाते हैं. उसके तर्क अंगार. सब मिलाजुलाकर तिलमिलाहट की पूरी रसद. उसके सहित छह बहनों और एक भाई का परिवार है. मां घरों में खाना बनाने का काम करती है और पिता प्लंबर है. वह सबसे बड़ी और उसके पीछे भाई की आस में चार बहनें. दादी कहती है वह अपनी पीठ पर इतनी बहनों को लाद लाई है. जैसे मां-बाप का इसमें कोई योगदान नहीं! भाई की पीठ पर भी एक बहन है पर उसमें भाई का कोई दोष नहीं है.

    ‘तू तो ऐसे बोल रही है जैसे कभी माल गई ही न है. मेकअप करके, अपने बायफ्रेंड के साथ हाथ में हाथ डाले जब मैडम लोग आती हैं तो पर्स खोलने में भी न नुकूर करती हैं. कोई कहती है, हम आतंकवादी है क्या, कोई कहेगी इत्ते से बैग में मैं क्या ले आऊंगी. हर जगह दिखावे की सिकोरिटी है. नीले रंग की वर्दी पहन लेने भर से क्या कोई सिकोरिटी अफसर हो जाता है. माल में आने वाले दो कौड़ी की इज्जत नहीं रखते हमारी. जैसे और चीजें सजावट के लिए होती हैं न बस हम वैसे ही हैं. तेरे को मालूम नी है क्या’ रूपाली ने उसी तरह चिढ़ कर कहा.

    ‘इज्जत…’ शोभा आगे कुछ बोलती उससे पहले ही ‘बस आ गई, बस आ गई’ के कोलाहल में उसके शब्द दब गए.

    दूर से नीले रंग की बस ऐसे चली आ रही थी जैसे अगर एक्सीलेटर से पैर हटा तो चालान कट जाएगा. सड़क पर खड़े लोग तितर-बितर हो गए. बस ने चीखते हुए ब्रेक लगाया और बस की हालत देख कर इंतजार में खड़े लोग सकते में आ गए. अंदर सवारियों और बकरियों में अंतर करना मुश्किल था. बाहर लोग फेविकोल के विज्ञापन की तरह चिपके हुए थे. लड़कियों ने एक दूसरे का मुंह ताका. आसपास खड़ी सवारियां कुनमुनाईं, ड्राइवर ने बस थोड़ी सी आगे बढ़ा कर जोर से ब्रेक मारा. बस के अंदर से समवेत चीख गूंजी, लटके लोग गरियाए फिर भी जगह नहीं बनी. कुछ सेकंड बस ऐसे ही खड़ी रही तो ड्राइवर ने एक्सीलेटर पर पैर देकर धूल उड़ा दी. शीतल की रुलाई फूट पड़ी और वह जार-जार रो दी.

    टीवी पर रियलिटी शो जैसा कोई कार्यक्रम चल रहा था. गहरे मेकअप में बैठी जज किसी लड़की की कहानी सुन कर अपनी आंखों की कोर पर आने से पहले आंसू रुमाल से पोंछ रही थी. लड़की की बातें सुनकर शोभा ने सोचा इससे ज्यादा तो हम झेलते हैं. पर ऐसे टीवी पर आकर बोल नहीं सकते. शोभा ने अनमने ढंग से स्क्रीन पर देखा और सब्जी काटने में व्यस्त हो गई. एक टेबल पर रखे गैस चूल्हे, मसालों के कुछ डब्बों और चंद बर्तन से वह जगह रसोई होने का भान कराती थी. गैस चूल्हे पर चाय उबल कर काढ़ा हो रही थी. उसने बेमन से चाय छानी और खटिया पर लेटी दादी को पकड़ा दी. वह पलटी और एक चूल्हे पर तवा चढ़ा कर दूसरे बर्नर पर सब्जी बघारने की तैयारी करने लगी.

    ‘हर दिन बैगन क्यों बनाती है’ छोटे भाई की आवाज जैसे ही उसके कानों में पड़ी उसका मन किया उसे कस कर एक लात जमा दे.
    ‘तू दूसरी सब्जी ला दे, मैं वही बना दूंगी.’
    ‘ज्यादा अपने पैसे की ऐंठ मत दिखाया कर समझी. मुंह तोड़ दूंगा.’

    शोभा ने पूरी ताकत से भाई के चेहरे पर तमाचा मार दिया. भाई ने तेल की गर्म कढ़ाई में पास रखा पानी डाल दिया. तेल के छींटे शोभा के हाथ और मुंह पर पड़े. जलन से बचने के लिए वह पीछे हुई कि उसने फुर्ती से पतीली में रखा दूध जमीन पर गिराया और बाहर भाग गया. कच्ची सूखी जमीन धीरे-धीरे दूध पीने लगी. हाथ और मुंह से ज्यादा शोभा का दिल जल उठा.

    उसकी फैक्ट्री मैनेजर ने बताया था, ‘फुलक्रीम दूध से खीर अच्छी बनती है.’ घर में शायद पहली बार एक साथ इतना दूध आया था. शोभा अपनी छोटी बहन खुशी को खीर का तोहफा देना चाहती थी. कल उसका जन्मदिन था. शोभा के आंसू सूखने से पहले जमीन का दूध सूख गया था. जमीन नमी की तृप्ती लिए थोड़े गहरे रंग की हो गई. मलाई के कुछ सफेद कतरे आड़ी-तिरछी अल्पना की तरह सजे रह गए.

    घर में दादी और उसके सिवा बस हवा थी, जो दरवाजे बजा रही थी. फिर भी दादी दरवाजे की तरफ मुंह कर जोर-जोर से गालियां बकने लगीं. फिर शोभा की तरफ मुंह करके उसी को चिल्लाने लगीं कि उस आवारा लड़के के मुंह क्यों लगना. दादी ने भाई को खूब गालियां सुनाईं. उसके दो कारण थे. मां घर पर नहीं थी. मां के सामने उनके लाड़ले को इतनी गालियां बकना आसान नहीं था. दूसरा हफ्ते भर से खीर की संजोई हुई आस अभी-अभी धूमिल हो गई थी. दादी जानती थी, एक लीटर दूध दोबारा तो नहीं आ सकता. शोभा ने टेबल पर सिमटे चौके का काम निबटा कर उसे दोबारा संवार दिया. खीर के सपने का अवशेष भी शेष नहीं था. तभी उसे बाहर से आवाज आई, ‘सोभा’
    शोभा ने आवाज सुनी तो उसका मन खिल गया. सामने शीतल खड़ी थी सकुचाई सी. पूरे एक हफ्ते बाद शीतल शोभा के घर आई थी. उस दिन के झगड़े के बाद दोनों में अबोला था.

    ‘सीतल’ कहते हुए शोभा ने उसके दोनों हाथ कस के पकड़ लिए.
    ‘पेसे देने आई थी तेरे को’
    ‘तेरे को तनखा मिली’ शोभा ने सशंकित हो कर पूछा.
    ‘हां, उस दिन के पेसे भी नी काटे’
    ‘काम छूट गया क्या’

    शीतल ने शोभा के मुंह पर उंगली रख दी. क्योंकि अमूमन पूरे पैसे उसी हालत में मिलते थे जब काम से निकाल दिया जाता था.
    ‘काम क्यों छूटेगा. बस उसी दिन नी गई थी, मैडम ने बहुत गुस्सा किया. उनको दफ्तर से छुट्टी करनी पड़ी. फिर जब मैंने बताया कि मोटरसाइकिल सीख रही हूं. इसी कारण उस दिन रोज वाली बस निकल गई।.तेरा भी बताया कि तू सिखा रही है तो खुस हो गईं. बोलीं, अच्छे से मन लगा कर सीख लूंगी तो साहब की पुरानी फटफटी दे देंगी.’
    ‘क्या के रही है तू, सच्ची’ शोभा की आवाज बता रही है कि एक लीटर दूध के अवसाद से वह बाहर आ गई है.
    ‘इस बार पेट्रेल की मेरी बारी है तो मेने सोचा तेरेको रात में ही पेसे देती हूं.’
    ‘तेरे को आपत तो नहीं है न इस महीने’
    ‘नहीं कोई परेसानी नी है. बस तू रख ले. कल सुबह जल्दी चलेंगे ताकि ज्यादा चक्कर लगा सकें.’
    ‘पर कल…’
    ‘कल क्या मुस्किल है’
    ‘आज आयुस ने दूध गिरा दिया. मेने बताया था न खुसी के जनमदिन पर खीर बनाऊंगी वोई वाला. उससे लड़ाई हो गई है, मेरे को लगता है उसको पता है कि हम रोज सुबह उसकी मोटरसाइकिल चुपके से चलाते हैं, पता नहीं कल कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे.’
    ‘सुबह उठ तो जाएंगे, नी हो पाएगा तो तैयार होकर जल्दी काम पे चले जाएंगे. अपने मालिक लोग भी खुस हो जाएंगे.’
    ‘हां सई हे, हिम्मत नी हारनी है. जब तक अपन चारों लड़कों जैसी बाइक चलाना नी सीख जाते चाहे कुछ हो जाए इसे बंद नी करना है.’
    आश्वस्ति की मुस्कान दोनों के चेहरों पर आई.

    शीतल हेलमेट लगाए काली हीरो होंडा पर सवार होकर चली आई थी. गाड़ी स्टैंड पर लगा कर उसने अदा से हेलमेट उतारा जैसे अभी-अभी सुखोई की उड़ान भर कर उतरी हो. पर्स से मोबाइल निकाल कर देखा, कुल पैंतीस मिनट. उसकी मुस्कराहट दोनों कानों तक पहुंच गई. रूपाली ने उसे मुस्कराते देखा तो आंखों ही आंखों में पूछा, ‘क्या हुआ’ शीतल ने मोबाइल की स्क्रीन उसके सामने चमका दी. धुंधलके में मोबाइल की रोशनी में रूपाली के दांत चमक उठे.
    ‘अपनी गाड़ी के कित्ते मजे हे न’ रूपाली ने थोड़ा लड़ियाते हुए कहा. शीतल ने हामी भरी.

    जो दूरी पचपन मिनट या उससे ज्यादा समय में तय होती थी आज पैंतीस मिनट में पूरी हो गई थी. बिना किसी से रगड़ खाए हुए, बिना किसी को बार-बार कहते हुए, ‘भाई साहब ठीक से खड़े रहिए’, बिना कंडक्टर के भद्दे गाने सुने हुए. दोनों चली आईं थी बस हवा की छुअन महसूस करते हुए. शीतल लौटते हुए रूपाली को उसके मॉल से लेती आई थी.

    रूपाली को इतनी जल्दी थी मोटरसाइकल पर बैठने की कि उसने अपनी यूनिफॉर्म भी नहीं बदली थी. गहरी नीली पैंट और हल्की नीली कमीज को खोंसे वह काले जूतों में टिपटॉप लग रही थी. पांच-दस मिनट जब दोनों ने ‘अपनी गाड़ी के फायदे’ पर एक-दूसरे को निबंध सुना दिया तो चिंता शुरू हुई इस काली घोड़ी को कहां बांधा जाए. घर पर बताया तो भाई द्वारा गाड़ी हथिया लेने की पूरी संभावना थी. ‘तू कहां गाड़ी लेकर जाएगी से लेकर’ ‘तेरे को मालकिन ने मोटरसाइकिल क्यों दी’, ‘फ्री में क्यों दी कोई तो बात है,’ ‘तू तो बेवकूफ है जरूर तेरे साहब की बुरी नजर है’ जैसे हजारों सवालों के जवाब वह देते-देते थक जाएगी. पर मां और भाई के सवाल खत्म नहीं होंगे.

    शोभा की सलाह के बिना कुछ भी करना उसे खतरा लगा. कुछ हो गया तो बाद में शोभा कहेगी, ‘पेले मेरे से पूछा था क्या? वैसे भी वह जितने अच्छे तरीके सुझा सकती है कोई नहीं सुझा सकता. वह कहेगी कि घर में बता दो तो बता दिया जाएगा. वरना इसे कहीं ठिकाने से लगाया जाएगा ताकि रोज सुबह वहीं से मोटरसाइकिल उठा कर काम पर पहुंचे और वापस आकर फिर उसी जगह टिका दिया जाए. बस एक मोटरसाइकिल और मिल जाए तो शोभा और निर्मला भी अपनी गाड़ी पर काम के लिए जा सकते हैं. चारों सहेलियां घर जाने से पहले यहीं बस स्टॉप पर मिलती हैं. फिर थोड़ी सी गप्पे मार कर घर चल देती हैं. यह बस स्टॉप उन लोगों का अपना अड्डा है. दोनों बस स्टॉप पर शोभा के आने का इंतजार करने लगीं. रोज तो चारों पांच-सात मिनट के अंतर पर पहुंच ही जाती हैं. लेकिन आज शीतल और रूपाली दोनों ‘अपनी गाड़ी’ पर जल्दी पहुंच गई थीं.

    शाम घिरने लगी तो पास की कलाली पर भीड़ का दबाव बढ़ गया. पकौड़े वाले, भूजा की रेहड़ी, मोमोज वाले, बस के यात्री, सब्जी के ठेले, पापड़ वालों का शोर बढ़ता जा रहा था. दोनों खड़ी-खड़ी उबने लगीं. हर आती हुई बस से उन्हें लगता कि अब शोभा और निर्मला उतरेंगी. दोनों निर्मला की बातें करने लगे. जब नई आई थी तो कैसी बड़ी-बड़ी बातें करती थीं लेकिन अब ऐसे हो गई है जैसे पता नहीं बरसों से जान-पहचान हो. शीतल ने उसे भी अपनी फैक्ट्री में लगवा लिया है.

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    बिना मां-बाप की लड़की है पर कोई दया दिखाए तो खाल उधड़े देती हैं अपनी बातों से. चाचा-चाची के यहां रहती है लेकिन चाची को कभी मौका नहीं देती कि वह उसे एक बात कह सके. उसके बारे में मोहल्ले में प्रसिद्ध है कि उसे कभी किसी ने सोते हुए नहीं देखा. चाची सिलाई करती है और वह जाते हुए चाची के लिए पानी का लोटा तक पास में भर कर जाती है. उसकी मेहनत पर बात करो तो वो हमेशा कहती है, ‘काम सबको प्यारा, चाम किसी को नहीं.’

    जब तक बड़ी बहन थी, दोनों दादी के पास रहती थीं. लेकिन बड़ी बहन की शादी हो गई और दादी स्वर्ग चली गई तो वह चाचा के पास चली आई. दोनों अपनी बातों में लगी हुई थीं कि एक बाइक तेजी से आई और पीछे बैठे लड़के ने रूपाली के नितंब पर जोर से हाथ दे मारा. रूपाली चिहुंकी तब तक बाइक तेजी से आगे निकल गई. दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा. डर के खरगोश वहां दुबके हुए थे. आंखों से इशारा किया कि निकल चलते हैं. तभी बाइक वाले लड़के फिर पलट कर आ गए. लड़का रूपाली को आगे की तरफ हाथ मारता उससे पहले वह झुक गई. इस बार पता नहीं क्या हुआ रूपाली ने अपनी लंबी टांगे हवा में लहराई और हेलमेट कस लिया. शीतल मजबूती से पिछली सीट पर बैठ गई और बाइक ने रफ्तार पकड़ ली.

    घूं…की आवाज के साथ बाइक पास गई तो शीतल ने पूरी ताकत से अपना झोला लड़के के मुंह पर दे मारा. झोले में रखे स्टील के टिफिन ने कमाल दिखाया और हेलमेट न होने की वजह से लड़के के मुंह पर जोर से चोट लगी. लड़का लड़खड़ाया लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी. उसने मोटरसाइकिल को एक पैर पर घुमाया और लड़कियों की विपरीत दिशा में मुड़ गया. लड़का जैसे ही मुड़ा उसे समझ आ गया कि उससे गलती हो गई है. नीली-पीली बत्तियों से चमकती सड़क पर सुई रखने की भी जगह नहीं थी. उसने हड़बड़ाहट में गाड़ी खाली मैदान में मोड़ ली जहां हर मंगल को हाट लगा करता था. मैदान से निकलना इतना आसान नहीं था. खाली मैदान में धूल उड़ने लगी, शीतल ने खाली टपरे से एक बांस खींच लिया. रूपाली बाइक पर लड़के का पीछा करने लगी. बाइक पास गई तो शीतल ने कस कर पीछे बैठे लड़के को बांस से मारा. लड़का बाइक को जैसे ही लहराता, रूपाली उसी संतुलन से अपनी बाइक को लहरा देती. बाइक के शोर से भीड़ इकट्ठी हो गई।.ऐसा लग रहा था जैसे अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट तीन की शूटिंग चल रही है.

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    कभी झोले तो कभी डंडे से शीतल सही समय पर मार लगा रही थी. रूपाली इतनी कुशलता से बाइक संभाले थी कि दोनों लड़के उनकी हिम्मत देख कर ही आधे पस्त हो गए. भीड़ ने गोल घेरा बना कर एक मजबूत दीवार बना दी थी. इस दीवार के बीच चलती दो मोटरसाइकिलें मौत के कुएं की याद दिला रही थीं. पीछे बैठे लड़के के मुंह से खून निकल रहा था. इस बार रूपाली ने बाइक एक पैर पर घुमाई और सामने वाला पहिया हवा में उठा दिया. घुर्र की आवाज हुई और लड़कों ने बाइक रोक दी. रूपाली ने गाड़ी का अगला पहिया टिकाया और पिछले पहिए पर से गाड़ी 360 डिग्री पर घुमा दी. ठीक इसी वक्त खड़े हुए लड़कों पर शीतल ने बांस की चोट की. लड़के भरभरा कर जमीन पर गिर गए. रूपाली ने बाइक रोकी और सांस लेने लगी. लड़के जमीन पर धूल में पड़े हुए थे. रूपाली ने जैसे ही हेलमेट उतारा उसके बाल बिखर गए. उसके बाल देखते ही भीड़ में चुप्पी छा गई. रूपाली और शीतल ने गहरी सांस ली.

    सामने से शोभा और निर्मला चले आ रहे थे. दोनों के चेहरे पर थोड़ा आश्चर्य, थोड़ी खुशी थी. शोभा ने आते ही पूछा, ‘बाइक कहां से आई’
    ‘तू कब से गलत सवाल पूछने लगी, तू तो ये पूछ हिम्मत कहां से आई’ रूपाली ने शीतल की ओर देखते हुए हंसते-हंसते कहा. दोनों के चेहरे पर पसीने से बाल चिपक गए थे. निर्मला ने रूपाली और शीतल के बालों को पीछे किया और दोनों को गले लगा लिया. रूपाली ने प्यार से निर्मला की ठोड़ी को छुआ और बोली, तू उस दिन पूछ रही थी न मणिकर्णिका कौन थी?
    निर्मला ने उस दिन की बात याद कर हां में सिर हिलाया.
    ‘झांसी की रानी का नाम था मणिकर्णिका. शादी से पहले का नाम.’

    (आकांक्षा पारे काशिव आउटलुक (हिंदी) पत्रिका में बतौर सहायक संपादक कार्यरत हैं.  उनकी कहानी ‘कंट्रोल+अल्ट+शिफ्ट = डिलीट’ काफी चर्चित रही है. यह कहानी सिकंदराबाद बीए कोर्स में शामिल की गई है. आकांक्षा को ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’, ‘राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान’, ‘कृष्ण प्रताप कहानी सम्मान’ से भी सम्मानित किया जा चुका है.)

    Tags: Books

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