भारत के संविधान में डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका! जानें बाबा साहेब की जीवनी से

संविधान सभा द्वारा उनका चयन ही उनकी प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक प्रभाव के बूते पर किया गया था.

ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों की बार-बार ग़ैरहाजिरी की स्थायी समस्या के कारण ये सम्पादकीय जिम्मेदारियां भी मुख्य रूप से आंबेडकर के ही कन्धों पर ही आ जाती थीं.

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    Ambedkar Jayanti 2021: संविधान के रचियता के रूप में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की भूमिका पर बहस अक्सर छिड़ जाती है. संविधान के निर्माण में बाबा साहेब की भूमिका को लेकर तमाम तरह की दलीलें दी जाती हैं. डॉ. आंबेडकर की जीवनी Dr. Ambedkar and Untouchability लिखने वाले लेखक क्रिस्तोफ जाफ्रलो ने अपनी पुस्तक में इन तमाम मुद्दों को सिलसिलेवार और तथ्यात्मक ढंग से उठाया है. इस पुस्तक को 'भीमराव आंबेडकर : एक जीवनी' के नाम से हिन्दी में योगेन्द्र दत्त ने अनुवाद किया है. पेश हैं पुस्तक के कुछ अंश-

    एक अस्पृश्य व्यक्ति का प्रभावशाली पदों पर पहुंचना
    एक अस्पृश्य व्यक्ति राष्ट्रीय राजनीति में ऐसे-ऐसे प्रभावशाली पदों तक जा पहुंचा, इस बात पर ऊंची जातियों के हिन्दुओं की कठोर आलोचना आना स्वाभाविक थी. यहां तक कि कुछ ने तो बाद के दशकों में यह दावा तक कर डाला कि संविधान सभा में आंबेडकर की कोई उल्लेखनीय भूमिका थी ही नहीं.



    एच. एस. वर्मा और नीता वर्मा की दलील
    एच. एस. वर्मा और नीता वर्मा ने दलील दी है कि संविधान सभा द्वारा उनका चयन ही उनकी प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक प्रभाव के बूते पर किया गया था.

    नपे-तुले शब्दों में भाषण
    उन्होंने दिखाया है कि ड्राफ्टिंग कमेटी के मुखिया के रूप में आंबेडकर का निर्वाचन 1946 में संविधान सभा में उनके पहले हस्तक्षेप का नतीजा था. जब नेहरू ने संविधान सभा के उद्देश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की तो एक अन्य सदस्य, जयकर, ने सुझाव दिया था कि ऐसे किसी प्रस्ताव पर तब तक मतदान नहीं कराया जा सकता जब तक हम इस बात पर ध्यान नहीं देंगे कि मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि—जो अभी भी पाकिस्तान के गठन और भारत के प्रति निष्ठा के बीच झूल रहे थे—संविधान सभा में शामिल होते हैं या नहीं. इस मौके पर आंबेडकर ने बहुत नपे-तुले शब्दों में भाषण दिया और बीच का रास्ता निकालने का सुझाव दिया था. उनके भाषण में जो सन्तुलन और क़ानून की गहरी पकड़ दिखाई देती थी उससे कांग्रेस के बहुत सारे नेता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते थे.

    लिहाज़ा, एच.एस. वर्मा और नीता वर्मा का मानना है कि आंबेडकर को ड्राफ्टिंग कमेटी की अध्यक्षता विशुद्ध रूप से उनकी क्षमताओं के दम पर ही मिली थी. इसके अलावा, हमें ड्राफ्टिंग कमेटी की भूमिका का भी एक बार फिर आकलन करना चाहिए.

    यह कमेटी संविधान के प्रारम्भिक पाठों को लिखने के लिए जिम्मेदार नहीं थी बल्कि उसे यह जिम्मा सौंपा गया था कि वह विभिन्न समितियों द्वारा भेजे गए अनुच्छेदों के आधार पर संविधान का लिखित पाठ तैयार करे जिसे बाद में संविधान सभा के सामने पेश किया जाएगा.

    सभा के समक्ष कई मसविदे पढ़े गए और हर बार ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों, बहुधा उसके अध्यक्ष आंबेडकर, ने ही चर्चा का संचालन और नेतृत्व किया था. आंबेडकर संविधान सभा के ऐसे मुट्ठी भर सदस्यों में से थे जो ड्राफ्टिंग कमेटी का सदस्य होने के साथ-साथ शेष 15 समितियों में से भी एक से अधिक समितियों के सदस्य थे.

    नज़दीक से नज़र
    लिहाज़ा, वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों जैसे बहुत महत्त्वपूर्ण विषयों से सम्बन्धित अनुच्छेदों पर होने वाली बहसों पर भी नज़दीक से नज़र रख सकते थे. सबसे बढ़कर, ड्राफ्टिंग कमेटी अध्यक्ष होने के नाते विभिन्न समितियों की ओर से सारे प्रस्ताव उनके पास ही भेजे जाते थे और यह उनकी तथा ड्राफ्टिंग कमेटी के सचिव एस. एन. मुखर्जी की जिम्मेदारी थी, जिन्हें बाद में आंबेडकर ने बहुत उदार शब्दों में श्रद्धांजलि दी, कि वे इन अनुच्छेदों को फिर से सूत्रबद्ध करें. ऐसे बहुत सारे अनुच्छेदों को संविधान सभा के सामने पेश करने से पहले उनका स्पष्टीकरण भी आवश्यक था.

    टी.टी. कृष्णमाचारी की दलील
    ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों की बार-बार ग़ैरहाजिरी की स्थायी समस्या के कारण ये सम्पादकीय जिम्मेदारियां भी मुख्य रूप से आंबेडकर के ही कन्धों पर ही आ जाती थीं. बाद में, ड्राफ्टिंग कमेटी के एक सदस्य टी.टी. कृष्णमाचारी ने नवम्बर 1948 में संविधान सभा के सामने बताया था:

    'सम्भवत: सदन इस बात से अवगत है कि आपने (ड्राफ्टिंग कमेटी में) जिन सात सदस्यों को नामांकित किया है उनमें से एक ने सदन से इस्तीफ़ा दे दिया है और उनकी जगह कोई अन्य सदस्य आ चुके हैं. एक सदस्य की इस बीच मृत्यु हो चुकी है और उनकी जगह कोई नए सदस्य नहीं आए हैं. एक सदस्य अमेरिका में थे और उनका स्थान नहीं भरा गया है. एक अन्य व्यक्ति सरकारी मामलों में उलझे हुए थे और वह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं कर रहे थे. एक-दो व्यक्ति दिल्ली से बहुत दूर थे और सम्भवत: स्वास्थ्य की वजहों से कमेटी की कार्रवाइयों में हिस्सा नहीं ले पाए. सो कुल मिला कर यही हुआ है कि इस संविधान को लिखने का भार डॉ. आंबेडकर के ऊपर ही आ पड़ा है. मुझे इस बात पर कोई सन्देह नहीं है कि हम सबको उनका आभारी होना चाहिए कि उन्होंने इस जिम्मेदारी को इतने सराहनीय ढंग से अंजाम दिया है.'

    संविधान के निर्धारण की पूरी प्रक्रिया में सबसे आगे
    अगर आंबेडकर संविधान के लेखक नहीं थे तो भी वह उसके निर्धारण की पूरी प्रक्रिया में सबसे आगे मौजूद तो ज़रूर ही थे. न केवल उन्होंने कमेटी के प्रस्तावों में महत्त्वपूर्ण बदलाव किए, प्लेनरी सत्रों में आखिर तक उनके लिए लड़ाई लड़ी बल्कि समय-समय पर इसमें सफलता न मिलने के बावजूद वे लगातार अगले प्रस्तावों पर बहस करते रहे, बल्कि बहसों को सही दिशा देते रहे.

    इस प्रकार, आंबेडकर ने भारत के संविधान की रचना में एक निर्णायक भूमिका अदा की है और इसी से पता चलता है कि शौरी उनसे इतने खफ़ा क्यों हैं! उनका यह तर्क भी कुछ हद तक ही सही है कि गांधीजी के विचारों की उपेक्षा के लिए आंबेडकर ही जिम्मेदार थे.

    लिबरल डेमोक्रेसी में विश्वास
    आंबेडकर ने संविधान सभा में उन्हीं मूल्यों और राजनीतिक मॉडलों का पक्ष लिया जो उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान पश्चिम में युवावस्था के समय आत्मसात किए थे. वह उदार लोकतंत्र यानी लिबरल डेमोक्रेसी में विश्वास रखते थे. वह वामपन्थ के विरोधी थे जो संविधान के पहले ही अनुच्छेद से भारतीय गणतंत्र को 'समाजवादी' सांचे में पुनर्परिभाषित करना चाहता था. उनका मानना था कि इससे लोकतंत्र नष्ट हो जाएगा.

    उनकी नज़र में यह चुनने का अधिकार लोगों द्वारा चुनी गई सरकार के पास ही होना चाहिए कि किस प्रकार की सामाजिक संरचना सर्वश्रेष्ठ है.

    19 नवम्बर, 1948 को इस पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा था : इस संविधान में हमने एक राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना क्यों की है, इसका कारण ये है कि हम किसी भी प्रकार किसी भी समूह की स्थायी तानाशाही स्थापित नहीं करना चाहते. यद्यपि हमने राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना की है मगर साथ ही हमारी ये भी कामना है कि हम आर्थिक लोकतंत्र को भी अपना आदर्श बनाएं. लोगों की नज़र में हमारे सामने आज कई ऐसे रास्ते हैं जिन पर चलकर आर्थिक लोकतंत्र का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. ऐसे लोग भी हैं जो व्यक्तिवाद को आर्थिक लोकतंत्र का सर्वश्रेष्ठ प्रकार मानते हैं. ऐसे लोग भी हैं जो एक समाजवादी क़‍स्मि के राज्य को ही आर्थिक लोकतंत्र का सबसे अच्छा रूप मानते हैं. और, ऐसे लोग भी हैं जो साम्यवादी विचारों को आर्थिक लोकतंत्र का सबसे परिष्किृत रूप मानते हैं . (ऐसे हालात में) हमने सोच-समझकर नीति-निर्देशक सिद्धान्तों की भाषा में एक ऐसी चीज़ पेश की है जो स्थिर या कठोर नहीं है. हमने अलग-अलग सोच रखने वाले लोगों के लिए इस बात की काफी गुंजाइश छोड़ दी है कि आर्थिक लोकतंत्र के आदर्श तक पहुंचने के लिए वे किस रास्ते पर चलना चाहते हैं, और वे अपने मतदाताओं को इसके लिए प्रेरित कर सकें कि आर्थिक लोकतंत्र तक पहुंचने के लिए सबसे अच्छा रास्ता कौन-सा है.

    राष्ट्रीयकरण के पक्ष में पेश किए गए संविधान संशोधन का विरोध
    इस तर्क का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में पेश किए गए संविधान संशोधन का विरोध किया. यह संविधान संशोधन प्रस्ताव मतदान की अवस्था तक पहुंच ही नहीं पाया जो आंबेडकर की 'विधायी शक्ति' का एक और चिह्न है. ऐसा लगता है कि उनके पास यह तय करने की नैतिक शक्ति आ चुकी थी कि किसी संशोधन को मतदान के लिए पेश किया भी जा सकता है या नहीं.

    उदार लोकतंत्र के प्रति उनके इस लगाव का एक और संकेत तब दिखाई पड़ता है जब उन्होंने कार्यपालिका की शक्तियों और न्यायपालिका के बीच सख्त पृथकता के पक्ष में प्लेनरी सत्र में एक संशोधन प्रस्तावित किया था. यह एक दुर्लभ अवसर था क्योंकि उनकी मुख्य भूमिका ड्राफ्टिंग कमेटी द्वारा तय कर दिए गए पाठ का सिर्फ बचाव करने की थी.

    कुछ प्रतिनिधियों ने राज्य के प्राधिकार का हवाला देते हुए इसके विरोध में तर्क दिया कि अगर राज्य पर बहुत सख्त क़ानूनी नियंत्रण होगा तो वह कमज़ोर हो जाएगा. हालांकि प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के पास अपनी जिम्मेदारियों के निर्वाह के चलते ज़्यादा समय नहीं होता था परन्तु उन्होंने इस बहस में हिस्सा लिया क्योंकि वह जानते थे कि आंबेडकर इस संशोधन को पारित कराना चाहते हैं.

    शक्तियों के बंटवारे से राज्य कमज़ोर नहीं
    अन्तत: यह संशोधन मंजूर हुआ और नीति-निर्देशक सिद्धान्तों में अनुच्छेद 50 के रूप में शामिल किया गया. बाद में आंबेडकर ने ब्रिटिश शैली की न्यायिक व्यवस्था की स्थापना का भी बचाव किया. उनका मत था कि शक्तियों के बंटवारे से राज्य कमज़ोर नहीं होगा.

    आंबेडकर एक शक्तिशाली केन्द्र पर आश्रित व्यवस्था के समर्थक थे. उनका मानना था कि आवश्यकता से अधिक संघवाद पूरे देश के भूभाग में संविधान के समान रूप से क्रियान्वयन को अवरुद्ध करेगा. उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि अगर प्रदेशों को ज़रूरत से ज़्यादा स्वायत्तता दे दी गई तो अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए तय किए गए अनुच्छेद को बहुधा लागू भी नहीं किया जाएगा.

    पुस्तक : 'भीमराव आंबेडकर : एक जीवनी'
    लेखक – क्रिस्तोफ जाफ्रलो
    अनुवाद – योगेन्द्र दत्त
    प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
    मूल्य : हार्डकवर 650/-, पेपरबैक 225/-
    पृष्ठ सं. : 208

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