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हास्य के बहाने सामाजिक बदलावों की चिन्ता है 'घूरो मगर प्यार से'

व्यंग्य की कसौटी बड़ी मारक होती है. इसे जरा हल्का लिया तो असर कम और जरा व्यंजना ज़्यादा हुई तो बोझिल.

व्यंग्य केवल लिख देने भर के लिए लिखने जैसी विधा नहीं है वरन् संजीदगी के साथ हास्य के बहाने सामाजिक बदलावों की चिन्ता का माध्यम है.

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    चुलबुली शैली की गंभीर चिंतक अर्चना चतुर्वेदी का नया व्यंग्य 'घूरो मगर प्यार से' आया है. बृज भाषा में लिखा गया इससे पहला व्यंग्य 'गली तमाशे वाली' काफी चर्चा में रहा है. 'घूरो मगर प्यार से' संग्रह नाम और रचना, दोनों ही लिहाज से कुछ अलग हटके और रोचक है. व्यंग्य के नाम पर विचार करने से लगेगा कि शायद यह युवाओं को ध्यान में रखकर लिखा गया है, लेकिन इसकी धार पर युवा से लेकर हर आयुवर्ग के लोग, यहां तक कि महिलाएं तक शामिल हैं.

    व्यंग्य केवल लिख देने भर के लिए लिखने जैसी विधा नहीं है वरन् संजीदगी के साथ हास्य के बहाने सामाजिक बदलावों की चिन्ता का माध्यम है. यही अर्चना चतुर्वेदी के व्यंग्य साहित्य का केन्द्रीय भाव है. अर्चना चतुर्वेदी की रचनाओं के चरित्र और विषय एक जागरुक नागरिक की चिन्ता से उपजते हैं. अर्चना के लेखन में एक और खास बात ये है कि चरित्र, विषय तो वह अपने आस-पास से उठाती हैं, साथी ही शब्द भी खांटी देशज होते हैं. जैसे-'घूरो मगर प्यार से' साफ पता चलता है कि लेखिका ने शीर्षक में भी 'घूरो' जैसे सरल और देशज शब्द के प्रयोग से परहेज़ नहीं किया.

    'घूरो मगर प्यार से' संग्रह में अर्चना ने बालकों से लेकर युवावर्ग, युवक युवती दोनों, का खाका ऐसा खींचा है जैसे आप आस-पास का कोई वाकया देख रहे हों. जैसे यथार्थ किस्से को बातों ही बातों में कोई आप से ही कबूल करवा ले और खुद आप ही अपने आप को कटघरे में खड़ा सा पाएं.

    व्यंग्य की कसौटी बड़ी मारक होती है. इसे जरा हल्का लिया तो असर कम और जरा व्यंजना ज़्यादा हुई तो बोझिल. इस कसौटी का 'घूरो मगर प्यार से' में सावधानी पूर्वक पालन किया गया है.

    इंटरनेट के इर्द-गिर्द सिमटे आदमी पर तंज कसते हुए अर्चना लिखती हैं, 'आज का इंसान ई-मनुष्य हो गया है जो केवल इन्टरनेट के सहारे ज़िन्दा हैं. आजकल का ई-मनुष्य वाट्सऐप पर इस्माइल वाली इमोजी भेज कर ही मुस्कुराता है. असलियत में मुस्कुराना भूल गया है क्योंकि वो ई-मनुष्य हैं.'

    समाज की विसंगतियों से लेकर पति-पत्नी की सहज नोंक-झोंक, महानगरीय महिलाओं की तड़क-भड़क, जीवन शैली के टोटके से लेकर समाज के मनचले नवयुवक और इठलाती बलखाती नवयुवतियों के सदके उतारने में लेखिका माहिर हैं.

    अर्चना का लेखन इतना सरल और सहज है कि उन्हें पढ़ते हुए यह लगता है कि वह सामने बैठकर बतिया रही हैं. वह जो सोचती हैं वैसा ही कहती हैं और वैसा ही लिखती भी हैं. उनकी बातों में बनावटीपन दिखाई नहीं देता. वह अपने वास्तविक जीवन और व्यवहार में सीधी, सरल, सच्ची और स्पष्टवादी हैं. यही सब गुण उसके लेखन में भी दिखाई देता है.

    'घूरो मगर प्यार से' संग्रह के विषय सचमुच रोचक और चर्चा में रहने वाले हैं, जैसे- 'मोर बालम गये कलकत्ता' , 'डिजिटल होली', 'बाबा बना बेबी', 'गर्मी का स्वैग', 'औरतों का ब्रह्मोस', 'चिंगारी से आग तक.'

    घूरने का पक्ष लेते हुए एक जगह अर्चना लिखती हैं, 'वैसे घूरने के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं. बल्कि लड़कियों के वार्तालाप सुनकर तो ऐसा प्रतीत हुआ कि जिस लड़की को कोई नहीं घूरता वो खुद को बदसूरत समझने लगती है. कभी-कभी तो डिप्रेशन तक में चली जाती है. वैसे तो बात भी डिप्रेशन में जाने की है. उसने इत्ता मेकअप थोपा, उटपटांग वस्त्र धारण किए और किसी ने घूरा तक नहीं. इसलिए हे घूरने वालों! तुम चैन से घूरो… पर दीदे फाड़ फाड़ कर नहीं… थोड़ी सी शराफत से घूरो ताकि घुरने वाले को भी आनंद आए.'

    बिल्कुल अलग और सहज दिखनेवाले विषयों में कथ्य खोज लेना भी लेखिका का विशिष्ट गुण है. एक जगह वे लिखिती हैं, 'आज हर जगह मिलावट ही मिलावट है. इसके चलते कोई मूर्ख बन रहा है तो कोई मूर्ख बना रहा है. मूर्ख यानी फूल. लोग कहीं धर्म के नाम पर फूल बनाए जा रहे हैं तो कहीं धन के लालच में
    स्वयं फूल बन रहे हैं. कथित नेता झूठे आश्वासनों से आम जनता को मूर्ख बना रहे हैं. फेसबुक पर पुरुष, स्त्रियों के नाम से फर्जी आईडी बनाकर दूसरे मर्दों से इश्क फरमाते हुए उन्हें मूर्ख बना रहे हैं.'

    पासपोर्ट बनवाने के लिए नौकरशाही और दलालों के बीच चकरघिन्नी बनते मध्य वर्गीय परिवार की आर्थिक सीमाओं और महत्वाकांक्षाओं के दो पाटों के बीच पिसते शर्मा जी हों या, सोचो यदि ऐसा हो तो क्या हो में कन्या भ्रूण हत्या के चलते बिगड़ता नर-नारी अनुपात और उसके दुष्परिणाम हों, सांस्कृतिक प्रदूषण और सामाजिक अवमूल्यन को उजागर करती 'डिजिटल होली' हो, कृपया कतार में रहे में अनापेक्षित रूप से नोटबंदी के परिणाम स्वरूप पैदा हुए विषम स्थितियों का चित्र हो, सोशल मीडिया का समाज और संवाद की स्थिति पर प्रभाव को दर्शाता, डिजिटल चौपाल और वर्चुअल रिश्ते हो या रिश्तों पर भारी पड़ता गूगल ज्ञान हो, ऐसी सभी स्थितियां, विसंगतियां हमारे इर्द-गिर्द बिखरी पड़ी हैं.

    अर्चना चतुर्वेदी की तीक्ष्ण दृष्टि इन्हें चुनती हैं, समेटती हैं और इन्हीं से अपने व्यंग्य के उपकरण तराशती हैं. उनकी रचनाएं सीधे- सच्चे ढंग से पाठक से संवाद स्थापित करते-करते अचानक ऐसी स्थिति ला देती हैं जो एक पिन की भांति पाठक के मर्मस्थल में चुभती चली जाती है. हास्य के पुट में ज़माने का दर्द घोल कर आसव बनाने में भाषा की आंच ही काम आती है

    पुस्तक- घूरो मगर प्यार से
    लेखक- अर्चना चतुर्वेदी
    प्रकाशक -भावना प्रकाशन दिल्ली
    मूल्य -195
    Published by:Shriram Sharma
    First published: